पक्की सड़क है मेरे गाँव जाती,
छोटी नहीं है;बडी बात साथी।
मुझे पग में पगडंडियों की है चाहत,
सड़क कोई कब दिल के द्वार जाती?
होकर शहर से बहरा मैं निकला,
मुझे गाँव की एक झोपड़ बुलाती।
आंटी मेरे गाँव तक जा चुकी हैं,
ढूँढू कहाँ बोलो;मैं अपनी काकी।
पक्के हुए जा रहे सारे मन्दिर,
घरों तक पहुंचने लगी पक्की माटी।
स्वागत में लग जाता था गाँव सारा,
किसी के भी घर जब बारात आती।
पेड़ और नदी पूजने की रवायत,
निलय! गाँव से जा रही है ये थाती।।
– अनिल कुमार ‘निलय’
राजकीय हाईस्कूल सराय आनादेव प्रतापगढ़,उ०प्र०
मो०- 7275387346