मन उपवन में खिले
फूल हर सिंगार के
मानता नहीं समीर
अस्थिर प्रतिबन्ध को
साथ दिया विम्बों ने
स्वास की सुगन्ध को
अधरों में सिमट गये
अक्षर मनुहार के
पायलिया कहती है
पनघट फिर आना है
गली गॉव देहरी क्या
तट-तट बहकाना है
कितने मद डूबे हैं
पल ये अभिसार के
अंग-अंग झलके
निशिअंचल खामोश है
इसका ये अर्थ नहीं
मौसम बेहोश है
गीत गुनगुनाये तभी
तरणी मझधार के
मन उपवन में खिले
फूल हरसिंगार के
– जयराम जय
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