शालिनी श्रीवास्तव की ग़ज़लें –
शालिनी श्रीवास्तव की ग़ज़लें -
- शालिनी श्रीवास्तव
मुक़द्दर से गिला-शिकवा नहीं है!!
लकीरों में लिखा मिटता नहीं है!!
बुरा आया समय जीवन में लेकिन
बहुत वो देर तक ठहरा नहीं है!!
सजाएँ अब चलो ख़्वाबों की महफ़िल
हुई मुद्दत उन्हें देखा नहीं है!!
चले आना बिना दस्तक दिए तुम
मिरे दिल पर कोई पहरा नहीं है!!
तिरी फ़ुर्क़त में छाई है उदासी
जहां में दिल ये अब लगता नहीं है!!
मुहब्बत का शुरू हो सिलसिला तो
क़यामत तक कभी रुकता नहीं है!!
कमी तो कुछ नहीं की तूने मौला
मिला मुझको मगर मन का नहीं है!!
शालिनी
2- ग़ज़ल
तग़ाफुल की बनी ही दरमियाँ परछाई रहती है
मुहब्बत में किसी की अब कहाँ गहराई रहती है
जिन्हें थी आरज़ू उल्फ़त की हमसे आजकल उनकी
नज़र तक बेमुरव्वत होके बस कतराई रहती है
अजब से हो गए दौर-ए-जहाँ के सब मरासिम ही
बहुत नज़दीक रहकर भी दिलों में खाई रहती है
हज़ारों ग़म निगाहें नम यही हासिल है उल्फ़त में
वफ़ा के नाम पर नज़दीक इक तन्हाई रहती है
दिलों में जो लिए फिरते मुहब्बत हर किसी से हैं
उन्हीं के पाक दामन में यहाँ रुसवाई रहती है
– शालिनी श्रीवास्तव
लेखिका संपादक एवं प्रकाशक/संस्थापक “सोपान प्रकाशन”
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