शांति का केंद्र–आत्मचेतना से भेंट

ऊर्जस्वी

शांति का केंद्र–आत्मचेतना से भेंट

मेघा राठी की कलम से...

                               कभी आंखें बंद करना और पलकों में महसूस होती लाल से रंग की रोशनी में रेखाओं के अक्स देखते हुए खो जाना किसी अनजान लोक में….आती जाती सांसों की लय पर अवचेतन मन एक अदृश्य कहानी लिखने लगता है जिसमें शब्द नहीं केवल भाव हैं … वे भाव जो कभी लिखे नहीं गए,जिनको केवल चेतना ने जाना है। जिसका कथानक कुछ भी नहीं किंतु उसे उठती गिरती सांसों के साथ महसूस करना ही सुकून देने लगता है।

आस– पास की ध्वनियों से प्रभावहीन श्रवण इंद्रियां सुन पाती हैं तो मात्र उन पलकों की थिरकन को, त्वचा में जाग्रत ऊष्मा के प्रवाह को और…और अधरों पर खिंच रही स्मित रेखा को को मन के आनंद में गुम गहरी होती जा रही है।

कपोलों की रक्तिम आभा हथेलियों की छुहन के साथ कांतिमय होती जाती है।

कहानी के अंश बदलते ही नेत्र उस मूंदी अवस्था में भी दृश्य बदलते और परदा गिरते हुए देख कर मुदित होते हैं। दीर्घ व्यतीत होता समय मात्र कुछ क्षण बन कर हृदय की मंजूषा में सहेज दिए जाते हैं और अचानक ही नेत्र यूं खुलते हैं जैसे कहानी का पलकों के पटल पर पटाक्षेप हो गया हो।

बाहर की दुनिया विचित्र सी अनुभूत होती है क्योंकि अभी जो कुछ देखा था वह सब आत्म चेतना से साक्षात्कार करने का एक बहुत ही नगण्य सा प्रयास था जो अनजाने ही हो गया था किंतु इस तनिक से प्रयास से जिस गहरी शांति की प्राप्ति हुई वह अन्य किसी भी वस्तु में, दृश्य में या व्यक्ति में नहीं।

तब सोचिए स्वयं की चेतना से मिलन कितना अभूतपूर्व और शांतिप्रद होगा।

प्रतिदिन की दिनचर्या से कुछ समय अपनी चेतना से मिलने का संकेत हमें हमारी चेतना ने ही आग्रहपूर्ण रूप से दिया होता है किंतु सांसारिक जीवन में या तो हम उसे समझ नहीं पाते या फिर उसे टाल कर अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं।

कभी आपको हुआ है ऐसा अनुभव … अचानक यूं ही , जब आपने खुद के मन की  यात्रा की हो यदि नहीं तो एक बार इस यात्रा पर अवश्य निकलें… नि: संदेह उसके बाद आप बार– बार इस यात्रा पर जाना चाहेंगे।

मेघा राठी

भोपाल मध्यप्रदेश

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