हे पार्थ ! रुको अब
बहुत लड़ लिए
हिस्से के खातिर
कब तक चलेगा महाभारत
अपनों से
हे पार्थ !
माना कि हिस्से का किस्सा
तुम्हारा नहीं था गलत
पर इतना सच भी नहीं
कितने ही रिश्ते चंढ़ गए थे
हिंसा की बलिवेदी पर
हे पार्थ !
कितना खोया कुछ पाने के लिए
बुद्धि विवेक पराक्रम
अपनों का विछोह
ठीक था तेरा मोह
क्यूँ, सुनकर
प्रेरित हुए तुम
कृष्ण की गीता से ।
हे पार्थ !
आपस की लड़ाई से
फर्क पड़ता है
देश पर समाज पर
कल पर आज पर
छिन्न विछिन्न हो जाता सब कुछ
सदियां लग जाती उबरने में
हे पार्थ !
अब नहीं करना महाभारत
ना खर्च करनी यूं ही
संचित शक्तियां
गांडिव चले तो सिर्फ विकास पर
विनाश को नहीं…
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