खुल कर कह दे, मन में क्या है ?
सच कह दे, उलझन में क्या है ?
मौसम है तो फूल खिले हैं,
वरना इस उपवन में क्या है ?
व्यक्ति नहीं, गुण पूजे जाते,
हाड़-मांस के तन में क्या है ?
मंहगाई में गुण सुरसा का,
छोटे से वेतन में क्या है ?
“प्रेम”नहीं जिस के जीवन में,
फिर उस के जीवन में क्या है ?
– प्रेम प्रकाश “प्रेम”
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