मेघ ये मनमीत सदृश लग रहे हैं
इस नयन में शीत बनकर सज रहे हैं
दग्ध अवनी सींचती काली घटाएँ
वैद्य जैसे घाव औषध मल रहें हैं।
तुंग पर्वत को बढी गज की सवारी
जल तुमुल कर में लिए विद्युत कुठारी
गीत मंगल गा रहे दादुर यहीं पर
ग्रीष्म तुमपर यह पड़ेगी रात भारी।
तेज जल मलयज धुआँ आकाश ले भर
बुझ गए नभदीप मलयज चल न मंथर
भोर होने तक सुहानी मेह बरसे
है निशा कंपित अधर लरजे हुलस कर।
खेत की सोई फसल भी जी पड़ेगी
आग वनपथ की बड़ी जल्दी बुझेगी
उष्ण आंसू को बनाए मेघ अमृत
फिर हरी होगी न अवनी फिर हँसेगी।
मुजफ्फरपुर बिहार
स्वरचित एवं मौलिक
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