
कमरे के वेंटिलेटर पर एक गौरैया उड़कर आती है और चोंच में लिए तिनका को वहां रखकर धीरे-धीरे एकत्रित करती जाती है. कभी-कभी उसके साथ एक दूसरी गौरैया भी आ जाती उसकी मदद के लिए. उसकी चोंच में भी फूस के तिनके दबे होते. कुछ दिनों के बाद वह एक सुंदर सा घोंसला बना लेती है. उस घोसले में वह अपना डेरा डाल देती है. सुहानी उस प्यारी सी गौरैया को देखकर खुश हो जाती है. सुबह-सुबह उसकी चींचीं की आवाज सुहानी के कानों में मधुर संगीत घोलने का काम करती है. उसे गौरैया के रूप में एक सखी मिल गई थी.
सुहानी शादी होकर आयी तो घर में सास-ससुर को मिलाकर वह चार जन ही थी. दो ननदें थी लेकिन शादीशुदा, अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त. त्यौहार में कभी आ जाती तो सुहानी को थोड़ा मन लग जाता. मायके में उसका भरा पूरा परिवार था. पिता और चाचा साथ में रहते. दादा-दादी थे तो संयुक्त घर में उसने कभी अकेलापन को जाना ही नहीं.
विजय अपनी दो बहनों का इकलौता भाई है. बहनों की शादी पहले हो गई. विजय पिता के साथ कपड़े की दुकान चलाता था. पति और ससुर देर रात आते थे. ऐसे में सुहानी सास के साथ घर में अकेले रहती. शाम के समय सास कभी-कभी अपनी हमउम्र महिलाओं के साथ पास वाले मंदिर में शाम की आरती के लिए चली जाती. इस परिस्थिति में सुहानी को अकेलापन खलता. हालांकि गौरैया ने कुछ हद तक उसके एकांत को अपनी मधुर आवाज से कम तो किया था.
“मां प्लीज… आज मंदिर मत जाइए. देखिए न कितना अच्छा मौसम है! मैं गरमा गरम पकोड़े तल लेती हूँ, चाय के साथ हम दोनों इकट्ठे बैठकर खाएंगे,” सुहानी अपनी सास से कहती है.
“अभी दोपहर का खाना तो ठीक से पचा नहीं. मंदिर के बहाने थोड़ा टहलना भी हो जाता है इसलिए तो मैं जा रही हूँ. पकोड़े बनाकर तुम खा लो.”
“मां… मैं अकेले घर में बोर हो जाती हूँ. पकौड़े, चाय तो बहाना है आपको साथ रखने के लिए.
“तभी तो कहती हूँ बहू… पोते पोतियो का मुँह दिखा दो. उन बच्चों में मैं भी रम जाऊँगी और तुम्हें तो मां बनने के बाद मुझ बुढ़िया को चाय पूछने के लिए भी फुर्सत नहीं रहेगा. शादी को साल से ऊपर हो गया. आजकल के बच्चे तो बस… प्लान करके बच्चे लाते हैं. अब उपाय ये, सब बंद कर और एक बच्चे को तो आ जाने दे,” कहकर सासू मां मंदिर के लिए निकल जाती है.
सुहानी को सास की अंतिम बात चुभ जाती है. कैसे बताए कि वह कुछ उपाय नहीं कर रही. क्या जाने वह गर्भवती क्यों नहीं हो रही है!
रात के खाने के बाद सभी लोग अपने कमरे में चले जाते हैं. सुहानी भी रसोई का काम निपटाकर कमरे में आती है. विजय बिस्तर पर सोने की तैयारी कर रहा था.
“सुनो… मैं सोच रही हूँ कि एक दिन किसी डॉक्टर को मिल लेती.” विजय के मन को भांपने की कोशिश करते हुए सुहानी कहती है.
“डॉक्टर के पास! क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है न!” सुहानी का सिर और बदन छूते हुए विजय कहता है.
मेरी तबीयत को कुछ नहीं हुआ है. बात बस यह है कि मैं मां बनना चाहती हूँ.”
सुहानी की बात सुनकर विषय हंस पड़ता है, “इतनी सी बात के लिए डॉक्टर के पास जाओगी! इसके लिए तो यह नाचीज़ हाजिर है,” कहते हुए विजय सलोनी को अपनी तरफ खींच लेता है.
“मजाक छोड़ो. शादी को साल भर से ऊपर हो गया लेकिन…,” सुहानी मुंह बनाते हुए कहती है.
“अरे अब इतनी भी क्या जल्दी है… आ जाएगा बच्चा. शादी हुई नहीं कि परेशान होने लगी,” कहकर विजय मुँह घुमा लेता है.
सुहानी आगे कुछ बोलना चाहती है लेकिन विजय थके होने की बात बोलकर सो जाता है.
सुहानी की दिनचर्या फिर से वही शुरू हो जाती है. एक दिन कमरे में पंखे की सफाई करते हुए उसकी नजर अचानक वेंटिलेटर पर बने चिड़िया के घोसले पर जाती है. उसमें चिड़िया ने छोटे-छोटे बच्चे दिए थे. उनकी चींचीं की आवाज बहुत धीरे-धीरे आ रही थी.
सुहानी को उन बच्चों पर प्यार आने लगता है. वह नजदीक से देखने के लिए अपनी सीढ़ी उधर बढ़ाती है, तभी देखती है कि चिड़िया उन बच्चों के और भी नजदीक आ गयी है. शायद वह बच्चों के लिए सुहानी से भय खा रही थी. सुहानी वहाँ से हट जाती है.
चिड़िया के बच्चे को देखकर उसमें मां बनने का भाव पुनः प्रबल हो गया. आखिर इस एकांत को खत्म करने के लिए उसे भी एक नन्हे बच्चे की चाह थी. वह फिर से विजय से बात करती है डॉक्टर से मिलने के लिए.
“देखो… दुकान में अभी बहुत काम है, मेरे पास समय नहीं है. ऐसा करो… तुम मां के साथ या अकेली चली जाओ.”
विजय का जवाब सुनकर सुहानी खिन्न हो जाती है. अब वह अकेले ही डॉक्टर के पास जाने का फैसला करती है. सासू मां या मायके से किसी को साथ ले जाना उसे सही नहीं लगा. आखिर कौन जाने कमी किसमें है, बिना बात के बतंगड़ बन जाता.
एक दिन शाम के समय सुहानी डॉक्टर से मिलने चली जाती है. जरूरी जांच के बाद उसमें किसी प्रकार की कमी नहीं मिली. डॉक्टर ने कहा, “आप एक बार अपने पति को भी साथ ले आइए, उनकी भी जांच हो जाए तो ही मैं आगे कुछ बता सकूंगी.”
सुहानी डॉक्टर की बात विजय से कहती है. अपनी जांच के लिए विजय तैयार नहीं होता.
“तुम्हारा मतलब क्या है, कमी मुझ में है?”
“मैं ऐसा कब कह रही हूँ. डॉक्टर एक बार जांचकर तसल्ली कर ले, फिर आगे क्या दिक्कत है उसके अनुसार कुछ इलाज हो.”
विजय नहीं मानता है. दोनों के बीच अच्छी अनबन हो जाती है, लेकिन यह बात सुहानी खुद तक ही सीमित रखती है. वह विजय को मनाने की हर संभव कोशिश करती है और एक दिन उसे डॉक्टर के पास चलने के लिए मना लेती है. डॉक्टर का अंदेशा सही था. कमी विजय में ही थी. वह पिता नहीं बन सकता था.
“देखो सुहानी… यह हम दोनों के बीच की बात है. प्लीज इसे किसी से मत कहना.”
“नहीं कहूंगी… लेकिन तुम ही बोलो क्या चुप रहने से इसका हल निकल जाएगा? क्या हम दोनों माता-पिता बन जाएंगे? आखिर तुम्हारे माता-पिता को क्या कहूं जो पोते-पोती की आस लगाए हैं.
“मुझे कुछ नहीं मालूम, अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा.”
उस रात सुहानी और विजय दोनों की आंखों में नींद नहीं थी. एक-दो दिन के बाद विचलित मन जब शांत हो जाता है तो विजय अपनी पत्नी से कहता है, “आजकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि मां बनना इतना मुश्किल भी नहीं है. चलो डॉक्टर से मिलकर हम दूसरे उपायों पर बात करेंगे.”
“लेकिन विजय…”
“अब लेकिन वेकिन कुछ नहीं. किसी भी परिस्थिति में अगर समस्या है तो उसका समाधान भी होगा.”
सुहानी और विजय डॉक्टर से मिलते हैं. एक बार के लिए डॉक्टर सरोगेसी की सलाह देते हैं लेकिन विजय इसके लिए तैयार नहीं होता है. घर में सबको आखिर क्या बताता. अंत में दूसरी विधि पर विचार करने का तय करते हैं.
इधर विजय दुकान को लेकर फिर से थोड़ा व्यस्त हो गया और सुहानी घर में अकेली उस चिड़िया को निहारती रहती. आज फिर सुहानी चिड़िया और उसके बच्चे को निहार रही थी कि तभी दरवाजे पर दस्तक होती है. वह जाकर दरवाजा खोलती है तो एक 30-35 वर्ष के व्यक्ति को सामने पाती है.
“मैं इसी शहर में काम से आया था तो सोचा बुआ से मिलते चलूं.”
“सॉरी… मैंने आपको पहचाना नहीं.
“मैं रमेश… आपकी शादी में आया था. आपकी सास मेरी बुआ है. मैं विजय के मामा का लड़का हूं.”
पारिवारिक परिचय पाकर सुहानी उसे अंदर बिठाती है, “मां पास के मंदिर गयी हैं संध्या आरती के बाद आ जाएंगी. विजय और पिताजी तो दुकान से रात में ही लौटते हैं. पहले से पता होता तो मैं मां को मंदिर नहीं जाने देती.”
“कोई बात नहीं, मैं आज रात यहीं रुकूंगा. सुबह वाली ट्रेन से घर लौट जाऊंगा,” रमेश सुहानी से कहता है.
“मैं आपके लिए कुछ नाश्ता लाती हूँ,” कहकर सुहानी रसोई की तरफ बढ़ जाती है.
इधर रमेश अपने छोटे से बैग में से एक शराब की बोतल निकालता है. हॉल में साइड में रैक पर रखे ग्लास को खुद से उठा लेता है और उसमें शराब डालकर दो घूंट पीता है. तबतक सुहानी रमेश के लिए चाय के साथ बिस्कुट और नमकीन ले आती है. टेबल पर चाय नाश्ता रखते हुए वह शराब देख लेती है और असहज महसूस करती है.”
“हमारे यहाँ यह सब नहीं चलता है. बेहतर होगा कि आप इस बोतल को वापस बैग में रख लें,” सुहानी रमेश से थोड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए बोलती है.
“जी… जी… ,” रमेश मुस्कुराते हुए कहता है और बोतल का ढ़क्कन बंद करने लगता है.”
इधर सुहानी अपने कमरे में आकर कुर्सी पर बैठ जाती है और वापस उस चिड़िया को निहारने लगती है. चिड़िया मुड़कर कभी इधर जाती कभी उधर जाती. देखकर लग रहा था मानो वह बच्चों को पंख फैलाना सीखा रही हो. बड़ी चिड़िया की अठखेलियाँ देखकर उसके बच्चे भी चींचीं करने लगते और यह सब देखकर सुहानी मंत्रमुग्ध हो जाती है.
अचानक सुहानी को अपने पास किसी के होने का एहसास होता है. वह पलटकर देखती है तो पीछे रमेश खड़ा था. उसकी मुस्कान में कुटिलता झलक रही थी. सुहानी झटके से कुर्सी से उठकर खड़ी हो जाती है.
“मां आती ही होंगी, आप हॉल में बैठिए.”
“वह… मुझे पानी चाहिए था.”
“उधर फ्रिज में है, आप ले लीजिए.” सुहानी रमेश को कमरे से बाहर भेजने के ख़्याल से कहती है लेकिन वह वहीं खड़ा रहता है.
सुहानी कमरे से बाहर निकलने लगती है कि अचानक रमेश का कठोर हाथ सुहानी के बाजू को पकड़ लेता है.
“मैं तुम्हारे यौवन का प्यासा हूँ. तुम्हें नहीं पता कि तुम कितनी खूबसूरत हो. काश! तुम मेरी पत्नी होती, लेकिन उस विजय को तुम मिल गयी.”
रमेश की बातों से सुहानी को उसकी मंशा का अंदाजा लग गया. वह अपना बाजू छुड़ाने की कोशिश करने लगी. असफल होने पर वह रमेश के हाथ पर दांत गड़ाती है. वह कमरे से बाहर निकलने की कोशिश करती है लेकिन गुस्से में आग बबूला रमेश अपना पैर लगाकर सुहानी को गिरा देता है और एक भूखे चीते की भांति वह सुहानी पर हावी हो जाता है.
लाख कोशिश के बाद भी वह रमेश के चंगुल से निकल नहीं पाती और अपनी अस्मत हार जाती है.”

सुहानी को रौंदकर रमेश विजयी मुद्रा में वहां से चला जाता है. देर शाम जब उसकी सास घर लौटती है तो सुहानी की बात सुनकर वह उस पर यकीं नहीं करती.
“जाने किस से मुंह काला कर ली है और इल्जाम मेरे भतीजे पर लगा रही है! मेरे मायके वाले तुम्हें रास नहीं आते ना इसलिए अपनी कुकर्म को मेरे भाई के लड़के पर थोप रही हो. अरे वह ऐसा क्यों करने लगा! अच्छा खासा शादीशुदा है वह.”
“मां… मैं झूठ नहीं बोल रही, वह शराब पीकर… ,” कहते हुए सुहानी रोने लगती है.
“माना कि वह थोड़ा बहुत पी लेता है मगर… !” कहते हुए सुहानी की सास दूसरी तरफ जाकर बैठ जाती है.
घर में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था. विजय और उसके पिता रात में दुकान से लौटते हैं तो देखते हैं कि माहौल बदला हुआ है. सारी बात जानने के बाद विजय गुस्से से लाल-पीला हो रहा था. वह तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने के लिए तैयार हो जाता है लेकिन मां उसे रोकती है.
“पागल हो गया है क्या! इसकी बातों में आकर अपने मामा के लड़के को ही बलात्कारी ठहराने चला है? अरे… मेरा मायका बर्बाद हो जाएगा. इसकी तो कोई इज़्ज़त नहीं रही लेकिन अब हर तरफ शोर मचाकर हमारी भी इज़्ज़त को नीलाम करेगा क्या?”
“मां… तुम औरत होकर दूसरी औरत का दर्द नहीं समझ रही हो. रमेश दोषी है तो है. हम इसमें इज़्ज़त और रिश्तेदारी क्यों देखें? क्या उसने हमारे बीच की रिश्तेदारी या इज़्ज़त का ख़्याल रखा?” विजय अभी भी गुस्से में था.
“क्या सबूत है कि मेरे रमेश ने ही ऐसा किया है?” विजय को शांत रहने के ख़्याल से उसकी मां कहती है.
“सबूत… वह तो खुद पुलिस ढूंढ लेगी. जब पुलिस के चार डंडे लगेंगे न तो वह रमेश खुद ही सारी बात ऊगल देगा. चलो सुहानी थाने.”
“रुको बेटा… तुरंत गुस्से में यूं फैसला करना ठीक नहीं. वैसे भी अब रात के समय बहू को थाने ले जाना उचित नहीं होगा. जो करना है सुबह करना.” विजय को समझाते हुए उसके पिताजी कहते हैं.
पत्नी की हालत देखकर विजय भी ठहर जाता है और सोचता है कि पहले इसे संभालना बेहतर होगा.
मां के विरोध के बावजूद विजय रमेश के खिलाफ केस दर्ज करवा देता है. घर में विजय की मां और पिताजी का व्यवहार सुहानी के लिए पहले जैसा नहीं रहता. विजय की मां अपने मायके वालों के पक्ष में खड़ी दिखती है.
इधर सुहानी से बलात्कार की खबर धीरे-धीरे एक दूसरे के कानों तक पहुंचते हुए पूरे मोहल्ले में फैल गयी. सुहानी के मायके वाले उसे अपने साथ ले जाना चाहते थे. सुहानी के मायके वालों का कहना था, “हमारे घर की बेटी की इज्ज़त तो ससुराल वाले संभाल नहीं पाए अब उसका जीवन क्या संभालेंगे!”
लेकिन इस मुश्किल घड़ी में विजय अपनी पत्नी के साथ खड़ा रहता है, “तुम कहीं नहीं जाओगी सुहानी. तुम मेरी पत्नी हो, सुख और दुख दोनों में हम एक दूसरे के साथ खड़े रहेंगे.”
लोगों के ताने और घर वालों के विरोध को झेलते हुए विजय और सुहानी रह रहे थे. इधर पुलिस और कोर्ट का भी चक्कर लगाना पड़ रहा था. दो महीने बीत गए, सुहानी की तबीयत बिगड़ने लगी थी. एक दिन कोर्ट से लौटते हुए वह चक्कर खाकर गिर पड़ी. विजय जल्दी से उसे डॉक्टर के पास ले गया.
प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टर ने बताया कि सुहानी गर्भवती है. यह सुनकर विजय थोड़ी देर के लिए सन्न रह गया. बलात्कार के कीचड़ से उपजा यह कीड़ा उसे अभी से अपने बदन पर रेंगता सा नजर आने लगा. उसने यहां तक सोचा ही नहीं था. सुहानी को तो उसने अपना लिया था मगर बच्चे को अपनाना उसके लिए दुष्कर कार्य जान पड़ता था.
सुहानी जो मां बनने के लिए उतावली रहती थी आज यह सब सुनकर पीड़ा से भर गयी. वह मन ही मन सोचने लगी, “उस घटना से मिले घाव भरने की कोशिश कर रही थी लेकिन यह बच्चा तो नासूर बन गया. हर पल उसे भयानक शाम की याद दिलाता रहेगा !”
विजय और सुहानी दोनों का मन उसे बच्चे के लिए घृणित भाव से भर रहा था. वो इस अनचाहे बच्चों को अपनाना नहीं चाहते थे. दोनों ने मिलकर तय किया कि गर्भपात करवा देंगे. सुहानी उस गर्भ को नष्ट करने के लिए तैयार हो जाती है क्योंकि वह खुद ही उस अनचाहे गर्भ से नफरत कर रही थी.
बिस्तर पर लेटे-लेटे सुहानी की आंख लग गयी थी कि उसे किसी नन्हे शिशु की आवाज सुनाई दी, “आप मेरी हत्या कर रहे हैं! मैंने आपका क्या बिगाड़ा है? उस दुखद घटना का जिम्मेदार मैं तो नहीं.”
तुम जिम्मेदार नहीं लेकिन तुम उस कीचड़ से उपजे हो. कांटों से सजे हो. तुम्हें अपनी गोद या आंचल में स्थान नहीं दे सकती,” सुहानी की अंतरात्मा से आवाज आती है.
“नहीं… मुझे अपनी गोद में स्थान दीजिए. अपने आंचल का सहारा दीजिए. मैं तो प्रकृति के नियम के कारण उपजा हूँ न, अब इसमें आपके प्यार की खुशबू नहीं कुछ दुखद पल के कांटे हैं. लेकिन उस भूल की सजा मुझे क्यों जो मैंने किया ही नहीं.”
“माना कि गर्भ में तुम अपनी मर्जी से नहीं आयी लेकिन इस धरती पर तुम्हें कैसे आने दूँ! तुम मेरे ज़ख्म की जीती जागती मूरत बनकर रहोगी,” सुहानी का मन विचलित हो जाता है.
“मां… अपने ज़ख्म को देखकर मेरी हत्या मत करो. नहीं मां… नहीं… !”

अचानक सुहानी बिस्तर पर से उठकर बैठ जाती है. वह खुद को पसीने से तर-बतर पाती है. उसे एहसास हो रहा था कि मानो वह किसी बुरे सपने से बाहर निकली हो. वह सामान्य होने की कोशिश करती है फिर विजय को जगाती है.
“सुनो… मैं गर्भपात नहीं कराऊंगी.”
“तो फिर… ,” सुहानी के मुंह से यह सुनकर विजय आश्चर्य में पड़ जाता है.
तुम्हारी कमी के बाद भी मैं तुम्हारे साथ हूँ. मेरे साथ हुए दुष्कर्म के बाद भी तुमने मुझे अपनाया, मेरे साथ रहे. लेकिन इस गर्भस्थ शिशु ने तो कुछ नहीं किया ना फिर इसे किस बात की सजा! इस अधखुली कली को खिलने दो विजय. हम दोनों मिलकर उसे प्यार से पालेंगे.”
“लेकिन… !”
“लेकिन वेकिन कुछ नहीं. हम दोनों एक दूसरे के साथ है न फिर इसके साथ क्यों नहीं! दुनिया तो आज भी कह रही है कल भी बोलेगी लेकिन हम तीनों एक दूसरे के साथ खड़े रहेंगे तो सुख की बगिया जरूर बसेगी.”
सुहानी की बात सुनकर विजय उसके हाथों को प्यार से अपने हाथों में लेता है और हामी भर देता है.
रेखा भारती मिश्रा
W/O कौशल
कुमार मिश्रा, रेलवे हण्डर रोड,
पश्चिमी लोहानीपुर, कदमकुआँ,
पटना-800003
मो० नंबर- 9308162129
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