स्त्री विमर्ष : दृष्टि
कविता
स्त्री विमर्ष : दृष्टि
अजय कुमार झा.
वैचारिक संशय के युग में
नवीन प्रतिमान के गढ़ने में
‘फ्यूडल माइंड सेट’ से जूझते
गर आँखे चुराता
नजर आये वर्त्तमान
अतीत के झरोखे में
दृश्यमान है संदर्भ
डुबकियाँ लगाते नजर आयेंगे
समस्याओं के समाधान .
संश्रय-समर्पण साधिका स्त्रित्व
महाकाव्य की हैं नायिकाएँ
विवश गंधारी का
हस्तिनापुर प्रत्यार्पण
अस्मिता-अस्तित्व हरण से
महिमामंडित हुआ अपहरण
नेत्रहीन पुरूष संग
नेत्रहीनता की शपथ
गौरवान्वित हुई
नारी भावना प्रतीक
राष्ट्रीय अस्मिता रागरत
शकुनी बिसात पर
पंचाल-हस्तिनापुर
चौसर के दाँव चढ़ी द्रौपदी
पराजित पुरूषत्व का
मूल्य चुकाती स्त्रित्व
माध्यम बनी-सिढ़ी बनी
बनी गंतव्य मंतव्य साध्य.
वह हाँफ रही है
वह दौर रही है
जा रही है
हरेक खूँटे के नजदीक
देखती रही
हरेक की उठा पूंछ
सती प्रथा निषेध
तीन तलाक बंदी
निर्भया कांड और नारी अधिकार!
“नारीवाद” विद्रोह
प्रतिकारात्मक सामंजन
सब ढाक के तीन पात!
स्मरित हो आये कवि धूमल के शब्द
” लोहे का स्वाद,
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो,
जिसके मुँह में लगाम है।”
याद आता है,
शरतचंद्र के कथाओं का
श्रोता-बैकुन्ठ बाबू
जिसके समक्ष बेकार थीं
सारी टिपण्णियाँ .
उदभेदित हैं पाश की पंक्तियाँ
” तुम लोहे की बात करते हो
मैंने लोहा खाया है.”
वेधना होगा
संश्रय – सामंजन का
प्रपंची पाखण्ड व्यूह
गर बनना है
सम्मानित अस्तित्ववान
छेड़ना होगा परिवर्त्तन की तान।
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– अजय कुमार झा.
मुरादपुर, सहरसा, बिहार.
MSc (Physics), LLM, Diploma in Russian Language, Diploma in journalism.
Editor in Bihar state magzines & national magzines: छात्र स्वर, जनपथ, नव जनवाद, जनशक्ति आदि।
लेखन: आलेख, संस्मरण, समीक्षा, शोध पत्र, कविता आदि।