प्रेम रसायन है दर्शन नहीं !
समय की आवाज़
प्रेम रसायन है दर्शन नहीं !
दीप प्रकाश गुप्ता
प्रेम अंधा नहीं होता, अंधा तो व्यक्ति होता है। प्रेम कोई व्यक्ति थोड़ी है जो अंधा या बहरा होगा।दरअसल किसी अंधे को प्रेम हो गया तो उसने कह दिया कि प्रेम अंधा होता है।अंधे के लिए तो पूरी दुनिया ही अंधेरी है। किंतु अंधा है कौन? जिसके पास आंख नहीं क्या वो अंधा है?अंधा वो है जो आंख होते हुए भी देखना नहीं चाहता,जो जागना नहीं चाहता वो है अंधा।प्रेम में धोखे खा चुके लोग अधिकतर वो लोग हैं जो जागे हुए नहीं हैं जिनको आंख हैं किन्तु वो अहंकार के कारण देखना नहीं चाहते,जागना नहीं चाहते।धोखेबाज व्यक्ति के चेहरे पर स्पष्ट लिखा होता है कि वो धोका दे सकता है किन्तु आंखें तो सब देखकर भी धोखे खा जाती है।प्रेम में धोखा मिलने का अर्थ है कि प्रेम था ही नहीं वो आकर्षण था।आकर्षण क्या है?जो चीज आपको पसंद आती हो अगर वो किसी व्यक्ति में दिखने लगे तो आकर्षित हो जाते हो।एक काल्पनिक कहानी से बहुत कुछ स्पष्ट हो जावेगी…।
एक लड़की बड़ी मासूम सी,बड़ी संवेदनशील…उसको कुछ चीज़ बहुत पसंद आती थी जैसे उसे ऐसा इंसान पसंद आता था जो मुंहफट हो..किसी से लड़ लेता हो..ताकतवर हो..संयोग से उसे वैसा ही लड़का मिल गया….अब चूंकि उस लड़के में उस लड़की को अपने पसंद की बहुत सारी चीज़ें मिल गई अब वो लड़की उस लड़के के प्रति आकर्षित हो गई…एक पागलपन का नशा सवार हो गया… हर दिन हर रात वो उसको ही निहारना चाहती थी,उसके बिना एक पल भी जीना गवारा था…वो उसको पाने के लिए जाने कितने जतन किए…अंततः वो लड़का उसको धोखा दे गया….!!!!क्या क्या क्या कहा….?हां तुमने सच सुना उस लड़के ने धोखा दे दिया….अब लड़की का राग अलाप शुरू..अरे मैंने तो प्यार किया था उससे..सारा दिन सारी रात उसकी यादों में पलकें भिगोए हैं मैंने…उसको हर पल निहारा है मैंने…उसको पाने के लिए कितने जतन किए…क्यों मिलता है अच्छे लोगों को धोखा क्यों मिलता है…. मैंने क्या बिगाड़ा था उसका…(नोट-कहानी का पात्र लड़का भी हो सकता था उदाहरण के लिए प्रयोग किया गया है)
मैंने कल्पना किया जैसे वो मेरी की कहानी लड़की मेरे पास आ गई…. मैंने उससे पूछा सुनो बच्चे क्या तुम्हें लगता है कि तुमको उससे प्यार था?उसने कहा हां प्यार था मैंने उसके लिए क्या नहीं किया,सारा दिन सारी रात उसके बारे में ही सोचा…उसके लिए क्या नहीं किया हर पर मुझे सिर्फ उसका ही ख्याल रहता था।मैंने उसको बिठाया और कहा..सुनो मान लो तुम बाज़ार में जा रहे तुम्हें कोई शो रूम में कोई स्कूटी पसंद आ गई,अब तुम उसे खरीदना चाहती हो तो अब या तो तुम पापा को कहोगी या फिर खुद से कमा कर उसे खरीदना चाहोगी…स्कूटी के खरीदने में जीत की अनुभूति होगी…स्कूटी खरीद लेना अर्थात स्कुटी को जीत लेना…हम जिस चीज को जीतना चाहते हैं उस चीज को लेकर प्यास होती है तड़प और बेचैनी होती है और जब वो चीज मिल जाती है तो कुछ क्षण तक जीत की आपार खुशी महसूस होती है और फिर वो खुशी खत्म हो जाती है।फिर कोई नई स्कूटी दिख जाती है ऐसा ही होता है।ये जो घटनाएं घटित हुई वो दो चीज के कारण घटित हुई पहला पसंद के कारण और दूसरा जीत की उम्मीद के कारण।इंसान किसी पसंद की चीज़ को किसी तरह जीतना चाहता है….इसलिए किसी इंसान को कोई लड़का या लड़का पसंद आ जाए तो उसे जीत लेना चाहता है अगर वो जीतने में असफल हो रहा तो फिर वो ब्लैकमेल करना शुरू कर देता है।
अर्थात व्यक्ति का “पसंद”और “जीत लेने की ललक”ये दोनों मिलकर व्यक्ति के भीतर जुनून और जोश पैदा करता है।पागलपन पैदा करता है,अंधा बना देता है।जीत लेने में अलग ही जुनून होता है इसलिए आमतौर पर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले लोग….जीतने की ललक रखते हैं जुनून सवार रहता है…जिस कारण वो बहुत महत्व पूर्ण चीज भी जीवन में छोड़ देते हैं…..आपको ऐसा लगता है जैसे ये प्रेम है…किंतु ये प्रेम नहीं है….ये आपके पसंद की चीज़ों को पाने का केवल अहंकार मात्र है…जिसमें आनंद है,जोश है,जुनून है,नशा है,पागलपन है….और अगर ये सब आपके जीवन में पहली बार हो रहा तो फिर पागलपन का स्तर सर्वोच्च होगा….पहली बार अगर अपनी पसंद की चीज़ों को पाने की इच्छा जागृत हुई,पागलपन सवार हुआ तो इसी को पहला प्यार कह दिया जाता है।किंतु ये प्रेम नहीं….पर वास्तव में फिर प्रेम है क्या?
प्रेम रसायन है दर्शन नहीं।
“आपके चेतना की संगति किसी अन्य चेतना के साथ हो जाना ही प्रेम है।”
रसायन शास्त्र कहता है “लाइक डिजॉल्व लाइक”अर्थात जो जैसा है वो अपने भीतर वैसे को ही घोलना चाहता है।पानी में पानी ही घुलेगा तेल नहीं।अगर पानी में पानी को घोल दिया जाए तो पता भी न चले की पानी में कुछ मिलाया भी गया है।दो से एक होने की क्रिया…घुल जाने की क्रिया प्रेम है।जो आपकी मूल चेतना है,जो आपका मूल स्वभाव है अगर ठीक उसी तरह का कोई व्यक्ति आपके करीब आ गया और आपकी चेतना ने उसे महसूस कर लिया तो फिर वो प्रेम होगा।किंतु प्रेम होने में लंबा समय लग जाता है,आप एक बार दो बार तीन बार आकर्षण के कारण धोखा खा चुके होते हैं।आप अपने दिल के दरवाजे बंद कर लेते हैं जैसे अब तो प्रेम होगा ही नहीं,अब तो प्रेम करना ही नहीं,अब किसी को दिल में जगह देना ही नहीं है।यही वो समय है जब आपके जीवन में प्रेम का आगमन होता है।आप दरवाजे बंद कर चुके हैं दिल के…फिर भी एक झटका मिलता है जैसे खोलो दरवाजा अब सही चीज़ मिल रही है तुम्हें….फिर इंसान धीरे धीरे चुनाव करने के सलीके को सीख जाता है तब जो बंधन होता है वो प्रेम का बंधन होता है।फिर उस प्रेम में घुल जाने का बोध होता है,स्थिरता और शांति महसूस होने लगती है।उसमें चंचलता नहीं होती है।घुल जाने में क्या चंचलता उसमें तो स्थिरता है।
चंचलता तो तब थी जब आप किसी ऐसे व्यक्ति को पसंद कर रहे थे जो आपके लिए सही नहीं था और ऐसे व्यक्ति को इग्नोर कर रहे थे जो आपके लिए सही था।क्योंकि तब आपको चुनाव करने नहीं आता था।तब आपकी छठी इंद्रियां विकसित नहीं हुई थी।प्रेम चेतना के घुल जाने का नाम है।दो से एक हो जाने का नाम है।आपका मूल स्वभाव जैसा है वैसा ही अगर कोई व्यक्ति मिल गया तो फिर आप एक जैसा महसूस करेंगे यही प्रेम है। आप संवेदनशील हैं आपको आपके जैसा ही कोई मिल गया।आप केयरिंग नेचर के हैं आपको आपके ही जैसा कोई मिल गया।।।।इसमें बहुत अधिक चंचलता,पागलपन जुनून तो नहीं होती इसलिए ये कम आकर्षित करने वाला होता है।प्रेम स्थिरता का बोध कराता है…जबकि पसंद और आकर्षण पागलपन और जुनून का बोध कराता है।
पागलपन और जुनून में मजा है जबकि प्रेम में स्थिरता और शांति इसलिए व्यक्ति प्रेम से प्रभावित नही होता बल्कि आकर्षण से अधिक होता है।
– दीप प्रकाश गुप्ता
लेखक, विचारक
समस्तीपुर बिहार