समाज – व्यवस्था में मूल्यों की चिंता करता एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि संकलन
समाज - व्यवस्था में मूल्यों की चिंता करता एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि संकलन
डॉ. पिलकेन्द्र अरोरा
सामजिक परिवर्तन -नियंत्रण द्वारा समाज को सजग -स्वस्थ बनाने में व्यंग्य विधा की महती भूमिका है। उस भूमिका को विशेष आयाम देती है वरिष्ठ साहित्यकार डा .सुरेश अवस्थी की सघः प्रकाशित कृति ‘डा.सुरेश अवस्थी के प्रतिनिधि व्यंग्य (सत्साहित्य प्रकाशन नई दिल्ली ) साहित्यकार चक्रधर शुक्ल द्वारा संपादित इस संकलन की 66 रचनाएं समाज के ‘सत्यम्’ का चित्रण करती हैं और उसके ‘शिवम’ और ‘सुंदरम् की शुभ कल्पना करती है, जो सृजन का मुख्य उद्देश्य है।
डा. अवस्थी कवि, शिक्षाविद और पत्रकार के रूप में विख्यात हैं। यह संकलन एक कवि के रूप में उनकी संवेदनशीलता, एक शिक्षाविद के रूप में उनके चिंतन और एक पत्रकार के रूप में उनकी सामाजिक चेतना का परिचय देता है।संकलन समाज, राजनीति,संस्कृति शिक्षा आदि क्षेत्रों के कटु ‘यथार्थ’ की चिंता करता है और ‘आदर्श’ के लिए आह्वान करता है।
विभिन्न विषयों पर केन्द्रित रचनाओं में महात्मा गांधी के राजनीतिकरण चिंता है और उनके बिखरे स्वप्नों का चित्रण भी। ऊंच -नीच राजनीति का वर्गीकरण भी है और नागरिकों के मात्र एक वोट में तब्दील हो जाने की व्यथा भी। चाकू -जंजीर संवाद के माध्यम से समाज में बढ़ रहें अपराधों की चर्चा भी है तो शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की ग्रुपबाजी और स्कूली शिक्षकों के शोषण का दुख भी । लेखक की व्यंग्य- दृष्टि व्यापक ही ही नहीं सूक्ष्म भी है।वह कभी अजन्मी कन्या के बयान के माध्यम से भ्रूणहत्या के कलंक का चित्रण करता है कभी खौफ की चादर द्वारा आंतकवाद के दंश का। कभी मदर्स डे, फादर्स डे के वैश्विक पाखंड को देख रिश्तों के बाजारीकरण से आहत होता है तो कभी डिजिटल युग में मनुष्य के हाइटेक मशीन बन जाने के खतरे से आशंकित । साहित्य में वह सम्मान पुरस्कार के साथ कई विसंगतियों से व्यथित भी है और हिंदी दिवस के औपचारिक कर्मकांड से पीड़ित भी। सरकारी हास्पिटल से लेकर श्मशान की विद्रूपताओं का चित्रण भी संकलन में है। रावण से इंटरव्यू के बहाने लेखक ने कई राजनीतिक ,सामाजिक विषमताओं पर मारक प्रहार किया है। और भी विषयों पर केन्द्रित सशक्त व्यंग्य रचनाएं संकलन में हैं जिनकी चर्चा करना पाठकों की जिज्ञासा और कौतुहल को समाप्त करना होगा! क्रिकेट की भाषा में कहा जा सकता है कि डाॅ. अवस्थी ने समाज के मैदान में चारों ओर व्यंग्य के शानदार स्ट्रोक लगाए हैं और खूब रन बनाएं हैं।
संकलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है हर रचना का समाहार डा. अवस्थी ने अपनी श्रेष्ठ व्यंग्य कविताओं के प्रासंगिक अंशों के साथ किया है। संकलन की भाषा अत्यंत प्रभावी है। स्तम्भ लेखन और मंच अनुभव के कारण वह पाठकों से संवाद करती प्रतीत होती है। मंचीय कविता और पत्रकारिता से जुड़े साहित्यकारों के बारे प्रायः कहा जाता हे कि उनके पास सृजन और लेखन का पर्याप्त समय नहीं बचता ,पर डा. सुरेश अवस्थी की यह 20 वीं पुस्तक इस मान्यता का खंडन करती है और यह स्थापना करती है यदि समय का समुचित प्रबंधन किया जाए तो कुछ भी असंभव नहीं है। यहां रचनाकार के साथ 20 के विशिष्ट संयोग की चर्चा करना आवश्यक है। 20पुस्तकों के रचनाकार ने 20 वर्ष तक लगातार स्तम्भ लेखन किया। 20से अधिक देशों की साहित्यिक यात्रा की। उन्हें अभी तक 20 सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
आकर्षक आवरण में एक स्तरीय पठनीय संकलन के प्रकाशन के लिए रचनाकार को आत्मीय बधाई और व्यंग्य विधा के समृद्धि यज्ञ में एक महत्वपूर्ण समिधा के लिए आभार और अभिनंदन।
डा. पिलकेन्द्र अरोरा
उज्जैन