कृष्णकुमार नाज़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

कृष्णकुमार नाज़ की ग़ज़लें

डा. कृष्णकुमार 'नाज़'

1.

ग़ज़ल

हर वक़्त हूँ किसी न किसी इम्तिहान में

शायद इसीलिए है ये तल्ख़ी ज़ुबान में

अपनी अना की क़ैद से बाहर निकल के देख

पैवंद लग चुके हैं तेरी आन-बान में

सोह्बत बुरी मिली तो ग़लत काम भी हुए

वैसे कोई कमी तो न थी ख़ानदान में

ग़म भी, ख़ुशी भी, आह भी, आँसू भी, रंज भी

सबको जगह मिली है मेरी दास्तान में

नींदों की जुस्तजू में लगे हैं तमाम ख़्वाब

सज-धज के आ गया है कोई उनके ध्यान में

दरवाज़ा खटखटाए चले जा रहे हो ‘नाज़’

लगता है कोई शख़्स नहीं है मकान में

– डा. कृष्णकुमार ‘नाज़’

2.

ग़ज़ल

फ़ैसलों के बीच में जो सोच की दीवार है 

उसको भी आख़िर किसी अंजाम की दरकार है 

ढूँढता फिरता है इंसाँ आज ख़ुद अपना वजूद 

आरज़ूओं की कुछ इतनी तेज़तर रफ़्तार है 

भूख उसके जिस्म से छलकी तो सबने ये कहा 

वो ज़रूरतमंद है, लेकिन बड़ा ख़ुद्दार है 

चंद उम्मीदें हैं अपने पास, वो भी ख़स्ताहाल 

और उस पर भी सितम ये, वक़्त साहूकार है 

हमको हिंदुस्तान की तहज़ीब पर होता है ‘नाज़’ 

शर्म की दौलत है जिसके पास वो ज़रदार है 

डा. कृष्णकुमारनाज़

9/3 लक्ष्मीविहार, हिमगिरि कॉलोनी, 

कांठ रोड, मुरादाबाद- 244001 

मोबाइल 99273 76877

Email : kknaaz1@gmail.com

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