‘पिता हूँ मैं’
पुस्तक समीक्षा
‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
पुस्तक: ‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
प्रकाशक: शब्दकार प्रकाशन, ग्रेटर नोएडा
रचना शैली: क़तआत-खंडकाव्य
भाषा: हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू
कीमत: 700/- पृष्ठ: 144
दुनिया के हर पिता का जज़्बा
समीक्षक – मंसूर उस्मानी

जनाब पीयूष अवस्थी हमारे दौर के एक बहुत जिम्मेदार शायर हैं, उनकी कई किताबें उनको अदबी दुनिया में मनवा चुकी हैं। शायरी के जरिये उनका मकसद सिर्फ दिल को बेहलाना और दिमाग को समझाना नहीं है, बल्कि समाज को बेहतर समाज बनाना और इंसान को असली इंसान बनाना जैसे बड़े लक्ष्य उनका निशाना हैं। इसकी झलक उनकी नई पुस्तक ‘‘पिता हूँ मैं’ में आसानी से देखी जा सकती है।
‘‘पिता हूँ मैं’’ केवल अवस्थी जी के दिल की आवाज नहीं है, दुनिया के हर पिता का दर्द है, एहसास है, जज़्बा है, तड़प है, जो ऐसे वक़्त में शायरी की किताब बन रहा है, जब बदलाव की आंधी में तहजीबे हाँप रही हैं और रिश्ते काँप रहे हैं। आज हमारी नई पीढ़ी ये भूल गई है कि माँ के कदमों में जो जन्नत है पिता ही उसका दरवाजा है, आज के बेटे जिस तरह पिता को नजर अंदाज कर रहे हैं, उससे सिर्फ दिल ही नहीं दुखता, आत्मा भी छलनी होती है। इसी दुखदायी माहौल को बदलने के लिए पीयूष जी ने कलम उठाया है, जो बड़ी हिम्मत और ईमानदारी का कदम है। मुक्तकों के रूप में अपनी बात कहकर अवस्थी जी तो कामयाब हो गए, शायरी का हुस्न बढ़ा दिया, शायर से बढ़ कर एक संत हो गए, आप उनके इस कारनामे से कितना फायदा उठाते हैं ये देखना है।
अवस्थी जी के साथ साथ हर पढ़ने वाले को भी मेरी दिली मुबारकबाद और अशेष दुआएं।
चलते चलते पीयूष जी का एक मुक्तक मेरी ओर से तोहफे के रूप में स्वीकार कीजिये।
मैं कहानी, मैं हूँ कविता, मैं कथा हूँ
मैं अलिफ हूँ, इल्म की मैं इब्तिदा हूँ
मैं वो सीढ़ी जिससे तू ऊपर चढ़ा है
मैं पिता हूँ, मैं पिता हूँ, मैं पिता हूँ
