समोसे में जब तक आलू रहेगा
समोसे में जब तक आलू रहेगा
अख़्तर अली
इस वाक्य को एक बार आप स्वयं बोल कर सुन लीजिये कान में पड़ा रहेगा तो कभी जी बहलाने के काम आयेगा | मेरे शरीर में तो यह खून की तरह दौड़ रहा है , मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा है | जब मैं सो रहा होता हूं तब ये मेरे तकिये के सिरहाने बैठा रहता है | हम दोनों जिगरी दोस्त की तरह हो गये हैं मैंने उसे पा लिया उसने मुझे पा लिया और ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना जैसा जीवन हो गया है |
समोसे में जब तक आलू रहेगा …… इस वाक्य में क्या गति है , इसमें कितना वज़न है , कितना शानदार मीटर है इसका , क्या उम्दा रदीफ़ है | जब से यह वाक्य दिमाग में घर किया है मैं शायरों की भाषा बोलने लगा हूं | आप घबराइये नही मेरा शायरी करने का कोई इरादा नही है क्योंकि मेरे में इतनी काबलियत नही है कि मैं शब्दों को ग़ज़ल कर दूं , बकौल शायर दिल के शोर को शेर बनाने में जिगर लगता है |
समोसे में जब तक आलू रहेगा …… इसमें जो “ जब तक “ है इस पर ज़रा ज़ोर देंगे तो इसकी रेंज का पता चलेगा , पता चलेगा कि यह एक वाक्य सैकड़ो सवालों का जवाब है | यह बहता हुआ पानी है इसमें जो लय और रिदम है वह इस वाक्य को आर्केस्ट्रा में तब्दील कर देती है |
समोसे में जब तक आलू रहेगा ……. यह एक वाक्य नही एक स्लोगन है , एक कहावत है , एक जुमला है , मुहावरा है | बिहार की धरती से उपजा कालजयी नारा है | अनंत काल तक चलने वाली गतिविधियों का यह उम्दा जवाब है | पीड़ित प्रताड़ित वर्ग जब तड़प कर पूछता है कि आखिर यह ज़ुल्मों सितम कब तक जारी रहेगा तब उसी के रोम रोम से आवाज़ आती है समोसे में जब तक आलू रहेगा |
बाप के द्धारा ख़रीदा गया मकान करोड़ो में बेच कर बेटा जितना खुश होता है न उतना खुश तो उसका बाप मकान ख़रीद कर भी नही हुआ होंगा | उन पैसों से दोस्तों को दावत देकर बेटा कहता है – मेरा बाप भी न एक नंबर का बेवकूफ़ था मकान ख़रीदा भी तो कहां ख़रीदा अगर यही मकान सदर में लिया होता तो आज मेरे को इससे दस गुना अधिक पैसा मिला होता | आज्ञाकारी समझदार बच्चो के बीच जो नालायक औलादें है क्या उनके फ़िलहाल सुधरने की संभावना नही है ? इन बच्चों का यह व्यवहार कब तक चालू रहेगा – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
तेल , तिलहन , सोयाबीन , प्याज , टमाटर के भाव तो कम होने का नाम ही नही लेते हैं | आम आदमी सब्जी मंडी में जाता है और एक एक समान का भाव पूछते हुए आगे बढ़ता जाता है | बेचने वाला भाव कम करने को तैयार नही और उसकी जेब इस रेट में खरीदने को राजी नही | वह चिडचिडा जाता है और मन ही मन कहता है न जाने कीमतों का बढ़ना कब तक जारी रहेगा ? तभी उसके पर्स में से , झोले में से , उसकी चप्पल के पट्टे में से आवाज़ आती है – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
विनम्रता गुज़रे ज़माने की बात हो गई है अब तो हर आदमी मुंह फट हो गया है | एक बोलो तो मोहल्ले के बच्चे दस बात सुनाते हैं | उनके बाप से शिकायत करो तो बाप उल्टा शिकायतकर्ता की ही काँलर पकड़ लेता है | सुधारवादी आदमी मुसीबत में फंसा हुआ है | ख़राबी होते देख नही सकता और सुधरने के लिये कोई तैयार नही है | मोहल्ले के लड़को के तेवर देख वह डर जाता है , घबरा जाता है , बेचैन हो जाता है और अकेले में हवा से बात करते हुए पूछता है – लड़कों का यह व्यवहार कब तक चालू रहेगा ? तुरंत उसके घर की दीवार , दरवाज़े , खिड़की और पर्दे सामूहिक स्वर में कह उठते हैं – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
यौन उत्पीड़न का मामला तो जीवन में धनियां मिर्ची , जीरा और मेथी की तरह शामिल हो गया है | इससे मुक्ति का कोई मार्ग दिखाई नही देता है | कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान हो , संपत्ति जप्त कर लेने का आदेश हो , मकान पर बुलडोज़र चला दिया जाये लेकिन यौन उत्पीड़न जब से रसूखदारों का शौक हो गया है इसे लंबी उम्र मिल गई है अब इसे कोई माई का लाल नही रोक सकता | जब – जब कोई पीड़िता चीख चीख कर कहती है महिलाओं का उत्पीड़न कब तक चालू रहेगा तब उसकी चोटी , जुड़ा , दुपट्टा, कंगन , बाली एक साथ कहते हैं – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
इसमें अभी और खनिज संपदा मिलेगी | इस वाक्य की अभी और खुदाई करनी चाहिये | इस कथन में कहन इतना अधिक समाया हुआ है कि यह वाक्य अब पीछा छोड़ने वाला नही है | यह तकिया कलाम न हो जाये तो बोलना | अब तक जितना अच्छा अच्छा पढ़ा और सुना होगा सब बहुत नीचे दब जायेगा और सब से उपर यही वाक्य रहेगा – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
हमें कोई संस्कृत विकसित करनी है तो हमारा आदर्श समोसा संस्कृति होना चाहिये | आलू ने जिस तरह समोसे को बाज़ार में खड़ा किया है और विकसित किया है यह प्रबंधन की अनूठी मिसाल है | अर्थ व्यवस्था को मज़बूत करने में आलू वाले समोसे के योगदान को नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता | हमारा यह विकास तब तक चालू रहेगा – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
भले नाम किसी का हो , चेहरा किसी का हो , वाणी किसी की हो लेकिन आज पूरे अर्थ जगत को समोसा ही संबोधित कर रहा है और वो जो शब्द हैं न जी.डी.पी. यह समोसे पर ही निर्भर है |
मेरे दिमाग में बस निगेटिव ही निगेटिव बात नही है सकारात्मक भी बहुत कुछ है | एक दिन मैंने मन ही मन ईश्वर का आभार व्यक्त करते हुए कहा – प्रभु आपने हमें ईद जैसा दिन , दीवाली जैसी रात दी , रक्षा बंधन जैसी नैमत दी , लोकतंत्र जैसी व्यवस्था दी , गंगा और नर्मदा जैसी संस्कृति दी | प्रभु हम भारतवासियों के लिये तुम्हारे प्रेम का यह सिलसिला कब तक चालू रहेगा ….. तुरंत आकाशवाणी हुई – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
बाप के द्धारा ख़रीदा गया मकान करोड़ो में बेच कर बेटा जितना खुश होता है न उतना खुश तो उसका बाप मकान ख़रीद कर भी नही हुआ होंगा | उन पैसों से दोस्तों को दावत देकर बेटा कहता है – मेरा बाप भी न एक नंबर का बेवकूफ़ था मकान ख़रीदा भी तो कहां ख़रीदा अगर यही मकान सदर में लिया होता तो आज मेरे को इससे दस गुना अधिक पैसा मिला होता | आज्ञाकारी समझदार बच्चो के बीच जो नालायक औलादें है क्या उनके फ़िलहाल सुधरने की संभावना नही है ? इन बच्चों का यह व्यवहार कब तक चालू रहेगा – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
तेल , तिलहन , सोयाबीन , प्याज , टमाटर के भाव तो कम होने का नाम ही नही लेते हैं | आम आदमी सब्जी मंडी में जाता है और एक एक समान का भाव पूछते हुए आगे बढ़ता जाता है | बेचने वाला भाव कम करने को तैयार नही और उसकी जेब इस रेट में खरीदने को राजी नही | वह चिडचिडा जाता है और मन ही मन कहता है न जाने कीमतों का बढ़ना कब तक जारी रहेगा ? तभी उसके पर्स में से , झोले में से , उसकी चप्पल के पट्टे में से आवाज़ आती है – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
विनम्रता गुज़रे ज़माने की बात हो गई है अब तो हर आदमी मुंह फट हो गया है | एक बोलो तो मोहल्ले के बच्चे दस बात सुनाते हैं | उनके बाप से शिकायत करो तो बाप उल्टा शिकायतकर्ता की ही काँलर पकड़ लेता है | सुधारवादी आदमी मुसीबत में फंसा हुआ है | ख़राबी होते देख नही सकता और सुधरने के लिये कोई तैयार नही है | मोहल्ले के लड़को के तेवर देख वह डर जाता है , घबरा जाता है , बेचैन हो जाता है और अकेले में हवा से बात करते हुए पूछता है – लड़कों का यह व्यवहार कब तक चालू रहेगा ? तुरंत उसके घर की दीवार , दरवाज़े , खिड़की और पर्दे सामूहिक स्वर में कह उठते हैं – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
यौन उत्पीड़न का मामला तो जीवन में धनियां मिर्ची , जीरा और मेथी की तरह शामिल हो गया है | इससे मुक्ति का कोई मार्ग दिखाई नही देता है | कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान हो , संपत्ति जप्त कर लेने का आदेश हो , मकान पर बुलडोज़र चला दिया जाये लेकिन यौन उत्पीड़न जब से रसूखदारों का शौक हो गया है इसे लंबी उम्र मिल गई है अब इसे कोई माई का लाल नही रोक सकता | जब – जब कोई पीड़िता चीख चीख कर कहती है महिलाओं का उत्पीड़न कब तक चालू रहेगा तब उसकी चोटी , जुड़ा , दुपट्टा, कंगन , बाली एक साथ कहते हैं – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
इसमें अभी और खनिज संपदा मिलेगी | इस वाक्य की अभी और खुदाई करनी चाहिये | इस कथन में कहन इतना अधिक समाया हुआ है कि यह वाक्य अब पीछा छोड़ने वाला नही है | यह तकिया कलाम न हो जाये तो बोलना | अब तक जितना अच्छा अच्छा पढ़ा और सुना होगा सब बहुत नीचे दब जायेगा और सब से उपर यही वाक्य रहेगा – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
हमें कोई संस्कृत विकसित करनी है तो हमारा आदर्श समोसा संस्कृति होना चाहिये | आलू ने जिस तरह समोसे को बाज़ार में खड़ा किया है और विकसित किया है यह प्रबंधन की अनूठी मिसाल है | अर्थ व्यवस्था को मज़बूत करने में आलू वाले समोसे के योगदान को नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता | हमारा यह विकास तब तक चालू रहेगा – समोसे में जब तक आलू रहेगा |
भले नाम किसी का हो , चेहरा किसी का हो , वाणी किसी की हो लेकिन आज पूरे अर्थ जगत को समोसा ही संबोधित कर रहा है और वो जो शब्द हैं न जी.डी.पी. यह समोसे पर ही निर्भर है |
मेरे दिमाग में बस निगेटिव ही निगेटिव बात नही है सकारात्मक भी बहुत कुछ है | एक दिन मैंने मन ही मन ईश्वर का आभार व्यक्त करते हुए कहा – प्रभु आपने हमें ईद जैसा दिन , दीवाली जैसी रात दी , रक्षा बंधन जैसी नैमत दी , लोकतंत्र जैसी व्यवस्था दी , गंगा और नर्मदा जैसी संस्कृति दी | प्रभु हम भारतवासियों के लिये तुम्हारे प्रेम का यह सिलसिला कब तक चालू रहेगा ….. तुरंत आकाशवाणी हुई – समोसे में जब तक आलू रहेगा |