पीयूष अवस्थी की ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

पीयूष अवस्थी की ग़ज़लें

पीयूष अवस्थी

(1)

जबसे सुना है हमने कि उसका नहीं हूँ मैं

सच मानिये कि ख़ुद भी तो अपना नहीं हूँ मैं

मैं कर न पाया जिसकी भी हर बात हाँ में हाँ

उन सबके वास्ते भी तो अच्छा नहीं हूँ मैं

आँसू न पोछ पाऊँ मैं उसकी भी आँख के

यूँ अपने आप से भी तो रुसवा नहीं हूँ मैं

जीते हैं जिस तरह से यहाँ लोग ज़िन्दगी

मैं सच बताऊँ यार कि वैसा नहीं हूँ मैं

आते हैं मुझसे मिलने फरिश्ते भी रात को

तनहाइयों में रहता हूँ तन्हा नहीं हूँ मैं

तुम मुझमें डूब जाओ कि बस तैरते रहो

दरिया हूँ तेरे प्यार से गहरा नहीं हूँ मैं

रस्ता कहीं तो जा के रुकेगा ज़रूर ही

ये सोच के ही राह में ठहरा नहीं हूँ मैं

(2)

बड़ा अजीब रहा दर्द का सफ़र साहिब

क़दम-क़दम पे रहा हादसों का डर साहिब

न पूछ कैसे जिया हूँ, बिखर-बिखर के मैं

कोई जो फूल भी फेंके, तो लगता डर साहिब

मैं अपने घर को भी अपना ही घर कहूँ कैसे

मेरे ही घर में बने हैं बहुत से घर साहिब

है ज़िन्दगी तो मेरी पर हैं फैसले उनके

मेरे ही काँधों पे है कोई और सर साहिब

ज़रा सी और जगह क़ब्र में बड़ी कर दो

कहीं तो चैन मिले मुझको लेटकर साहिब’

– पीयूष अवस्थी

मुख्य संपादक

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