पीयूष अवस्थी की ग़ज़लें     

पीयूष अवस्थी की ग़ज़लें

पीयूष अवस्थी

(1)

उससे मिलने का कोई जब सिलसिला मिल जाएगा
उसके दिल तक जाने का कुछ रास्ता मिल जाएगा

उम्र भर उसने पढ़ा है आइना बनकर मुझे
देख ले उसकी नज़र मेरा पता मिल जाएगा

उसके चेहरे पर पड़ा परदा हटाकर देखिये
इक कँवल तो झील में खिलता हुआ मिल जाएगा

फूल के गमलों को आँगन में सजाकर देखिये
बन्द कमरों को भी खुशबू का पता मिल जाएगा

इन अँधेरे रास्तों पर कुछ दिये रखता तो चल
इक दिया दिल में तेरे जलता हुआ मिल जाएगा

(2)

एक हैरत सी है अभी मुझमें
कोई रहता है अजनबी मुझमें

इस मुहब्बत पे था यकीं जिसको
अब नहीं है वो आदमी मुझमें

एक छोटा सा हूँ दिया लेकिन
है उजालों की ज़िन्दगी मुझमें

तेरी नज़रों में प्यास है शायद
ग़ौर से देख, है नदी मुझमें

हर नये दर्द को ख़बर देना
और बाक़ी है कुछ खुशी मुझमें

एक बच्चे सा दिल ये रोता है
उनको दिखती है दिल्लगी मुझमें

दूर मत जा कि है अँधेरा बहुत
तेरे दम से है रौशनी मुझमें

– पीयूष अवस्थी

मुख्य संपादक

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