प्रेम का पंथ कराल महा

व्यंग्य

प्रेम का पंथ कराल महा

पूरन शर्मा

                बदकिस्मती से खैर शक्ल-सूरत तो हमें आलू-बुखारे सी मिली ही है, साथ ही कभी किसी हसीना ने हमारी तरफ देखने की भूल भी चाहे-अनचाहे रूप से नहीं की है। मौहल्ले की अनारकली को पता था कि हम उस पर जान छिड़कते हैं और वह ‘वन साइडेड गेम’ एक लंबे अर्से से चल रहा है, पर हाय री किस्मत उसने कभी हम पर देखने तक की इनायत नहीं बरती, उल्टे एक दिन रास्ते में हमारे गालों पर हाथ फेरकर अनारकली ने हमें बच्चों की तरह समझाया भी-‘मेरे बच्चू सलीम, तुम्हारे घर के तमाम बुजुर्ग मेरी आशिकी की कतार में वर्षों से खड़े हैं, तुम्हें उस लाइन में लगना वैधानिक रूप से ठीक नहीं है, अच्छा हो तुम अभी पढ़ो, लिखो और सुनो आगे से कभी सीटी बजाई तो तुम्हारे इस मासूम थोबड़े का भुरता बना दूँगी।’

हिम्मत करके मैंने धीरे से कहा-‘लेकिन मैं आहत हूँ वन साइडेड गेम से।’

‘वन साइडेड गेम’ का अंजाम बुरा होता है मेरे नादान सलीम। अभी तुम अनुभवहीन नए मरीज हो। थोड़ा प्रेम में गच्चा खाओगे तो अनारकली से नैन लड़ाने के खामियाजे का पता चल जाएगा। फिर सलीम प्रेम का पथ बड़ा कठिन होता है, इस पर चलना बड़ा टेढ़ा कार्य है। जाओ गैस पेपर और पास बुक्स पढ़कर बी.ए. पास करने का जुगाड़ करो। ऐसे भी अनारकली से क्या उलझे कि पांच वर्ष में भी स्नातक नहीं बन सके। अनारकली ने व्यावहारिक सलाह दी।
परन्तु हमें तो प्रेम का दंश लग चुका था। अतः निरी मासूमियत से बोले-‘अनारकली, छोड़िए भी इस बी.ए., एम.ए. के चक्कर को, आपकी जुल्फों की छांह मिले तो जीवन की तमाम डिग्री व डिप्लोमा एक साथ हासिल कर लें। वर्षों से आस लगाए बैठे हैं परन्तु आपने कभी इस कद्रदान की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखा है, भला दीवानों पर ऐसा भी क्या कोफ्त ?’

अनारकली ने सिर के बाल पकड़े और मुझे पूरा झिंकोड़ कर कहा-‘सुनो सलीम, पानी सिर के ऊपर से होकर गुजरे, उससे पहले तैरना सीख लो वरना अनारकली के प्रेम दरिया में गिरकर तबाह हो जाओगे।’
यह कहकर अनारकली तो चली गई, परन्तु हमारी दशा और भी बदतर थी। हमारा ख्याल था कि चलो अनारकली ने किसी बहाने बातचीत तो की और ईश्वर ने चाहा तो जल्दी ही परिणाम अच्छे रूप में सामने आएंगे। एक दिन अनारकली सब्जी खरीद रही थी।

हमने जाकर प्रस्ताव किया-‘सब्जी का थैला हमें दे दीजिए, आपकी नरम कलाइयां भला आलू और टमाटर अथवा गोभी का वजन बरदाश्त करने लायक नहीं हैं।’ अनारकली ने कनखी से देखा और मुस्कुराकर थैला हमें थमा दिया। हम उनके पीछे-पीछे थैला लिए घूमते रहे और वे थैले को भरने में लगी रहीं।

हालांकि हमारे हाथ जवाब देने लगे थे, परन्तु हार मानना तो प्रेम में परास्त होना था। साथ ही अनारकली स्वयं कह चुकी थी कि प्रेम का पंथ बड़ा कठिन होता है। अतः थैला हाथों में बदलते पसीने पोंछते रहे। दस किलो वजन डलवाने के बाद अनारकली ने घर की सुध ली, हमने प्रस्ताव रखा-‘रिक्श ले लेते हैं।’

वे बोलीं-‘घूमते-घामते, बातचीत करते चलते हैं सलीम।’

हम तो धन्य हो गए, थैले का दस किलो वजन कम होता लगा। तभी अनारकली को पता नहीं क्या सूझा, वह पलटी और बोली-‘सुनो आज एक पूरा कद्दू भी लेना है।’

कद्दू का नाम सुनते ही चेहरा पसीने से भीग गया। अनारकली ने ग्यारह किलो का एक कद्दू खरीदा और धर दिया मेरे सिर पर। मैंने कहा भी कि मैं उनका सलीम हूँ। मुझ पर थोड़ा सा रहम खायें। परन्तु अनारकली ने फिर यही बात कहकर चुप कर दिया कि प्रेम का पंथ बड़ा कठिन होता है। हमने सोचा हो सकता है कि दुनिया के सभी प्रेमी इसी तरह पहले कद्दू ढ़ोते रहे हों। अतः हाथ में थैला तथा सिर पर कद्दू उठाए हम चलते रहे। परन्तु आधे रास्ते तक आते-आते तो सारे हौंसले जवाब देने लगे तथा प्रेम का कपूर उड़ने लगा। हमने कहा-‘थैला तो आप ले लीजिए अनारकली जी।’

वे बोलीं-‘मेरी ये नरम कलाइयां भला गोभी और आलू का वजन उठाएं और आप देखते रहें, यह कैसे होगा ?’
‘फिर रिक्शा कर लीजिए।’ मैंने कांपते और लड़खड़ाते कदमों से चलते हुए कहा।
‘रिक्शा से घर जल्दी आ जाएगा सलीम।’

‘मैं भी तो यही चाहता हूँ मेरे मौहल्ले की अनारकली।’ हमने कहा।
अनारकली बोली-‘मुझे तुम्हारा साथ थोड़ा ज्यादा समय चाहिए। फिर अभी पहले फोटो स्टूडियो चलकर तुम्हारा यह पोज भी उतरवाना है।’

‘लेकिन मेरा कसूर क्या है ?’
‘प्रेम की सजा तो भुगतनी ही पड़ती है सलीम। मजनूं, फरहाद और हीर ने क्या-क्या नहीं किया था अपनी नायिकाओं के लिए। तुम एक कद्दू ले जाने में नाक भौं सिकोड़ रहे हो।’ अनारकली ने कहा।
हमने पूछा-‘लेकिन तुम इतने बड़े कद्दू का करोगी क्या ? इससे पहले तो तुमने इतना बड़ा कद्दू नहीं खरीदा ?’
‘तुम्हें पता नहीं है सलीम, पूछो तुम्हारे बुजुर्गवारों से, वे कितनी बार कद्दू, तरबूज और खरबूजे अपने सिर पर ढ़ोकर अपनी खोपड़ी पिलपिली करवा चुके हैं।’

‘परन्तु अब मैं ज्यादा दूर नहीं चल सकता। देखो बाजार के तमाम लोग मुझे देखकर हंस रहे हैं। मेरी थोड़ी तो इज्जत करो।’ मैंने गुजारिश की।

परन्तु अनारकली ने कहा-‘जब प्यार किया तो डरना क्या। लोगों की परवाह मत करो सलीम। उन्हें पता है आशिक का कचूमर इसी तरह निकलता है।’

पसीने से नहाया मैं अन्तर्द्वन्द्व का शिकार था। तभी मेरा स्वाभिमान जागा और मैंने कद्दू को रास्ते में फेंक दिया। अनारकली ने तैश में मुझे घूरा और कहा-‘यह क्या किया तुमने सलीम ?’
मैं आसमान से तारे ला सकता हूँ अनारकली, परन्तु बाजार से कद्दू कभी नहीं लाऊँगा।
तो फिर कान खोलकर सुन लो, ‘मुझे भी तारों की जरूरत नहीं है। मुझे कद्दू चाहिए, कद्दू। प्रेम का दंभ भरते हो और पता नहीं है इसके रास्ते में कितने कांटे हैं।’ अनारकली ने मुझ पर थूका।

हमने कहा-‘कांटे बर्दाश्त कर सकता हूँ परन्तु कद्दू नहीं।’
‘अनारकली ने एक नहीं सुनी और वह हाथ से थैला छीनकर रवाना हो गई। मुझे भी लगा कि वाकई प्रेम का पंथ बड़ा कठिन है। अनारकली को पाना उतना सहज नहीं है। जितना हमने समझा था। इससे बढ़िया तो ‘वन साइडेड गेम’ ही है। जिसमें कद्दू तो सिर पर नहीं रखना पड़ता। फिर भी मैं रास्ते में लुढ़के हुए प्रेम के प्रतीक कद्दू को काफी देर तक निहारता रहा, इच्छा हुई इसे ही घर ले चलूं।’

मौलिक एवं अप्रकाशित व्यंग्य

(पूरन सरमा)
124/61-62, अग्रवाल फार्म,
मानसरोवर, जयपुर-302 020,
मोबाइल-9828024500

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