“तुम मेरे हमसफर बनोगे”

"तुम मेरे हमसफर बनोगे"

पूजा गुप्ता

शाम का धुंधलका हो चुका था। ट्रेन धीमी गति से चल रही थी। शायद कोई स्टेशन आने वाला था।अक्षत ट्रेन की बोगी में खिड़की के पास बैठे हुए एकटक गहन विचारों में खोया हुआ था। जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी अक्षत की तन्द्रा टूटी। वो चाय वाले को आवाज दिया। चाय के साथ कुछ नमकीन लेकर वह चाय पीने लगा। थोड़ी देर बाद ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफार्म छोड़ने वाली थी तभी अक्षत ने प्लेटफॉर्म पर एक युवती को धीरे-धीरे ट्रेन की तरफ बढ़ती देखा। सौंदर्य से परिपूर्ण, जैसे कोई परी उतर आई हो जमीन पर। चंद्रमा के जैसे उसका मुखमंडल, लंबे केशों से सुसज्जित, एक लंबी चोटी, माथे पर एक बिंदी जैसे सितारा, बड़ी-बड़ी आंखें, लंबे सलवार सूट में वह मासूम सी लड़की बैसाखी के सहारे डरी-डरी सी प्लेटफॉर्म से ट्रेन में चढ़ने की कोशिश में थी। वह चाह कर भी जल्दी-जल्दी नहीं चल पा रही थी। ट्रेन धीरे-धीरे चलना शुरू हो गई। “जल्दी करिए ट्रेन स्पीड पकड़ रही है।” अक्षत ने उसे लड़की को आवाज लगाते हुए कहा। ट्रेन की स्पीड पकड़ने के पहले ही अक्षत ने आपातकालीन ट्रेन में लगी जंजीर को खींच दिया ताकि वह लड़की आराम से ट्रेन में चढ़ सके। वह ट्रेन के फाटक के पास आकर युवती से बोला। “क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूं? मैंने जंजीर खींच दी है ताकि आप आराम से ट्रेन में चढ़ सको।” “जी धन्यवाद आपका बस मेरा सामान ट्रेन पर जल्दी से आप चढ़ा दे तो आभारी रहूंगी।” बिना कोई सवाल किए अक्षत ने उस युवती का सामान लेकर अपनी सीट पर आकर बैठ गया और वो युवती धीरे-धीरे ट्रेन में चढ़कर अक्षत के पास आकर बोली। “सीट नंबर १०५ यही मेरी सीट भी है।” इत्तेफाक से अक्षत की सीट का नंबर १०४ था। दोनों सफर में अजनबी थे। ” अरे आपकी सीट तो मेरे साथ ही है चलिए बढ़िया है आप को कोई असुविधा नहीं होगी आप आराम से बैठ जाइए।” अक्षय बोला। वो युवती अपनी सीट पर बैठ गई और अपनी बैसाखी को एक किनारे रख कर अपने बैग से एक किताब निकलकर शांत मन से कुछ पढ़ने लगी। सामने बैठा अक्षत अपने मोबाइल पर व्यस्त हो गया। कुछ देर तक माहौल एकदम शांत था। हवा के झौंके खिड़की के रास्ते से उस युवती के बालों को छूकर उसके चेहरे की सुंदरता पर चार चाँद लगा रहे थे। अक्षत ने उसकी तरफ कनखियों से देखा। फिर खामोशी तोड़ते हुए उसने उस युवती से पूछा। “क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?” मेरा नाम सुनयना है और आपका नाम? उस युवती ने अक्षत से पूछा। “मेरा नाम अक्षत है और मैं सरकारी स्कूल में टीचर हूँ। मैं अपने घर झाँसी जा रहा हूँ और आप?” “मैं प्रयागराज मे रहती हूँ ।एक अनाथ बच्चों का आश्रम चलाती हूँ। मन की इच्छा थी वृन्दावन में बांके बिहारी के दर्शन करने की बस इसलिए वहीं जा रही हूँ।” “आप अकेली आई है आपके साथ कोई नहीं आया सफर में?” अक्षत ने थोड़ा संकोच करके सुनयना से पूछा। सुनयना अक्षत के इस सवाल से चुप हो गई। अक्षत भी भांप गया था कि शायद सुनयना नहीं बताना चाहती इसलिए वो शान्त होकर बोला, “सॉरी ” “सॉरी क्यूँ? मैं अंजान लोगों से अपने घर की बात नहीं करती आप मुझे भले से लगे तो इसलिए आपसे कुछ भी कहने से रोक नहीं पाऊँगी। मेरी जिन्दगी बहुत कठिनाईयों से घिरी है अक्षत जी। मेरा कोई नहीं है अब इस दुनियां में। मैं भी अनाथ आश्रम में पली हूँ और उसी आश्रम को अब मैं चला रही हूँ।” सुनयना अपने आँखों के आँसू छुपाते हुए खामोश हो गई। ” वैसे मैं भी किसी से इतना मिलता-जुलता नहीं हूं और कम बोलता हूँ पर सुनयना आपकी बातों को सुनकर आपके बारे में जानने की जिज्ञासा हो गई है यदि हो सके तो मुझे बता सकती हो अपनी बीती जिंदगी के बारे में।” ” अपाहिज हूँ मैं ये तो आपको दिख रहा है अक्षत जी। बचपन में मैं सामान्य थी शरीर से, पर एक घटना ने मेरे जीवन को पूरी तरह बदल दिया। जिसके बाद मैं फिर चली तो बैसाखी के सहारे।” उसी समय अचानक टीटी आ गए और टिकिट चेक करने लगे। ट्रेन लगातार धड़ाधड़ धड़ाधड़ चल रही थी। मौसम का मिजाज एकदम बदल गया और तेज हवा के साथ बारिश होने लगी। खिड़की के किनारे बैठी सुनयना भीग रही थी तो अक्षत ने उठकर खिड़की बंद कर दिया। गर्म चाय वाला चाय लेकर उनकी तरफ बढ़ा। “चाय, चाय, चाय!” दो कप चाय देना।” अक्षत बोला। “ठीक है साहब २० रुपये दीजिए।” सुनयना अपने पर्स से पैसा निकाल ही रही थी अक्षत ने उसे पैसे देने से मना करते हुए जल्दी से चाय वाले को पैसे देकर चाय वाले को रवाना कर दिया। अक्षत ने सुनयना से आगे बात बढ़ाते हुए पूछा। “इसके बाद क्या हुआ था सुनयना जी बताएं।” “पिताजी और माँ के साथ मैं पिकनिक स्पॉट पर कार से जा रही थी। उस दिन बहुत मन बैचैन था लेकिन फिर भी मैं खुश थी कि माँ पिताजी के साथ काफी दिनों के बाद घूमने निकली हूँ। मैं इकलौती सन्तान हूं अपने माता-पिता की। कार सरपट दौड़े जा रही थी। एक मोड़ पर अचानक से ट्रक आया और बुरी तरह से कार एक्सीडेंट हुआ जिसमें माता-पिता दोनों की मृत्यु हो गई और मेरा पैर बुरी तरह से कार की चपेट में आ गया जिसके बाद मैं बच तो गई लेकिन फिर मैं कभी ठीक से नहीं चल पाई। ” इतना कहते कहते सुनयना एकदम से रो पड़ी। अक्षत बात को वहीं विराम देना चाहता था और सुनयना की झील सी आँखों से अविरल धारा उसके गालों को छूती हुई जमीन मे टपक रही थी। अक्षत धीरे से जेब से रुमाल निकालकर सुनयना को आँसू पोछने को दे दिया। ” मन के अंदर बहुत तकलीफ है लेकिन कुछ कहते हुए मुझे पुरानी बाते याद आने लगती है।” सुनयना बोली। अचानक ट्रेन रुक गई। लेट होते होते स्टेशन पर एक घण्टे तक ट्रेन खड़ी रह गई। अक्षत ने सुनयना से कहा, “जब तक ट्रेन खड़ी है आप खाना खा लीजिए।” सुनयना अपना टिफिन निकालते हुए अक्षत के सामने बैठ कर खाना खाने की कोशिश कर रही थी। अक्षत भी ना जाने कितनी बार नजरे बचाकर सुनयना को छिपती नजरों से देख रहा था। उसके मन में सुनयना के लिए बहुत हमदर्दी सी होने लगी थी। आप खाना खाएंगे? सुनयना अक्षत से बोली। ” नहीं मैं ट्रेन में खाना नहीं खाता आप खाइए। एक बात पूछना चाहता हूँ यदि आप कहे तो कहूँ?” “हाँ बिल्कुल कहिये अक्षत जी।” सुनयना बोली। “आप अनाथ आश्रम कैसे पहुंची सुनयना जी? क्या आपके परिवार में और कोई नहीं था जो आपकी जिम्मेदारी ले सके?” अक्षत के इस सवाल से सुनयना बहुत उदास सी हो गई। “हाँ परिवार में चाचा-चाची है। वो लिखा पढ़ी करके मुझे गोद ले लिए थे। कुछ दिनों उन्होंने बहुत अच्छे से मुझे रखा लेकिन कुछ समय बाद उनके हावभाव बदल गए। मैं लाचार हो चुकी थी पैरों से इसलिए उन्हें मेरा बोझ उठाना बोझ लगा। धीरे से तीन पांच करके उन्होंने मुझे अनाथ आश्रम में डाल दिया। फिर मैं वहीं पर रहकर अपना जीवन बिता रही हूँ। अब तो मैं वहां पर सम्मानीय हूँ और सभी लोग मुझे प्रेम करते हैं। ये आश्रम ही मेरा परिवार है।” अचानक रुकी ट्रेन चल पड़ी। जैसे-जैसे ट्रेन रफ्तार पकड़ रही थी वैसे-वैसे अक्षत का सुनयना के साथ बीत रहे पल घट रहे थे। मंजिल ज्यादा दूर नहीं थी। अक्षत के साथ सुनयना भी अक्षत को बेबसी भरी नजरों से देख रही थी। मानो दोनों ही कुछ कहना चाहते हो अपने मन की। खामोशी तोड़ते हुए सुनयना भी अक्षत से पूछ पड़ी। “आपके परिवार में कौन कौन है?” सुनयना ने अक्षत से पूछी। “मेरी माँ और मैं हूं परिवार में। पिताजी दस साल पहले गुजर गए थे। उनकी जगह मुझे शिक्षक की नौकरी मिल गई।” अक्षत बोला। ” कितना अच्छा लगता है ना अक्षत जी कोई अजनबी सफर में अपनेपन से बाते करे वर्ना आज की दुनियाँ केवल स्वार्थ से भरी है।” सुनयना बोली। “सभी को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए जन्म लेना पड़ता है और जीवन के सफर में और ट्रेन के इस सफर में आप जैसी संघर्षशील महिला से मुलाकात मुझे हमेशा याद रहेगी।” अक्षत बोला। शाम होने को थी ठण्डी हवा तन मन को सहला रही थी। अक्षत और सुनयना दोनों एक दूसरे को नजरे छिपाकर देख रहे थे मानो आँखों से बात करने के लिए आतुर थे। दोनों की मनस्थिति एक सी थी कि इस सफर के बाद दोनों के रास्ते अलग हो जाने वाले है। “सुनयना जी! मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। ” नजरे मिलाते हुए अक्षत सुनयना से बोला। “अक्षत जी आप कहिये मैं सुन रही हूँ।” कुछ झेपती सी सुनयना बोली। “मैं सरकारी नौकरी में हूं एक शिक्षक होने के नाते मेरी तनख्वाह अस्सी हजार है। बहुत बड़ा महल तो नहीं पर एक छोटा सा घर मैंने अपनी माँ के लिए बनाया है। मैं खाना भी बना लेता हूँ। काम के सिलसिले से अक्सर मुझे बाहर भी जाना होता है। कभी-कभी स्कूल के कुछ कार्य अधूरे रह जाते हैं। मेरी माँ घर में अकेली रह जाती है।” बहुत हड़बड़ी में अक्षत सुनयना से अपनी बाते कहता जा रहा था। मानों जैसे उसे कुछ और भी कहना था। ” अच्छा फिर आगे क्या सोच रहे हैं। माँ को प्रेम से रखना तो हर किसी का कर्तव्य होना चाहिए अक्षत जी।” ” हाँ पर!” … ये कहते हुए अक्षत चुप हो गया। ” पर क्या अक्षत जी?” सुनयना हैरानी से अक्षत को देखते हुए बोली। “मैं आपसे जो कहना चाहता हूँ मुझे पता नहीं आपको क्या महसूस होगा।” ” एक बार कह कर देखिये हो सकता है आपके सवालों के उत्तर मेरे पास हो। हम अब इस सफर में एक दूसरे के मित्र बन गए हैं तो कहें क्या कहना चाहते हैं आप?” अक्षत कुछ कहता, इससे पहले ही ट्रेन में बैठे सभी यात्री शोरगुल करने लगे। सीट को लेकर झगड़ा व्याप्त हो गया यात्रियों के बीच। जैसे तैसे झगड़ा शांत हुआ तो स्टेशन आ गया। सभी धक्का-मुक्की करते हुए ट्रेन से उतर रहे और चढ़ रहे थे। अभी अक्षत और सुनयना की मंजिल आने के लिए तीन स्टेशन की दूरी थी। “हाँ आप कुछ कह रहे थे? ” सुनयना बात को आगे बढ़ाते हुए अक्षत से पूछी। अक्षत मुद्दे की बात कहते कहते चुप हो गया। सुनयना से कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और बात के रुख को बदलते हुए उसने सुनयना से पूछा। “आप वृंदावन में दर्शन करने के लिए जा रही है। आप क्या मन्नत पूरी करने जा रही है या किसी के लिए दुआ मांगने भगवान से।” “नहीं बस मैं आत्मिक शांति के लिए जा रही हूँ। मन की इच्छा थी दर्शन को। यदि कुछ माँगना हुआ तो बस आश्रम के लोगों के लिए अच्छे जीवन की दुआ मांगूंगी।” सुनयना बोली। अक्षत मन ही मन बहुत सी बातें सुनयना से करना चाहता था। जैसे उसके मन के अंदर एक हलचल मच गई हो। ” क्या मैं सुनयना जी से मन की बात कह पाऊँगा? ” अंदर से अक्षत की अन्तरात्मा हाँ नहीं के फेरे में जद्दोजहद कर रही थी। ” क्या आप खुद के लिए कुछ नहीं मांगेगी भगवान से?” अक्षत बोला। “नहीं मेरे जीवन में मेरे लिए मांगने लायक कुछ नहीं बचा है।” सुनयना बोली। “क्यूँ नहीं बचा है। थोड़ा ध्यान से सोचिए कोई ऐसी चीज जो आप भूल रहीं हो और आप चाह कर भी मांग नहीं पा रहीं हो। ” अक्षत बोला। ध्यान से सोचने पर सुनयना को ऐसी कोई भी चीज याद नहीं आई जिसे वो खुद के लिए मांग सकती थी। वो गहन सोच में थी। अपाहिज होने का उसे मन ही मन ख्याल, खुद के लिए कुछ भी मांगने के लिए कभी गवाही नहीं दिया। ” नहीं अक्षत जी मुझे मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए भगवान से।” सुनयना थोड़ा कठोर होकर अक्षत से बोली। सफर का अंत होने वाला था। एक ही स्टेशन बचा था। अक्षत की मंजिल आने वाली थी। वो रह नहीं पाया और अपने मन की बात सुनयना से कहने के लिए अपना दिल पक्का कर लिया फिर अचानक बोल पड़ा। ” सुनयना जी मेरी मंजिल आने वाली है। फिर आप अकेली पड़ जाएगी सफर में।” “हाँ अक्षत जी अकेले ही सफर तय किया है तो आगे का सफर भी अकेले ही तो करूंगी।” सुनयना थोड़ा सा उदास हो कर अक्षत से बोली। “मैं झाँसी में रहता हूँ उसके बाद आप आगे अकेले सफर तय करेंगी तो हम दोनों में एक रिश्ता, ऐसा तो बन गया है कि कभी आपसे बात करनी होगी तो मैं आपका फोन नंबर लेना चाहूँगा। यदि आप को ऐतराज ना हो।” अक्षत ने डरते डरते बोला। “नहीं अक्षत जी मैं इस सफर में अकेले ही रह जाना पसंद करूंगी ना कोई सम्पर्क ना कोई नंबर दूंगी। ” सुनयना बोली। ” सुनयना जी….. एक आखिरी बार आपसे कुछ कह रहा हूँ यदि आपको मेरी बात अच्छी लगे तो मेरा उत्तर दे देना।” अक्षत थोड़ा रुआँसा होकर सुनयना से बोला। “हाँ कहिये!” ” इस ट्रेन के सफर में हम दोनों भले ही अकेले चले थे लेकिन यदि आपको कोई परेशानी ना हो तो इस सफर में आपको मैं अपनी अर्धांगिनी बनाना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ आप किस स्थिति में है परंतु मैं आपको अपना हमसफर जीवन भर के लिए बनाना चाहता हूँ। ” अक्षत एक बार में अपनी बात सुनयना से कह गया। ” ये क्या कह रहे हैं आप? मैं अपाहिज हूं। भला मुझसे आप कैसे रिश्ता जोड़ सकते हैं? क्या आप मुझ पर दया करके मुझसे रिश्ता जोड़ रहे हैं? मैं बोझ हूँ भला आप क्यूँ मेरा बोझ उठाना चाहते हैं? नहीं अक्षत जी मैं आपका प्रस्ताव अस्वीकार करती हूं।” “नहीं आप मेरे लिए बोझ नहीं है बल्कि आप मेरी ताकत बनेगी। मेरी अकेली माँ को एक सच्ची सहेली दूंगी आपके रूप में। मैं आप में सच्चा हमसफर देख रहा हूँ। आप पूर्ण है मेरे इस अपूर्ण जीवन को पूर्ण कर दीजिए सुनयना जी। जीवन के हर सफर में आप जैसी साथी को पाकर मैं धन्य हो जाऊँगा। मैं आपके आश्रम का भार भी अपने सिर लेना चाहता हूँ। प्लीज सुनयना जी…. एक बार फिर सोच लीजिए। स्टेशन आने वाला है मैं चला जाऊँगा और अधूरा रह जाऊँगा।” सुनयना विस्मित सी रह गई ये सब अक्षत के मुँह से सुनकर। उसे जीवन में किसी ने स्पेशल नहीं समझा। आज अक्षत के मुँह से खुद के लिए ये सब सुनकर निःशब्द थी सुनयना। अचानक ट्रेन रुकी अक्षत की मंजिल आ गई वो समझ गया था कि सुनयना उसे अस्वीकार कर दी है। वो भारी कदमों से ट्रेन से उतरते हुए सुनयना को पीछे मुड़ कर देख आगे बढ़ गया। अचानक किसी ने अक्षत का हाथ पीछे से पकड़ लिया। अक्षत ने मुड़कर देखा तो सुनयना थी। “क्यूँ मेरे हमसफर! मुझे छोड़ कर इस सफर में कहाँ जाओगे? क्या आप मेरे हमसफर बनोगे?” “हाँ सुनयना जी!” अक्षत खुशी से झूम उठा। दोनों को एक मंजिल मिल गई। और अक्षत सुनयना सदा के लिए इस ट्रेन के सफर में हमसफर बन गए।

पूजा गुप्ता

भगवानदास की गली, आदर्श स्कूल के सामने गणेश गंज, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) मोबाइल – 7007224126 इमेल – guptaabhinandan57@gmail.com मेरा नाम पूजा गुप्ता है। मेरा जन्म ३०.४.१९८० (३० अप्रैल १९८०) जबलपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। मैं बी.ए ग्रेजुएट हूं। २५ वर्षों से साहित्य सृजन में सक्रिय भूमिका निभा रही हूं। मेरी प्रकाशित कृतियां “मनः स्थली” (मेरे मन के भाव) भाग-१ एवं भाग-२(काव्य संकलन), मेरी संवेदनाएं भाग-१ (गद्य संकलन) में है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों प्रशस्ति पत्र से सम्मानित हूं। लेखिका, कवयित्री हूं। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं और विभिन्न राज्यों के समाचार पत्रों में मेरी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

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