परिभाषा

मोतीलाल दास की कविताएँ

मोतीलाल दास

मेरी बात सुनो
कि आरंभ की वह बिन्दु
हाथ से न छूटे
और बहुत देर तक
टंगा न रह जाए
इन हवाओं के बीच

छूटने का श्रोत
अंतस से फूटता हो जब
जैसे उग आये हों
ढेर सारे नागफनी
इन आंखों में
और बहती हो कहीं
एक नदी
चांद पर जाने को आतुर
संभलने की प्रक्रिया
चुभता क्यों रहता है
उन्हीं आंखों में

परिभाषा की चादर
शायद तुमने लंबी तानी है
जो उम्र की डोर पर
सही सही नहीं बंधता
ना ही बसाया जाता है
कोई घर
इन आंखों में

मेरी बात
तुम सुनो या नहीं
कोई बात नहीं
लेकिन तुम सुनो
हवाओं को
फूलों को
नदियों को
शब्दों को
घरों को
और उन आंखों को भी
तब बतलाना
सचमुच में परिभाषा
तुम्हें कहीं ले जाती है या नहीं.

आधी शताब्दी में

आधी शताब्दी बीत चुकी है
नई कविताओं को रचे हुए
पाया कम है
नष्ट बहुत हो गया है
इन आधी शताब्दी में

बहुत कुछ नष्ट हो चुका है
वन्दे मातरम् के गीत
भूल चुके हैं
तिरंगा लहराने के लिए
हाथ नहीं उठ रहे हैं
भाषा की चादर फट चुकी है
इन आधी शताब्दी में

बहुत कुछ नष्ट हो चुका है
मानवता की धूलें
जंगल के जंगल
और आग
चूल्हे की जगह
पेट में समा गए हैं
इन आधी सदी में.

किसान

तुम नहीं हो
किसी संवाद में
किसी मंच पर
किसी नाटक में

शायद तुम्हें भी पता है
तुम्हें ठेल दिया गया है
हाशिए पर
किसी योजना के तहत

तुम्हें उठना होगा
उस हाशिया से
और लड़ना होगा
उस गंदी योजना को
उखाड़ फेकनें के लिए

उठो और करो बुलंद
प्रतिरोध के स्वर
ताकि उसकी योजना
ढहने लगे
और सिसकने लगे
किसी हाशिए पर.

अनाज

तुम हो
सभी संवाद में
सभी मंच पर
मेरी थाली में भी

तुम्हें तो पता है
तुम्हारे वैगर
सारी योजना
सारे विश्व
हाशिए पर आ जाएगें

हे अनाज
आज तेरी लड़ाई
किसी खेत की जगह
हम सड़कों पर ले आए

हम किसान
तेरी अस्मिता बहाल करेगें
और लड़ेगें
उस गंदी योजना को
उखाड़ फेकनें के लिए.


– मोतीलाल दास

डोंगाकाटा, नंदपुर

मनोहरपुर – 833104, झारखंड

मो.7978537176

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