मंसूर उस्मानी की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

मंसूर उस्मानी की दो ग़ज़लें

मंसूर उस्मानी

चलते हो मेरे साथ तो इतना भी सोच लो
राहों में मेरी ग़म का समुंदर भी आएगा
ख़ुद आप-अपनी ज़द में सितम-गर भी आएगा
तुम मुंतज़िर रहो कि ये मंज़र भी आएगा
इस रेत के नगर को न घबराओ देख कर
आगे बढ़ो कि एक समुंदर भी आएगा
मक़्तल को जा रहा हूँ ये ‘मंसूर’ सोच कर
छींटा कोई लहू का तो उन पर भी आएगा

*ख़ुशबू का क़ाफ़िला ये बहारों का सिलसिला*
*पहुँचा है शहर तक तो मिरे घर भी आएगा*

Mansoor Usmani

तिश्नगी दिल की बुझाना तो ख़बर कर देना
अश्क आँखों में छुपाना तो ख़बर कर देना
हम ने कुछ गीत लिखे हैं जो सुनाना हैं तुम्हें
तुम कभी बज़्म सजाना तो ख़बर कर देना
हादसे राह-ए-मोहब्बत का मुक़द्दर ठहरे
जब हमें दिल से भुलाना तो ख़बर कर देना
जिन किताबों में छुपाए हैं मिरे ख़त तुम ने
उन किताबों को जलाना तो ख़बर कर देना
आज बेगाना समझते हो तो समझो लेकिन
जब सताए ये ज़माना तो ख़बर कर देना
मैं ज़रूर आऊँगा ‘मंसूर’ तुम्हारी ख़ातिर
तुम जो मक़्तल को सजाना तो ख़बर कर देना

– मंसूर उस्मानी

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