राजेश पाठक की कविताएँ

- राजेश पाठक

1.तुम

तुम न मिलो
तो लगता है
सूख गई कोई नदी

तुम न खिलो
तो लगता है
मुरझा गई कोई कली

तुम न दिखो
तो लगता है गायब
हो गई चांद से रोशनी
इसलिए
तुम मुझमें मिलो
जैसे आकर
मिलती है नदी समुद्र में

तुम मुझमें खिलो
जैसे खिलता है गुलाब
कांटों के बीच में

तुम मुझमें दिखो
जैसे दिखती है रोशनी
चांद में,,

2.उड़न छू

तुझे देख
उड़न छू हो जाता है
सीने में छुपा दर्द

जैसे उड़न छू हो जाती हैं
ओस की बूंदें
सूरज की किरणों को देख

जैसे उड़न छू हो जाता है
अंधेरा
उजाले को देख

जैसे उड़न छू हो जाती हैं
पसीने की बूंदें
हवा को देख

इसलिए तुम्हारा दिखाई देना
जैसे सूरज की किरणें
पसर गई हो
मेरी राह में

जैसे उजाला
भर आया हो
मेरे जीवन में

और जैसे हवा
समा गई हो
मेरे सांसों में

3.तुम आओ!

तुम्हारे आने से
बदल जाते हैं
दुनिया के मायने

बदल जाते हैं
दुनिया के
ढंग व रंग भी

इसलिए
तुम आओ
और बदल दो
मेरी स्याह दुनिया
का बदसूरत रंग

जैसे अम्ल
बदल देता है
नीले को सुर्ख में

तुम भी बदलो
मेरे दु:ख को सुख में

– राजेश पाठक

जिला सांख्यिकी कार्यालय,

गिरिडीह (झारखंड)- 815301

मो नं 9113150917

*संप्रति झारखंड सरकार में जिला सांख्यिकी पदाधिकारी

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