वो समय कुछ और था – नीरजा हेमेन्द्र
वो समय कुछ और था
नीरजा हेमेन्द्र
फोन की घंटी बजी।…..बात आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व की है। तब मोबाईल फोन नही होते थे। घर में बेसिक फोन होते थे जो किसी एक स्थान पर या अधिकतर ड्राइंगरूम में रखे रहते थे। ताकि पास-पड़ोस के लोग देख सकें। ये बेसिक फोन भी आम लोगों के पास कम, पैसे वालों के पास ही होते थे। अतः दिखावे की चीज भी समझे जाते थे।
फोन की घंटी बजते ही प्रभा रसोई से हाथ पोंछती हुई ड्राइंग रूम की ओर भागी। फोन ड्राइंग रूम में रखा था। उस समय फोन बात करने की चीज कम अपना स्टेटस, अपनी अमीरी दिखाने की चीज अधिक समझा जाता था।
फोन उठाकर प्रभा ने ’ हलौ ’ कहा।
’’ प्रभा….प्रभा….मैं बोल रहा हूँ। तुम्हारा भाई, रंजन। ’’
’’ अरे भईया, आपको अपना नाम बताने की आवश्यकता है क्या? मैं आपकी आवाज सुनकर पहचान गयी….और हालचाल बताईये कैसा है? ’’ अपने कलक्टर भाई का फोन सुनकर प्रभा फूली नही समा रही थी।
भाई का फोन बहुत दिनों के बाद आया था। वह भाई से खूब बातें करना चाहती थी। भाभी का हाल पूछा। भाई के चारों बच्चों का हाल पूछा। फिर भी दिल नही भरा।
’’ सब ठीक है। अब मेरा स्थानान्तरण मेरठ में हो गया है। मैं तो परिवार के साथ वहाँ चला जाऊँगा। यहाँ लखनऊ में इतना बड़ा घर है। घर खाली रहेगा। इसकी देखभाल करने वाला कोई नही है। बड़ी चिन्ता मंे हूँ। तुम्हारे अतिरिक्त मेरा और कौन है जिससे अपनी परेशानी कह सकता हूँ? ’’ अपने बड़े भाई की बात सुनकर प्रभा भावुक हो गयी। अपनी बात कह कर भाई ने फोन रख दिया।
फोन रखने के पश्चात् प्रभा सोचने लगी कि भाई लखनऊ में रहता है जहाँ उसके घर से लगा हुआ यानि कि उस घर के आधे हिस्से में मेरे एक और छोटे भाई का घर है। मेरे दो ही तो भाई हैं। दोनों के हिस्से बड़े घर आये हैं। कुछ ही दूरी पर दूसरे मुहल्ले में मेरी एक छोटी बहन व्याही है। बड़े भाई चाहे तो उस बहन से भी घर की देखभाल करने के लिए कह सकते हैं।
दोनों भाईयों के परिवार में बातचीत नही है। छोटा वाला भाई तो उनके घर से कोई मतलब नही रखेगा। किन्तु छोटी बहन ने तो आपने कलक्टर भाई से खूब अच्छा व्यवहार बना कर रखा है। जब भी कलक्टर भाई का परिवार उसके घर आता है, चार पहिए की गाड़ी से आता है। पूरे महल्ले में बहन की धाक जम जाती है।
उस जमाने में किसी के पास चार पहिए की गाड़ी होना बहुत बड़ी हैसियत वाला माना जाता था। प्रभा की छोटी बहन कलक्टर भाई के परिवार को कभी चाय तो कभी खाने पर बुलाती रहती थी। प्रभा ने सुना है कि उसने कलक्टर भाई से कह कर अपने बड़े बेटे की नौकरी सरकारी दफ्तर में लगवा ली है।
भाई को अपनी समस्या मुझसे कहने का क्या अर्थ है? प्रभा अपने पति के साथ मुम्बई में रहती है। उसके पति थोक कपड़ों के व्यपाारी हैं। उसके दो बेटे हैं। उसकी गृहस्थी ठीक चल रही है। घर में सुख-सुविधा की सभी चीजें हैं। अपना घर है। और क्या चाहिए जीवन में वह सुख पूर्वक रह रही है।
प्रभा समझ नही पा रही है कि भाई ने उससे अपने घर की देखभाल की परेशानी का जिक्र क्यों किया?
शाम को उसके पति समीर जब घर आये तो प्रभा ने भाई के फोन आने और उनके स्थानान्तरण की बात बताई तथा यह भी कि भाई कह रहे थे कि उनका घर देखने वाला कोई नही रहेगा।
’’ तो अपने भाई से कह देना कि घर की देख-भाल के लिए एक नौकर रख लें। कलक्टर हैं उन्हें पैसों की क्या कमी? ’’ समीर ने कहा।
’’ किन्तु वो मुझे बुला थोड़े न रहे हैं। अपनी परेशानी बहन से नही कहेंगे तो किससे कहेगे? ’’ प्रभा ने अपने पति से कहा।
’’ ठीक है। ये बताओ तुम्हारा भाई कभी तुम्हारा हाल पूछता है क्या? कलक्टर है तो क्या हुआ? है तो इन्सान ही जो रिश्ते में तुम्हारा भाई लगता है? लगभग डेढ़-दो वर्ष के पश्चात् उसका फोन आया है। वो भी ये बताने कि उसका स्थानतरण हो गया है। बड़ा-सा घर है उसकी देखभाल करने वाला कोई नही है। वाह रेे, तुम्हारा कलक्टर भाई। ’’ समीर ने प्रभा से कहा।
’’ पूरे जिले के हजारों काम हैं उसके पास। हाल नही पूछता है तो क्या? ’’ प्रभा ने अपने भई का पक्ष लेते हुए कहा।
इस समय ट्यूटर प्रभा के दोनों बेटो को पढ़ाने आने वाला था। अतः प्रभा ने नाश्ता करा कर दोनों बेटो को स्टडी रूम में बैठा दिया था। ट्यूटर आया दोनों बेटे अपनी पढ़ाई करने लगे। प्रभा रसोई में भोजन तैयार करने लगीं।
चाय नाश्ता कर के समीर अपने कमरे में बैठ कर अपने व्यवसाय की फाईलें देखने लगे।
इसी प्रकार दिन व्यतीत हो रहे थे। प्रभा का मन कई बार भाई को फोन करने के लिए कहता किन्तु वह ये सोच कर नही करती कि भाई ये न समझे कि वह कलक्टर है इसलिए उसकी बहन उसे रिश्ता रखना चाहती है। क्यों कि समीर ने एक बात सच कही थी कि उसके भाई का फोन लगभग डेढ़ वर्ष बाद आया है। प्रभा ने इससे पूर्व कई बार उसका हाल-चाल जानने के लिए फोन किया किन्तु भाई ने फोन नही उठाया।
आज भाई ने अपनी समस्या के साथ मुझे फोन किया। न जाने उनके साथ क्या चल रहा है? प्रभा थोड़ी चिन्ता में पड़ गयी।
’’ हमने मेरठ में ज्वाइन कर लिया। फैमिली भी मेरे साथ आ गयी है। घर बन्द कर के आये हैं हम लोग। ’’ पन्द्रह दिन भी न बीते कि प्रभा के भाई फोन पुनः आया।
’’ हाँ….हूँ….’’ कर के प्रभा भाई के फोन का उत्तर दे रही थी।
’’ तीन साल मुझे यहाँ रहना पड़ेगा। ’’ भाई ने कहा।
प्रभा के बेटे ने निर्णय लिया कि वह मामाओं के घर नही रहेगा। अब जिन्होंने नौकरी लगवायी है उनके घर के ही किसी कोने में रहेगा। उन्हें अब वो बाबू कहने लगा था। वह जानता है कि बाबू का अर्थ पिता भी होता है।
अब वो दिन में कार्यालय के काम करेगा। सुबह-शाम बाबू के घर के काम कर दिया करेगा। उसने बाबू से विनती की कि उसे अपने घर के एक कोने मे रहने की जगह दे दें। वह जानता है कि उनके उपकार का बदला कभी नही चुका सकता। किन्तु बाबू की पत्नी जिन्हें वह काकी कहने लगा था, काकी जो काम बताएंगी वह सेवक की भाँति करेगा।
वह उनको पिता मानता है किन्तु वह उन सबकी सेवा सेवक की भाँति करेगा।
’’ ये क्या कह रहे हो बेटा? तुम हमारे घर में रहो। जो भोजन हम सबके लिए बनेगा वो तुम भी खाना। ’’ बाबू जी ने कहा।
प्रभा का बेटा उन बाबू जी के घर रहने लगा। उन लोगों ने उसे इतने स्नेह से रखा कि बाहरी व्यक्ति समझ नही पाता कि वह किसी गैर की सन्तान है। प्रभा का बेटा जो वेतन मिलता वो ला कर काकी के हाथ पर रख देता। काकी उसके पैसे वापस कर देती और बैंक में जमा करने के लिए कहती ताकि आवश्यकता पड़ने पर प्रभा के बेटे के काम आये।
समय रूपी चिकित्सक ने प्रभा के बेटे के घाव भरने का प्रयत्न किया किन्तु उसके घाव का ऊपरी सतह तो सूख गया। किन्तु भीतर से घाव हरे थे। साल-दर साल गुज़रते चले गये किन्तु प्रभा के बेटे ने कभी भी अपने मामाओं दरवाजे पर पैर नही रखा। यहाँ तक की दोनों मामाओं का मृत्यु पर भी नही। वह अपने पैसे वाले पिता को दो निवाले के लिए भिक्षा मांगने के लिए विवश करने वाले कलक्टर मामा को स्वार्थ कभी विस्मृत नही कर पाता।
कुछ समय पश्चात् बाबू जी ने प्रभा के बेटे का व्याह कर दिया।
प्रभा के बेटे ने अपने दोनों बच्चों को बता रखा था कि बाबूजी ही उनके दादा और काकी दादी हैं। काकी के कहने पर अपने बचत के पैसे से वह एक छोटा-सा अपना घर किस्तों पर ले लिया है किन्तु बाबूजी और काकी को इस वृद्धावस्था में छोड़ कर वह अभी नही जाएगा। वह उनकी सेवा करना चाहता है। ताकि उसकी माँ प्रभा व उसके पिता समीर की आत्मा को थोड़ी शान्ति मिल सके।
– नीरजा हेमेन्द्र
’’नीरजालय ’’ 510/75
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