शशिकला की कविताएँ
शशिकला की कविताएँ
शशिकला त्रिपाठी
1.
खुशी मिलती है पल दो पल
वह थी सुखी औरों की निगाह में
खूबसूरत आशियाना,अधिकारी पति
सुंदर सुयोग्य दो प्यारे बच्चे
उससे ईर्ष्यालु थी स्त्रियाँ
जो तथाकथित दोस्त थीं या रिश्तेदार।
मगर, अक्सर वह उदास होती
सोचती, ख़ुशी किस चिड़िया का नाम है
धन-दौलत सब बेमानी लगते
ऊब होती शान-शौकत पाखंड से
किसी पल लगता जीवन पहाड़ सा भारी।
ख़ुशी की खोज में एक दिन
गाँव की एक पगडण्डी पर जाती है
फसलों को निहारते- निहारते
भर जाती है स्वयं हर्षोंल्लास से
सूर्य के ताप से दमकता है चेहरा।
कभी भोर में निकलती सैर के लिए
सुनती चिड़ियों की चहचहाहट
और स्वयं हो जाती है चिड़िया सी बिन्दास।
किसी गिरते बच्चे को सँभालना
बचा लेना उसे मौत के मुँह से
भर देता लबालब प्रसन्नता की उसकी तलैया
उसने जाना, कोई नहीं शाश्वत भाव
ख़ुशी मिलती है पल दो पल
ऐसे ही लम्हे बनाते हैं ज़िंदगी को गतिशील।
…………….
2.
स्त्री-पुरुष
पर्व मनाती हैं स्त्रियाँ
पर्व से होता है उत्साह का संचार
स्वाद- रंग और परिदृश्य में होती है नई अनुभूति।
स्त्री, भाई दूज पर करती है गोवर्धन-पूजा
कलाई पर बाँधती है राखी
प्रार्थना करती है भाई चिरंजीवी हो
मिलता रहे उसको प्यार-दुलार।
स्त्री, धूमधाम से मनाती है हरितालिका पर्व
चौबीस घंटे निर्जला व्रत रखकर
पति हों दीर्घायु, बना रहे उसका सुहाग
उसके ही कंधे पर उठे उसकी अर्थी।
स्त्री, पुत्र-कल्याण के लिए
रखती है कठिन व्रत वर्ष में अनेक बार
मिले उसे मनचाही सिद्धियाँ, भोगे उसे शतायु होकर
वंशावली का नायक है, तर्पण कर देगा मोक्ष भी।
किन्तु, भाई, पति या पुत्र
स्त्रियों के कुशल-क्षेम के लिए
नहीं करते कोई उपवास, न ही प्रार्थनाएँ
बहनें करती हैं आत्महत्या, जलाई जाती हैं पत्नियाँ
और माँ घोषित होती है डायन।
-डॉ. शशिकला त्रिपाठी उपाध्याय
सृजन,
बी, ३१/ ४१, ए-एस, भोगाबीर, संकटमोचन, लंका
वाराणसी-२२१००५