कविता की मनुहार : मनुहारों के शिखर
कविता की मनुहार : मनुहारों के शिखर
समीक्षक – डॉ सुरेश अवस्थी
बिशेष समर्पण प्रशंसनीय तो है ही, अनुकरणीय भी है।
समाचार संपादन की उनकी चेतना का में हमेशा कायल रहा हूं। मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैंने अपनी कवि सम्मेलनीय विदेश यात्राओं के दौरान अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड व दुबई आदि देशों से दैनिक जागरण के लिए खबरें लिखीं जिन्हें सभी संस्करणों में प्रथम पृष्ठ पर स्थान मिला। इन समाचारों/आलेखों का संपादन लोकेश जी करते थे। उनका संपादन ‘ सोने में सुहागा साबित’ होता था।
इस युगीन सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाजारवाद और भौतिकवाद की चकाचौंध के संजाल में उलझे लोगों को स्वयं से संवाद करने का अवसर नहीं मिलता। हमारी ये चेतना कहीं गुम होती जा रही है। जिन तमाम समस्यायों के समाधान व्यक्ति के अंताकरण में सहज ही मिल सकते हैं उन्हें हम बाहर खोजते खोजते और उलझ जाते है। गीतकवि लोकेश शुक्ल का भारतीय साहित्य संग्रह, कानपुर से प्रकाशित गीत संग्रह “मनुहारों के शिखर” के गीतकर लोकेश शुक्ल अनुभवों के धरातल पर अनुभूतियों के बल पर गीत रचना करके काव्य रसिकों को बहुत ही संजीदगी और सलीके से कालजयी गीत से साववधान करते हैं :
बाहर नहीं तलाशो कुछ भी
भीतर सब कुछ मिल जायेगा.
अपने पास ज़रा बैठो तुम
उतरो मन की गहराई में
मिल जाते प्रश्नों के उत्तर
आसानी से तनहाई में
होने दो अंकुरित बीज को
फूलों का मौसम छायेगा
भीतर सब कुछ….
हमारा विस्वास है कि श्री लोकेश शुक्ल की काव्य कृति ” मनुहारों के शिखर ” पाठकों के बीच लोकप्रय होगी और हिंदी काव्य साहित्य की उल्लेखनीय निधि बनेगी।
अशेष शुभकामनाओं के साथ।

डॉ सुरेश अवस्थी
(राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त शिक्षाविद, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि व वरिष्ठ पत्रकार)