रोटी का धर्म
कथा- कहानी
रोटी का धर्म
पीयूष अवस्थी
रजिया अब पचपन बरस पार कर चुकी थी,काले सफेद बालों की खिचड़ी सर पर झलकने लगी थी ! तीखे नयन नक़्श देखकर लगता था कि वह जवानी में अत्यंत सुन्दर रही होगी !
कुछ महीने पहले अपने शौहर के इंतकाल के बाद ,रजिया ख़ुद को अकेला महसूस करने लगी थी,उसके चेहरे की चमक गायब हो चुकी थी, आँखों के नीचे कालिमा गहरा गई थी, माथे पर सलवटें पड़ने लगी थीं !
रजिया के दो बच्चे थे एक अनवर जो अब लगभग 15 बरस का था और एक बेटी शबाना जो 12 साल की थी ,दोनों स्कूल जाते थे, रजिया आठवीं तक पढ़ी थी, उसने सोच रखा था जैसे भी वह अपने बच्चों को बड़े स्कूल तक पढ़ायेगी !
उसके पति एक ब्रश कम्पनी में काम करते थे,अच्छे कारीगर थे, आमदनी भी ठीक थी,उसपर वह ओवरटाइम करके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, स्कूल- फीस का पुख़्ता इंतजाम कर लेते थे, रजिया भी मेहनती थी, घर का सारा काम करना, बच्चों को तैयार कर टिफिन के साथ स्कूल भेजना, पति को सुबह का नाश्ता और काम पर जाने के लिए टिफिन आदि लगाना, कपड़े धोना ,घर की साफ-सफाई करते कब दिन निकल जाता ,उसे पता नहीं चलता, पति उसे प्यार से रज्जो बुलाते थे, इसलिए पड़ोस के लोग भी उसे रज्जो ही बुलाते थे !
रजिया जिस बस्ती में रहती थी वहाँ अधिकतर हिन्दुओं की बस्ती थी,वातावरण और माहौल ने उसे हिन्दू औरतों की तरह जीना सिखा दिया था, आस-पड़ोस की औरतों से उसकी हँसी- ठिठोली चलती रहती थी, अधिकतर सब उसे रज्जो बुलाती थीं, बगल में सक्सेना चाची ,सामने निगम साहब की बहू पुष्पा और बहुत से घरों में उसका आना जाना था, पड़ोसिन चाची तो उसे मसाले कुटवाने को बुला लेती थीं, सबके साथ उसे होली दीवाली मनाना खूब अच्छा लगता था ,जब किसी रिश्ते-नाते में जाना होता ,तभी वह बुर्का पहनती थी ,वरना धोती और सलवार सूट उसके पसंदीदा पहरावे थे ! सभी रज्जो की तारीफ करते थे, महल्ले के बुजुर्गों का उसे खयाल रहता था ,उसके सर से दुपट्टा नहीं गिरता था, कोई देखकर नहीं कह सकता था कि वह हिन्दू है या मुसलमान ,उसके पति भी खुशमिजाज थे , उनमें कोई धार्मिक कट्टरता की भावना नही थी ! सबसे दुआ सलाम, नमस्ते करना उनकी आदत में शुमार था !
अचानक पति की मौत ने उसे झकझोर दिया था, धीरे-धीरे तीन महीने बीत गये और अब उसे घर चलाने,बच्चों को पढ़ाने की चिन्ता सताने लगी, जो कुछ थोड़ी जमा पूँजी थी वह भी ख़त्म होने की कगार पे थी ! आँगन की दीवार पर पीठ टिका वह आसमान ताके जा रही थी, जैसे अल्लाह से पूछ रही हो “ऐसा क्यों किया ?”
सोचते-सोचते अचानक बड़बड़ाई -नहीं ! मैं नहीं हारूँगी ! अपने बच्चों को पढाऊँगी, काम करूँगी, मेहनत मजदूरी करूँगी !
उसके घर से थोड़ी ही दूर बहुत अपार्टमेंट बने थे ,सोसाइटी में लोग रहते थे ,उसके महल्ले में यादव जी रहते थे जो किसी सोसाइटी में ठेकेदार थे ,यादव जी की पत्नी से उसकी अच्छी दोस्ती थी, वह यादव जी के घर जाकर उनसे बात कर आई ” भाई साहब ! आप तो जानते ही हैं, बड़ी मुश्किल में हूँ , आपकी सोसाइटी में खाना बनाने का काम ही दिलवा दीजिये !
रजिया खाना बनाने में बहुत होशियार थी,उसे खाना बनाना अच्छा भी लगता था खूब मन लगता था, एक सप्ताह में ही उसे दो घरों में खाना बनाने का काम मिल गया था ! यादव जी उसकी जिम्मेदारी ली थी,उसका नाम उन्होंने ‘रज्जो’ ही बताया था ,कहा था मेरे गाँव-पड़ोस की है !
लोगों को उसका व्यवहार और खाना बेहद पसंद आने लगा था ,लेकिन सिर्फ दो घरों के काम से उसे कुछ राहत तो मिली लेकिन अभी भी तंगी कायम थी,वो और घरों में भी काम ढूँढने लगी, उसने गार्ड से भी कह रखा था,किसी को ज़रूरत हो तो मुझे बता देना !
अभी डेढ़ महीना ही हुआ था कि एक दिन अचानक जिनके घर खाना बना रही थी, एक छोटे बच्चे ने काँच की कटोरी फर्श पर फेंक दी, काँच चारो तरफ बिखर गया था, रज्जो चौंक गई, उसने जल्दी से बच्चे को गोद में उठा लिया और उसके मुँह से- “हाय अल्ला” निकला ,तब तक आवाज सुनकर बच्चे की दादी भी किचेन में आकर खड़ी हो गई थीं, उन्होंने रज्जो के मुँह से निकला ” हाय अल्ला” सुन लिया था,
वह जोर से चिल्लाते हुये बोलीं- चल पहले काँच साफ कर” रज्जो जल्दी से झाड़ू ले काँच साफ करने लगी,दादी के चेहरे पर गुस्सा तमतमा रहा था !
तो —तू मुसलमान है ,पहले बताया क्यों नहीं?
माँ जी ! आपने पूछा नहीं, मैं तो नहा धोकर, साफ सुथरी होकर आती हूँ, खाना भी मन से बनाती हूँ !
बनाती होगी ! लेकिन “ओम नमो नारायण” हम लोग हिन्दू है और तू मुसलमान, सारा पूजा-पाठ बेकार कर दिया, जा कल आकर अपना हिसाब ले जाना, अभी से तेरा काम ख़तम !””
रज्जो रुआँसी हो गई ,उसने पलटकर कुछ नहीं कहा ,वह फ्लैट से बाहर निकल आई ! जोर से दरवाज़ा बन्द होने की आवाज़ सुनाई दी ! दूसरे घर तक भी यह बात पहुँचने में देर नहीं लगी, रज्जो समझ गई थी अब सोसाइटी में काम मिलना मुश्किल है,रोज किसी न किसी बहाने डाँट खाना है ,और अब मुसलमान का ठप्पा भी ! वह आँसुओं को बार-बार पोछती पैदल अपने घर की तरफ चल दी !
घर पहुँच कर वह निढ़ाल सी चारपाई पर औंधे मुँह लेट गई ,कुछ देर सिसकियाँ लेती रही, बच्चों की आवाज़ सुनते ही उसने खुद को संभाला, आँसू पोछकर सामान्य सी हुई और गुसलखाने में जाकर मुँह धोया ! यह सारे ख़याल उसने मन से झटक दिए, कहीं मुझे उदास देख बच्चे न मायूस हो जायें ! बच्चों को नाश्ता खाना खिलाकर फिर वह अपने काम पर लग गई !
अब उसने सोसाइटी जाना छोड़ दिया था, बच्चों ने पूछा तो उसने कह दिया– सब लोग बाहर गए हैं अभी छुट्टी है जब आ जाएंगे तो काम पर जाऊँगी !
बच्चे तो बहल गये लेकिन अपने मुसलमान होने की कीमत जो उसे चुकानी पड़ी वह उसके मन को बार-बार टीसती रहती ! इसी तरह लगभग एक महीना बीत गया !
तभी अचानक एक दिन उसकी फूफी घर आई हालचाल लेने !
अरे —!फूफी आप !! उसका चेहरा खुशी से खिल उठा ,वह दौड़कर फूफी से लिपट गई, खुशी के मारे उसकी आँखें छलछला आईं !
फूफी उसी शहर में करीब दस किलोमीटर दूरी पर रहती थी ! रज्जो और फूफी के नज़दीकी रिश्तों के साथ सगी बहनों जैसी मजबूत दोस्ती भी थी ,किसी सहेली की तरह ही दोनों अपने दुख-सुख बाँटती थीं !
रजिया जल्दी से चाय बना लाई, साथ में कुछ नमकीन भी ! फूफी –चाय ! थक गई होंगी !
अरी रज्जो ! अब थकान कहाँ, काम में लगी रहती हूँ, घर में सब अच्छा चल रहा है,खुश हूँ, बच्चे भी पढ़ाई कर रहे हैं और मेरे काम में हाथ भी बटा लेते हैं,बड़े वाले लड़के ने कम्प्यूटर की पढ़ाई पूरी कर ली थी उसे अच्छी नौकरी मिल गई है,कुछ अलग से भी काम घर पर कर लेता है, घर में बाकी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का ख़याल रखता है !
तेरा चेहरा क्यूँ उतरा-उतरा है, तेरा हाल भी नहीं मिल पाता, अबकी आऊँगी तो तेरे लिए एक फून भी लेती आऊँगी ,तुझसे बात करने का बहुत मन करता है !
अब बता क्या बात है ? सुना था कुछ काम मिल गया है ,कैसा चल रहा है ?फूफी ने बहुत आत्मीयता से उसके सर पर हाथ फिराकर पूछा !
रजिया की आँखों में आँसू तैर गये, क्या बताऊँ फूफी—- शुरू होने से पहले ही ख़तम हो गया, दो घरों में खाना बनाने का काम मिला था, पूरे मन से काम कर रही थी,फिर भी वो किसी न किसी बहाने डाँटते रहते थे ,कल नमक कम था,तीखा ज़्यादा हो गया,फिर भी मैं कहती ध्यान रखूँगी, खामोशी से अपना काम करती थी ! फिर उसने फूफी की सारी कहानी सुनाई —-! फूफी भी उसकी बातें सुनकर दुखी हो गई !
फूफी के मन में दुख के साथ गुस्सा भी था ,बोलीं—-अरे तो क्या ! मुसलमान होना कोई गुनाह है क्या ? हमारे पुरखे भी किसी ज़माने में हिन्दू थे, कितने मुसलमान हैं जो पहाड़ों में बने मन्दिरों पर काम करते हैं, सामान ढोते हैं ,सवारियाँ ढ़ोते हैं,होटलों में खाना पकाते हैं ,परोसते हैं, उन्हें तो अपनी सुविधा के लिए कोई कुछ नहीं कहता —हुँ–ह ! अपनी मजबूरी हो तो कोई जात-पात नहीं !
तू घबरा मत रज्जो ! अभी तेरी फूफी जिंदा है, सब ठीक हो जाएगा !
मगर—कैसे ! रज्जो ने पूछा ! वह मायूसी से बोली घर का खर्च चलाना है, दो बच्चे हैं, बच्चों को पढ़ाना है,नहीं तो जाहिल बनेंगे, गलत हाथों में पड़ेंगे, मजदूरी करेंगे ! रज्जो सिसकियाँ ले रोने लगी !
फूफी ने उसे अपनी बाहों में समेट लिया ! फूफी ने उसके आँसू पोछे –चुप कर पगली ! तू तो मेरी हिम्मती रज्जो है- मेरी बेटी है ,मेरी सहेली है ,तू है तो मेरा मायका है ,तेरे सिवा कौन है मेरा !
मुझे देख दस बरस पहले तेरे फुफ्फा छोड़ गए,तेरे दो बच्चे हैं, मेरे तो छै बच्चे हैं ,और तब तो सभी बहुत छोटे थे ,किसी ने कोई मदद नहीं की, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी ,अब सब पढ़ाई कर रहे हैं, नौकरी भी ! अब अपना मकान भी पक्का हो गया है, अब बड़की बिटिया की शादी भी तय हो गई है अच्छे घर में,जल्दी ही वह भी जिम्मेदारी पूरी कर लूँगी !
आपने ये सब कैसे किया फूफी ?
अब गौर से सुन मेरी बात–दूसरे घरों में काम करेगी, डाँट भी खाएगी और पैसा भी कम मिलेगा ! तू अपना खुद का काम कर !
अपना काम —मगर कैसे ?
अरे ! जो मैं दस साल से कर रही हूँ, अब तो सबीना और सलाम भी संभाल लेते हैं, खूब अच्छी कमाई हो जाती है, बस थोड़ी सी मेहनत है ! और वैसे भी तुझे कुछ तो करना ही होगा !
मगर—किस तरह !! रज्जो ने झिझकते हुए पूछा !
कुछ नहीं ! मैं सुबह उठती हूँ, सब्जी मंडी जाती हूँ, मंडी से सब्जी लाकर उसे घर पर ही खूब साफ करती हूँ, फिर ठेली में लादकर पड़ोस के अपार्टमेंट के कोने में जहाँ और भी दुकानें लगती हैं,वहीं दुकान लगाती हूँ, अब तो मुझे सब पहचानते हैं,मैं बहुत ज़्यादा सामान नहीं लाती, ताज़ी सब्जियाँ लाती हूँ, शाम तक थोड़ा बहुत ही बचती हैं, वो वापस ले आती हूँ ! सब पैसा नगद और पेटीएम पे आता है,बड़े लड़के शाहिद ने सब बैंक से करा दिया है, शाम को वही सारा हिसाब मिला लेता है ,और अब तो मैं भी सीख गई हूँ !
लेकिन मैं—मैं तो बाहर बाज़ार में ! कैसे बेचूँगी ? कैसे सामान लाऊँगी ! रजिया ने मायूसी से कहा !
चल पगली—-अब ज़माना बदल गया है ! तू बुर्का पहनकर सब्जी बेचेगी क्या ? जैसा तेरा पहरावा है ऐसे ही जा ! अरी तू तो इतनी सुन्दर है लोग तुझे ही देख सब्जी खरीदने आ जायेंगे, फूफी ने ठिठोली करते कहा, रज्जो को भी हँसी आ गई !
मैं खुद दो-चार दिन तेरे साथ तेरी दुकान पर बैठूँगी, कैसे सामान बेचती हूँ–देखती रहियो, सब सीख जाएगी और तेरी झिझक भी ख़तम हो जाएगी !
लेकिन फूफी —सामान कैसे लाऊँगी—-मेरे पास तो —!
मैं जानती हूँ ,घबरा मत, मैं तेरी फूफी ही नहीं तेरी सहेली भी हूँ, और फूफी ने अपने पर्स में हाथ डालकर पाँच हज़ार रुपये रज्जो की हथेली पर रख दिये, रख ले–कम पड़ेंगे तो और दे दूँगी !
अरे ! ये क्या फूफी ! आप तो वैसे भी मदद करती रहती हैं, अब ये—-! रज्जो असमंजस में पड़ गई !
फूफी बोली-ज़्यादा परेशान मत हो,जब तेरा काम चलने लगे तो धीरे-धीरे मुझे वापस कर देना ! अब मैं सत्तर साल की हो गई हूँ, तेरे सिवा मेरा मायके में कौन है, तू ही मेरा परिवार है, छोटी बहन की तरह है, रख ले !
कल इतवार है, बच्चों की छुट्टी भी है, सुबह रिक्शा कर घर आ जाइयो, साथ में मंडी चलेंगे, तेरी सबसे पहचान भी करा देंगे, अब बहुत आढ़ती मुझे जानते हैं, तुझे भी ध्यान से सौदा देंगे !
और तबसे यह सिलसिला चल रहा है, कोई नहीं पूछता कि तुम हिन्दू हो या मुसलमान ! अब धीरे-धीरे वह सबके लिए “ताई” हो गई थी ,कोई उसे अब रजिया या रज्जो नहीं बुलाता था ! अधिकतर सब नये ज़माने के लड़के-लड़कियाँ आते थे, उसकी साफ सुथरी सब्जी और उसका व्यवहार देखकर सब उसे ‘ताई’ पुकारने लगे थे ,ताई सुनकर उसे अपनत्व सा लगता था, वह खरीदी हुई सब्जी के साथ अलग से धनिया मिर्चा देना नहीं भूलती थी ! इन्ही बातों से उसका व्यापार चौगुना हो गया थी, बराबर भीड़ बनी रहती थी, दोपहर के समय जब भीड़ कम होती तो वह शबाना या अनवर को दुकान पर बैठा, घर जाकर अधूरे काम भी कर आती थी, बेटा अब इंटर में पढ़ाई कर रहा था और बेटी शबाना नवीं कक्षा में थी !
आजकल के बच्चे होशियार हो गये हैं ,बेटे अनवर ने एक फोन माँ को दिला दिया था और उसपर पेटीएम भी ! अब उसे थोड़ा-थोड़ा चलाना भी आ गया था, उसको लेन-देन में बहुत आसानी हो गई थी !
एक दिन रज्जो जिस घर में खाना बनाने का काम करती थी ,उसकी बहू और बेटा भी उसकी दुकान आ पहुँचे !
टमाटर कैसे दिए ?
रज्जो ने सर उठाकर देखा, अरे ! ये तो बहू जी हैं ,उसने कहा—नमस्ते बहू जी !
अब सब्जी बेचती हूँ, वो भी बाजार में सबसे अच्छी वाली,इसमें मुसलमानी सब्जी कोई नहीं है, सब किसान की है, उसने हँसते हुए कहा !
अरे –न ताई ! वो तो माँ जी हैं पुराने ख्यालों की ! अब से हम यहीं से सब्जी ले जाया करेंगे !
रज्जो ने सब्जी तौल दी ,और अलग से बहुत सारा धनिया व मिर्चा डाल दिया ! उन्होंने पैसे चुकाए और नमस्ते करके चले गए ! फिर वह एकपल के लिए मुसलमान हिंदू के जुमले पर खो गई ! यह बात उसके ज़हन में गहरे से बैठ गई थी जो टीस बनकर उभरती रहती थी ,उसे आज कुछ खुशी सी महसूस हुई !
धीरे-धीरे वक़्त अपनी रफ़्तार पकड़ता गया,फूफी अक्सर उसके पास आकर हालचाल लेती रहती थी, और फोन पर अक्सर बातें होती रहती थीं, फूफी को देखकर उसका मन गदगद हो जाता !
इस तरह उसे काम करते पाँच बरस बीत गये !दोनों बच्चे पढ़ाई में होशियार निकले, आगे की पढ़ाई जारी थी, घर भी सुंदर हो गया था, घर में दरवाजे खिड़कियों पर नये परदे लहरा रहे थे और एक रंगीन टी.वी. कमरे की दीवार पर टँग गया था ! धीरे-धीरे उसने फूफी के पैसे भी लौटा दिए थे ! अब बस उसकी तमन्ना थी उसके बच्चे पढ़ लिखकर कोई अच्छी सी नौकरी पा जायें, उसका जीवन सफल हो !
रोजमर्रा की तरह आज फिर सुबह मंडी जाकर सब्जी खरीद लाई थी, सब्जियाँ धोकर उसने ठेले पर रख दी थीं, फिर घर की सफाई, बच्चों का नाश्ता व टिफिन तैयार कर बाज़ार जाने के लिये तैयार हो गई !आज इन्हीं कामों में घ्यान बंटने से उसका दूध जल गया था और उबलने से उसकी गैस और भगौना भी बेहद गन्दा हो गया था, उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था, मन खिन्न था ,फिर भी उसे काम पर तो जाना ही था, बच्चों के कॉलेज जाते ही वह भी ठेली लेकर बाजार की ओर चल दी !
रजिया ने फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे अपना ठीया बना रखा था, उसने चारो कोने पर बाँस गाड़कर उसने अपनी जगह पक्की कर ली थी, बाँसों के ऊपर से तिरपाल बाँध लेती थी जिससे धूप न लगे और सब्जी खराब न हो ! रोज सुबह की तरह आज भी रज्जो की दुकान आठ बजे सज गई थी !
सुबह दुकान खुलते ही गुप्ता पालीथिन के पैकेट समय पर दे गया था, उसके मायके में पालीथिन बैग को “मोमिया” कहा जाता था, वह भी पालीथिन लिफाफे को मोमिया ही कहती थी !
अरे –! गुप्ता जी ! कल बड़ी वाली मोमिया और दे जाइयो !
जी–रज्जो बहना ! कल ले आऊँगा !
ग्राहक आने शुरू हो गए थे, रज्जो ने एक पड़ोस के लड़के राजू को अपने काम पर रख लिया था, जिससे रज्जो को बहुत सहूलियत हो गई थी, रामू सामान तौलकर पालिथिन में भरता रहता था ,रज्जो सामान का मिलान कर पैसे जोड़कर ग्राहक को बताकर पैसे ले लेती ! कई परिचित चेहरे आते रहते,उनसे मुस्कुराकर हाल-चाल पूछती और महँगी हो गई सब्जियों पर ताने भी मारती रहती !
क्या करूँ बाऊजी ! बहुत महँगी अदरक और लहसुन है इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाती हूँ !
इसी तरह दोपहर के एक बज गये, गर्मी के कारण दोपहर में भीड़ कम हो गई थी, पेड़ की छाया उसे बहुत सुकून देती थी , उसने राजू से कहा- सब्जी पे पानी छिड़क दें ,बोरी से ढाँक भी दे !
दोपहर हो गई थी अब उसे भूख लग आई थी,खाने की याद आते ही उसे दूध जल जाने की याद आई, आज फिर दूध लेना पड़ेगा और भगौना भी कितना काला हो गया !
ताई !आप भी खाना खा लो, मैं भी अभी घर से खाकर आता हूँ ! राजू ने कहा
ठीक है ! जल्दी आ जाइयो ! मैं भी खा लेती हूँ !
राजू चला गया, रज्जो ने अपने झोले से अपना टिफिन निकाला और उसने खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसे ध्यान आया, उसने हाथ तो धोया ही नहीं ! कोने में रखी बाल्टी से जाकर हाथ धोने लगी—!
रज्जो हाथ धो ही रही थी कि उसे जोर की आवाज़ में ” ताई ! ताई ! की आवाज सुनकर वह चौंक पड़ी !
ताई ! वो–वो टिफिन ले गया ,टिफिन उठा लिया
टिफिन ? किसका टिफिन ? उसने अपने टिफिन की तरफ देखा, टिफिन वहाँ नहीं था ,अरे—कहाँ गया ?
बगल वाले दुकानदार की आवाज़ आई –अरे रज्जो बहन ! वो बन्दर उठा ले गया, पेड़ पर चढ़ा है !
उसने सर उठाकर पेड़ की तरफ देखा,एक बन्दर उसका टिफिन हाथों में थामे था !
अरे –नासपीटे ! छोड़ मेरा टिफिन !!
वो बन्दर रज्जो की तरफ काटने की मुद्रा में खो-खों करने लगा !
रज्जो ने नीचे पड़ा बेंत उठाया, जो उसने आवारा, गाय, सांडों को भगाने के लिए रखा था, उसने बेंत बन्दर की तरफ लहराया ,वो बन्दर पेड़ से कूदकर फुटपाथ की तरफ भागा !
रज्जो भी बेंत लिए उसकी तरफ भागी ! छोड़ मेरा टिफिन—छोड़ !
बन्दर एक पेड़ से दूसरे पेड़ की तरफ भागने लगा ! जब तक रज्जो वहाँ पहुँची वह उस पेड़ से कूदकर दूसरे पेड़ की तरफ भागा ! रज्जो भी डंडा लहराते हुए उसके पीछे भाग रही थी और जोर-जोर से चिल्ला भी रही थी —नासपीटे ! जहन्नुम जाएगा, मुसलमान की रोटी खायेगा, तेरा धरम भृष्ट हो जाएगा !अरे पापी हनूमान तेरे को सज़ा देंगे ! छोड़ मेरा टिफिन- छोड़ मेरा टिफिन —-!
रज्जो दौड़ते- दौड़ते हाँफ गई थी, थककर रुक गई, उसका गला सूखने लगा था और बन्दर –पेड़ों की ओट में कहीं खो गया था ! उसका गुस्सा देख कुछ को मुस्कुराहट भी आ गई थी, और दयाभाव भी !
वह निराश होकर थके-हारे क़दमों से अपनी दुकान की तरफ चल दी ! कमबख़्त –टिफिन ले गया—–जहन्नुम में जायेगा ! हिन्दू होकर मुसलमान का खाना खाता है, वह बड़बड़ाती हुई अपनी दुकान की तरफ बढ़ ही रही थी कि उसे अपनी दुकान के पहले एक पेड़ के नीचे सर पर गमछा बाँधे एक भिखारी जैसा बूढ़ा आदमी दिखाई दिया ,जो बड़े मजे से खाना खा रहा था, ऊँगलियाँ चाट कर खाना खा रहा था !
रज्जो ने दुबारा गौर से देखा ,ये तो उसका टिफिन है , ऐ–बाबा ! ये तो मेरा टिफिन है !!
भिखारी ने उसकी तरफ देखा भी नहीं ,कौर तोड़कर फिर खाने लगा !
रज्जो ने गुस्से से छड़ी ज़मीन पर पटकी” सुनाई नहीं देता क्या–? ते तो मेरा टिफिन है !
अब बाबा ने उसकी तरफ देखा ,बोला–हाँ–बहना ! ये अभी तक बन्दर का था, उसके हाथ से छूटा मेरी गोद में गिरा, दो दिनों का भूखा हूँ, मुझे लगा भगवान ने भेजा है ,बड़ा अच्छा खाना बनाती हो बहना !!
तुम हिंदू हो -राम-नाम की गमछी बाँधे हो–मैं मुसलमान हूँ तुम्हारा धरम भ्रष्ट हो जायेगा ! रज्जो का लहज़ा इस बार कुछ नर्म था !
हुँ—ह !! क्या बहना ! रोटी का भी कोई धर्म होता है ! अन्न का कोई धर्म नहीं होता, न ही भूखे का ! कहते हुए भिखारी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी !
उसकी बात सुनकर रजिया को जैसे होश आया ! यह ज्ञानी है इसने सही बात की है ,हिन्दू -मुसलमान, धरम मजहब सब गलत ! सब गलत ! इंसानियत ही सच्चा धरम है !
रोटी का कोई धरम नहीं ! उसके मन की सारी कुंठाएँ जैसे गायब हो गई थीं ,उसके चेहरे पर एक विजयी चमक थी,एक चुभी फ़ांस उसके दिल से निकल गई थी !
उसने भिखारी की तरफ मुस्कुराकर देखा, बोली—बाबा ! आप पूरा खाना खा लो ,मेरी पास में दुकान है,टिफिन मुझे दे देना ,कल से आपके लिए भी चार रोटियाँ लेकर आया करूँगी !
रजिया को लगा उसका पेट भर गया है ,एक अनोखी सी खुशी उसके दिल मे समाई थी ! वह मुस्कुराती हुई अपनी दुकान की तरफ चल दी !
*** • पीयूष अवस्थी