शयनकक्ष तलाक ​

शयनकक्ष तलाक

- तेजेन्द्र शर्मा

पहली नज़र में, “स्लीप डिवोर्स” शब्द सुन कर लगता है कि रिश्ते में परेशानियां चल रही हैं। जबकि पश्चिमी देशों में इस प्रक्रिया को इसलिए अपनाया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी नींद और रिश्तों को बेहतर बनाया जा सके।  स्लीप डिवोर्स का तात्पर्य (पति-पत्नी) रोमांटिक पार्टनर आपस में एक साथ बिस्तर साझा करने के बजाय अलग-अलग कमरों में सोने से है। यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन तमाम कारणों की जांच परख करें कि आख़िर क्यों पति-पत्नी का अलग बिस्तरों या फिर अलग कमरों में सोना रिश्ते को बेहतर बना सकता है।

एक पुराना चुटकुला है (जो किसी हद तक उस ज़माने की सच्चाई भी बयान करता है)। एक व्यक्ति दूसरे को कहता है – “हमारे घर में दो पलंग हैं। एक पर मेरी माँ और पत्नी सोती हैं और दूसरे पर मेरे पिता और मैं।” तो मित्र जवाब देता है, “यार, पलंग चाहे कितने भी हों, मगर सोया तो तमीज़ से करो!”

एक ज़माना था जब भारतीय पति-पत्नी दिन के उजाले में शायद ही एक दूसरे को देख पाते थे। संयुक्त परिवार में सब एक ही जगह रहते थे। बड़ों के लिहाज़ में पत्नी घूंघट ओढ़े रहती थी। मगर फिर भी बच्चे पैदा हो जाते थे।

फिर परिवारों का विभाजन हुआ और बच्चे महानगरों में आ गये। अब पति-पत्नी एक ही बेडरूम में एक ही पलंग पर इकट्ठे सोने लगे और बच्चे दूसरे कमरे या कमरों में। पति-पत्नी के प्रेम का सूचकांक यही होता कि रात को दोनों एक दूसरे से कितना चिपक कर सोते हैं। कुछ पत्नियां शिकायत करती थीं कि उनका पति चिपक कर नहीं सोता तो कुछ एक पति इस बात से परेशान रहते कि पत्नी रात को दूरी बना कर सोना चाहती है।

दरअसल होता क्या था कि पत्नी सारा दिन घर का काम करके थकी हारी होती और रतिक्रिया के बाद कुछ घंटों की निर्विघ्न नींद चाहती थी ताकि जब वह सुबह उठे तो अगले दिन के युद्ध के लिये तरोताज़ा हो। वहीं कुछ पति भी दफ़्तर की डांट और ओवरटाइम से थके होने के कारण रात के भोजन के पश्चात अपने शरीर को आराम देने चाहता है। इसलिये दोनों के लिये एक दूसरे के साथ चिपक कर सोना ख़ासा कठिनाई भरा होता था।

हम भारतीय बहुत इमोशनल लोग हैं। हर बात में जल्दी से हर्ट भी हो जाते हैं और जल्दी से उत्साहित हो कर नारे भी लगाने लगते हैं। मगर पश्चिमी देशों में हर समस्या को इमोशनल एंगल से नहीं देखा जाता। यहां समस्या को समस्या की तरह जांचा परखा जाता है। इन्हीं हालात से एक नई सोच सामने आई – स्लीप डायवोर्स यानी कि शयनकक्ष तलाक!

पहली नज़र में, “स्लीप डिवोर्स” शब्द सुन कर लगता है कि रिश्ते में परेशानियां चल रही हैं। जबकि पश्चिमी देशों में इस प्रक्रिया को इसलिए अपनाया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी नींद और रिश्तों को बेहतर बनाया जा सके।  स्लीप डिवोर्स का तात्पर्य (पति-पत्नी) रोमांटिक पार्टनर आपस में एक साथ बिस्तर साझा करने के बजाय अलग-अलग कमरों में सोने से है। यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन तमाम कारणों की जांच परख करें कि आख़िर क्यों पति-पत्नी का अलग बिस्तरों या फिर अलग कमरों में सोना रिश्ते को बेहतर बना सकता है।

सबसे पहला कारण जो समझ में आता है वो हैं ख़र्राटे… यदि पति-पत्नी में से एक रात को ज़ोरदार ख़र्राटे लेता है तो दूसरे की सारी रात बरबाद हो जाती है और दूसरा बंदा रात भर सो नहीं पाता। यदि दोनों में से किसी एक को बार-बार नींद में हिलने की आदत हो और उसके हिलने से दूसरे की नींद में विघ्न पड़ता हो। और तीसरा कारण सुनने में मज़ाक सा लगेगा मगर ठंडे प्रदेशों और देशों में यह एक ठोस कारण है। वो कारण है किसी एक की आदत में रज़ाई अपनी ओर खींच लेने की स्वार्थी आदत। जैसे ही आप रज़ाई अपनी ओर खींचते हैं तो दूसरे की पीठ नंगी हो जाती है और उसे सर्दी लगने लगती है। ज़ाहिर है कि इससे नींद ख़राब होती है।

रात की नींद ख़राब होने से इंसान अगले दिन चिड़चिड़ा रहता है और उसका मूड दिन भर ख़राब रहता है। मगर लगातार कई दिनों तक नींद की कमी से इंसान के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। सच तो यह है कि बड़े शहरों यानी कि महानगरों में पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं। पत्नी को तो दफ़्तर से वापिस आकर पूरे परिवार का भोजन भी तैयार करना होता है। इसलिये दोनों के लिये रात की गहरी नींद अति आवश्यक है। यदि पत्नी नौकरी ना भी करती हो तो भी उसके लिये घर के अनगिनत काम होते हैं जिसके लिये अच्छी नींद एक टॉनिक का काम करती है।

रिलेशनशिप एक्सपर्ट (रिश्तों कि विशेषज्ञ) एनाबेल नाइट ने एक टीवी कार्यक्रम के कहा कि लोगों ने यह मान लिया है कि जो जोड़े अलग-अलग सोते हैं, वे शादीशुदा जीवन में किसी न किसी परेशानी से गुजर रहे हैं। “लेकिन यह एक दकियानूसी सोच है”।

आजकल हमारी सोच का दायरा कुछ सीमित होता जा रहा है और हम अपनी सुख और सुविधा को लेकर कुछ आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। हमारे रिश्ते के भीतर भी हमारी अपनी जरूरतें सबसे आगे हैं। अगर आपको अलग-अलग बिस्तरों में रात को अच्छी नींद की ज़रूरत है, तो यह प्रयोग निश्चित रूप से कुछ कर सकता है। जिन्हें ज़रूरत हो उन लोगों को कोशिश करनी चाहिए।

मगर वहीं पति-पत्नी या मित्र जोड़े को अपने रिश्तों के बीच के अंतरंग पक्ष का भी ध्यान रखना होगा। दोनों को एक दूसरे के लिये समय निकालना होगा वरना अपनापन कम होता जाएगा और एक स्थिति यह भी आ सकती है कि आप कभी साथ-साथ सो ही नहीं पाएंगे।

पहले तो एक बड़े बेड पर दूरी बना कर अलग-अलग रज़ाई या चादर लेकर सोने का प्रयास किया जाए। यदि यह काम ना करे तो एक ही कमरे में अलग-अलग बिस्तर पर सोने की कोशिश की जाए। यदि यह भी असफल हो जाए तो फिर अलग-अलग कमरे में सोने के बारे में सोचा जाए।

जब तक आप अलग-अलग सोने से पैदा होने वाले नुकसान के बारे में सचेत हैं और उन्हें संबोधित करते हैं, तब तक वास्तव में कोई कारण नहीं है कि अलग-अलग बेड पर सोना अद्भुत काम न कर सकता हो। फिर भी यह ज़रूरी हो जाता है कि हम स्लीप डिवोर्स यानी कि अलग-अलग बिस्तरों या कमरों में सोने से हमारे जीवन पर क्या असर डाल सकते हैं। क्या इससे रिश्ते बेहतर होने की संभावना है या रिश्तों में दरार आने की।

जैसा कि ऊपर बताया गया है बहुत से लोग नींद की रुकावट को कम करने के लिए अलग से सोना पसंद करते हैं। जब साथी एक ही बिस्तर में सोते हैं, तो तो ख़र्राटे, हिलना डुलना, और रज़ाई खींचने के अतिरिक्त किसी प्रकार की बीमारी या एलर्जी या फिर गर्भावस्था नींद में ख़लल डाल सकते हैं। इनसे बचने के लिये अलग-अलग सोना सेहत के लिये बेहतर है।

जो लोग अलग-अलग सोते हैं उनका मानना है कि उन्हें लगभग चालीस मिनट से एक घंटा बेहतर सोने को मिलता है। ज़ाहिर है कि इससे शरीर अधिक ताज़ा महसूस करेगा और रिश्ते में बेहतरी पैदा होगी। करीब 53% लोगों का मानना है कि स्लीप डिवोर्स का इस्तेमाल करने से उनकी नींद की क्वालिटी बहुत बेहतर हो गई है।

जब यह तय हो गय कि अलग-अलग सोने से नींद की गुणवत्ता में सुधार हो जाता है तो इससे रिश्तों में भी सुधार होने की प्रबल संभावना है। कम नींद आने से इंसान चिड़चिड़ा हो जाता है और एक दूसरे के साथ लगभग दुश्मनों का सा व्यवहार करने लगत हैं। ख़राब नींद के कारण इन्सान के क्रोध की मात्रा में भी बढ़ोतरी देखी गई है।

अलग-अलग सोने की परेशानी यह भी है कि अलग कमरे की ज़रूरत पड़ती है। हर परिवार के पास अतिरिक्त कमरे नहीं होते हैं। मध्यवर्गीय एवं निम्न-मध्यवर्गीय परिवार तो बहुत मुश्किलों से एक फ़्लैट का जुगाड़ कर पाते हैं, फिर भला आसानी से अलग कमरे का प्रबन्ध कैसे कर पाएंगे। फिर अलग-अलग पलंग और बिस्तर ख़रीदना। यदि गर्मी का महीना है तो दोनों कमरों में एअरकंडीशनर लगवाना। यानी कि अच्छी नींद की कीमत भी भारी पड़ती है।

शयनकक्ष तलाक़ या फिर स्लीप डिवोर्स लेने वाले जोड़ों में से एक चौथाई से अधिक जोड़े अंततः बाद में फिर से बिस्तर साझा कर लेते हैं। उनमें से एक तिहाई से अधिक ऐसे होते हैं जिन्हें एक-दूसरे को याद करना उन्हें एक साथ वापस लाया। यदि आप रात में अपने साथी के साथ गले लगाने के आदी हैं, तो अचानक अकेले सोने से अकेलापन महसूस हो सकता है। इसका असर पति-पत्नी की सेक्स लाइफ़ पर भी पड़ सकता है।

कुछ लोगों के लिए, अकेले सोना उनकी सुरक्षा की भावना को प्रभावित कर सकता है। इससे हल्की नींद आ सकती है क्योंकि वे निगरानी मोड में रहते हैं… नींद में होने के बावजूद हल्की से हल्की आहट भी उनकी नींद उचाट कर देती है।  जब एक बिस्तर साथी मौजूद होता है, तो यह आश्वासन मिलता रहता है कि कोई साथ है और इससे अनिद्रा से इन्सान बच पाता है।

पति-पत्नी या पार्टनर्स को याद रखना होगा कि स्लीप डिवोर्स का निर्णय लेने से पहले एक दूसरे के साथ अच्छी तरह स्थितियों का जायज़ा लिया जाए। हर परेशानी का पहले कोई दूसरा हल ढूंढने का प्रयास करना चाहिये फिर वो चाहे ख़र्राटे हों या कोई अन्य समस्या। विशेषज्ञ की राय सहायक सिद्ध हो सकती है। जब सभी तरह के उपाय असफल हो जाएं, उसके बाद ही अलग-अलग सोने का निर्णय लेना चाहिये।

– तेजेन्द्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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