कवि का आत्मकथ्य

गीत - नवगीत

कवि का आत्मकथ्य

पीयूष अवस्थी

मैं कवि नहीं, नहीं हूँ शाइर,

गीत नहीं,

मैं तो सारी दुनिया का,

अन्तर्मन हूँ!

चिंगारी में लिपटा

अपना चन्दन है,

मेरी मौलिकता तो

मेरा क्रन्दन है,

हमसे ही स्थापित

युग आधार शिला,

यद्यपि रहा उपेक्षित

अपना वन्दन है,

घटनाओं को बाँधे,

अपनी बाँहों में,

खेल गया जो सुधियों से,

मैं वो क्षण हूँ!

मैं काँटों में फूल

खिलाने आया हूँ,

सच्चाई का पंथ

दिखाने आया हूँ,

मैं शाश्वत स्वर हूँ

इस सोनिल धरती का,

मैं दुनिया का दर्द

मिटाने आया हूँ,

मैं जीवन के आँगन की

रंगोली हूँ,

अँधियारों में चमक उठे

मैं वो कण हूँ  !

जीवन भर का स्वर्ग

हमारी आँखों में,

अमृत वाले फल हैं

अपनी शाखों में,

किस घाटी से कल

सूरज का उदगम है,

एक तीसरी आँख

हमारी पाँखों में,

गहन तिमिर में, मैं उजियारी

आशा हूँ ,

हार-जीत के सम्बन्धों

वाला रण हूँ !

मैं जन-मन का

एक अथक विश्वास रहा,

सूरज, चाँद, सितारों का

आकाश रहा,

भावुकता जैसे तो 

मेरे गलियारे,

संस्कृति वाले चरणों का

अधिवास रहा,

युग-युग तक युग गायेगा

ये गाथायें,

मैं समाज का अक्षय

सुन्दर दर्पण हूँ!!   

– पीयूष अवस्थी

मुख्य संपादक

शब्दकार प्रकाशन

एवं ‘‘शब्दकार पत्रिका’’

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