मेघा राठी की ग़ज़ल
मेघा राठी की ग़ज़ल
मेघा राठी

मेरी मुहब्बतों का कोई तो सवाब दे
या तो मसर्रतें ही दे या इज़तराब दे
नींदों से जोड़ दे मेरा रिश्ता मेरे खुदा
आंखे जो तूने दी हैं तो आंखों में ख़्वाब दे
तूने बहुत सवाल किए मुझसे ज़िन्दगी,
अब मेरी ख़ामुशी का किसी दिन जबाब दे
नफरत का दे जबाब मुहब्बत से तू सदा
कांटा तुझे दे कोई तू उसको गुलाब दे
ख़्वाहिश है रब मिरे ,कभी मैं ख़ुद से मिल सकूं
मैं आदमी हो जाऊं कभी, ऐसा बाब दे
अच्छाइयों की पूछ ही होती है अब कहाँ
मुझको भी कोई ऐब दे, आदत ख़राब दे
गजलों में मेरे ग़म की वो शिद्दत नहीं रही,
मुमकिन हो ग़र खुदा मुझे फिर से अज़ाब दे
बदले में तेरे चेहरे के दीदार के अगर
हरगिज़ न लूँगी कोई अगर माहताब दे
जिसको तमाम उम्र पढूं मैं सुकून से
किस्मत में मेरी इश्क़ की ऐसी किताब दे
मेघा राठी
संप्रति: लेखिका उपन्यासकार, अमर उजाला, दैनिक जागरण, जनसत्ता, पंजाब केसरी, वनिता, जागरण सखी, दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं, नूतन कहानियां आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें: गुस्ताखियां, उंगलियां व विभिन्न सांझा संग्रह,
निवास: भोपाल मध्यप्रदेश