तिलस्मी साहित्य के जनक बाबू देवकी नन्दन खत्री
तिलस्मी साहित्य के जनक बाबू देवकी नन्दन खत्री
प्रभात कुमार धवन
तिलस्मी साहित्य के जनक बाबू देवकी नन्दन खत्री जी का जन्म आषाढ़ कृष्ण सप्तमी संवत 1918, तदनुसार 18 जून सन 1861 ई. को पूसा, मुजफ्फरपुर (बिहार) में ‘धवन पंजाबी खत्री’ परिवार में हुआ था। इनके पूर्वज पंजाब के निवासी थे। जब वहां अराजकता फैली तब इनके पिता लाला. ईश्वरदास लाहौर छोड़कर काशी में जा बसे थे। इनकी माता पूसा के रईस जीवन लाल महथा की सुपुत्री थी। खत्री जी का बचपन ननिहाल में ही व्यतीत हुआ। ये बचपन से ही मस्त, सैर के शौकीन, पतंग उड़ाने के शौकीन, मजाकिया व तीव्र बुद्धि वाले व्यक्ति थे। इनकी शिक्षा हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी में हुई थी। गया जिले के टेकारी स्थल से बाबू देवकी नन्दन जी के पिता ईश्वर दास जी का व्यवसायिक संबंध था। अतः उन्होंने गया में ही कारोबार प्रारम्भ किया। वहां एक कोठी भी बनवायी थी। जब टिकारी अव्यवस्था के कारण सरकारी प्रबंध में चला गया तो पिता ईश्वर दास जी काशी चले गये। टिकारी में काशी नरेश ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह की बहन का ब्याह हुआ था इसलिए बनारस में भी इनके पिता की अच्छी पैठ हो गयी। इन्हें राज सम्पर्क की सहज सुविधा का लाभ मिला और चकिया तथा नौगढ़ के जंगलों में घूमने के क्रम में एक घटना विशेष ने इनके जीवन की दिशा बदल दी और इनको ‘चन्द्रकान्ता’ लिखने के लिए प्रेरित किया। थोड़े समय में ही इन्होंने चन्द्रकान्ता का पहला भाग पूरा कर लिया जो हरि प्रकाश प्रेस से सन 1888 ई. में प्रकाशित हुआ। चन्द्रकान्ता की अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक लोकप्रियता को देखते हुए जल्द ही खत्री जी ने इसके तीन भाग 1888-1889 और लिखे। इसको पढ़ने के लिए बहुतों ने हिन्दी सीखी थी।
‘चन्द्रकान्ता’ साहित्य की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है नौगढ़ के राजा सुरेन्द्र सिंह के पुत्र राजकुमार वीरेन्द्र सिंह और विजयगढ़ के राजा जयसिंह की पुत्री राजकुमारी चन्द्रकान्ता में प्रेम हो गया। विजयगढ़ के दीवान का बेटा क्रूर सिंह खुद चन्द्रकान्ता को प्राप्त करना चाहता था। वह भी प्रेम नहीं हिंसा और क्रूरता से। क्रूर सिंह के ही बहकावे में आकर चुनार का राजा शिवदत्त भी वीरेन्द्र सिंह के विरूद्ध षड्यन्त्र करने लगा और अन्त में वीरेन्द्र सिंह की विजय होती है। सारे विरोधी और षड्यन्त्रकारी मारे जाते हैं, कुछ गिरफ्तार कर लिये जाते हैं। अन्त में चन्द्रकान्ता की शादी वीरेन्द्र सिंह से हो जाती है। वीरेन्द्र सिंह और क्रूर सिंह दोनों के साथ ऐयार है, जो पूरी कहानी को आगे बढ़ाते हैं। चन्द्रकान्ता के साथ भी कई ऐयारा है। कहानी में ऐयार-ऐयाराओं के द्वारा विरोध का जाल फैलाया जाता है। अपनी तिलस्मी ईमारत में शत्रु पक्ष के व्यक्तियों को फंसाया जाता है। दूसरे पक्ष द्वारा अपने व्यक्तियों को तिलस्म से छुड़ाने के लिए ऐयार-ऐयारा अपनी जान की बाजी तक लगा देते हैं। इस प्रकार पूरे उपन्यास में ऐयारों के हौसले भरे हैरत अंगेज कारनामे है। ऐसी तिलस्मी और रोचक कथा है कि पढ़ने वाले इसमें पूरी तरह रम जाते हैं।
‘चन्द्रकान्ता’ के प्रकाशन से देवकी बाबू को सदैव प्रोत्साहन और स्नेह मिलता गया। इसके बाद (1894 – 1905) चन्द्रकान्ता सन्तति (रानी चन्द्रकान्ता और राजा वीरेन्द्र सिंह की सन्तानों की कहानी) को चौबीस भागों में पूर्ण किया। इसके अलावा सन 1893 ई. में ‘नरेन्द्र मोहनी’ मुजफ्फरपुर से एवं काशी नगरी प्रचारिणी सभा से सन 1896 ई. में ‘वीरेन्द्र वीर’ अर्थात ‘कटोरा भरा खून’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुए। इनके उपन्यासों के कई संस्करण प्रकाशित हुए। सन 1898 ई. के सितम्बर माह में इन्होंने अपना लहरी प्रेस खोला। लहरी प्रेस से इनके ‘कुसुम कुमारी’ सन 1899 ई. में ‘काजर की कोठरी’ सन 1902 ई. में तथा ‘गुप्त गोदान’ प्रथम भाग सन 1906 तथा ‘लैला मजनू’ सभी कृतियां प्रकाशित हुई। गुप्त गोदान, लैला मजनू और मृत्यु किरण वर्षो से अप्राप्य है। इनके नौलखा हार तथा अनूठी बेगम नामक दो उपन्यास क्रमशः कचौड़ी गली वाराणसी तथा फ्रेण्डस एण्ड कम्पनी मथुरा में छपे। पिछले उपन्यास के एक मुख्य ऐयार पात्र भूतनाथ को आधार बनाकर इन्होंने ‘भूतनाथ’ (1906 – 1912) उपन्यास शुरू की थी जिसे कई भागों में लिखना था, किन्तु 01 अगस्त 1913 ई. को अपनी असामयिक मृत्यु से उसके सिर्फ छ: भाग ही लिख सके थे। शेष पन्द्रह भाग इनके सुपुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री (धवन) ने पूरे किये। इसका प्रकाशन भी लहरी प्रेस से हुआ था। इन्होंने ‘उपन्यास लहरी’ नामक मासिक पत्रिका निकाली थी। जिसमें चन्द्रकान्ता सन्तति तथा भूतनी धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुए थे। माधव प्रसाद मिश्र के सम्पादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘सुदर्शन’ भी इन्हीं की देख-रेख में इनके द्वारा ही प्रकाशित होता था जो दो वर्ष तक ही चल सका।
एक ओर खत्री जी के उपन्यास का अभूतपूर्व स्वागत तो दूसरी ओर श्री वेंकटेश्वर समाचार (बम्बई) समालोचक (जयपुर) बिहार बन्धु (पटना) एवं सरस्वती पत्रिका ने तीखें स्वर में इनका गहरा विरोध किया। इन्हीं प्रतिकूल परिस्थितियों ने वस्तुतः इनके मार्ग का विकास किया। ब्रिटिश सरकार की भाषा नीति, आर्थिक व सांस्कृतिक शोषण ने भी हिन्दी में प्रकाशित इस नव विकसित विद्या (उपन्यास) को गहरा प्रभावित किया । खत्री जी के चन्द्रकान्ता लिखने का उद्देश्य केवल अपना और पाठक वर्ग का मनोरंजन करना था। उनके उपन्यास में उनकी अपनी सोच और परिस्थितियों ने काम किया है।
वहीं यह भी कहा जाता है कि तिलस्मी ऐयारी उपन्यास के जिस रूप की परिकल्पना इन्होंने की उसकी प्रेरणा इन्हें फौजी के ‘तिलस्म-इ-होशरूबा’ नामक उर्दू रचना को पढ़कर मिली थी और उसमें इन्होंने ‘बोस्तन-इ-ख्याल’ तथा ‘दास्तान-इ-अमीर हम्जा’ जैसी रचनाओं का अनुकरण किया था। उर्दू के उपन्यास जहां वासना परक थे वहीं खत्री जी ने अपनी सभी कृतियों को उससे दूर रखा। खत्री जी की कल्पना शक्ति उर्वर थी। दुर्गा उपासक होने से इन्हें सदैव शारीरिक एवं मानसिक बल मिलता रहा। तिलस्मी एवं ऐयारी के उपन्यासों का प्रचलन करने का इन्हें श्रेय तो मिला ही साथ ही यह जन साधारण को हिन्दी के प्रति उन्मुख करने में भी काफी सफल हुई। इनकी रचनाओं में जो रहस्य और रोमांच है वह आलौकिक चमत्कार न होकर सिर्फ मानवीय बुद्धि और कौशल का परिणाम है, जो मनुष्य को भटकाव के पथ से रोकता है। आज जरूरत है इनके साहित्य को ज्यादा से ज्यादा प्रकाश में लाकर उसके मूल्यांकन और पठन-पाठन की। मेरा सौभाग्य है मैं देवकी बाबू के करीब का हूँ। आज इनके वंशज वाराणसी के महमुर गंज एवं पटना में रह रहे हैं।