पत्र-पत्रिका: यात्रा कथा
सम्पादकीय
पत्र-पत्रिका: यात्रा कथा
पीयूष अवस्थी
प्रिय दोस्तों ! मेरे अजीजों !
आपके सामने हाजिर हूँ एक नई ‘‘ई-पत्रिका’’ ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका को लेकर! आपके प्यार, स्नेह और आत्मीयता का हमेशा से कायल रहा हूँ ! विश्वास है कि इस पत्रिका के माध्यम से, स्नेह, आत्मीयता, प्रसंशा व प्रतिक्रिया, सभी सन्दर्भों में, आपसे बराबर जुड़े रहने का सौभाग्य प्राप्त होता रहेगा ! इसका सम्पादकीय दायित्व ग्रहण करने के पूर्व मुझे यह कार्य सहज ही लगा था, लेकिन सच कहूँ, सभी रचनाओं को पढ़ना, उनमें प्रकाशन योग्य साहित्य को चयनित करना, साधारणतया कोई सरल कार्य नहीं है ! फिर भी मुझे यह कार्य करते हुए असीम सुखानुभूति हो रही है !
इस पत्रिका को आप तक पहुँचाने की कहानी भी रोचक है, अपनी किताबों के प्रकाशन के लिए दिल्ली में डेरा जमाये देश और विदेश से सम्बंधित तमाम प्रकाशकों से सम्पर्क करता रहा, तमाम मनलुभावली स्कीमों, प्रलोभनों से भरे वायदों, और वसूला जाने वाला मूल्य, समय का झूठा वायदा इन सबसे रूबरू होता गया, कई जगह तो एडवांस भी वापस नहीं हुआ, एक साल तो प्रतीक्षा में ही निकल गया! हालाँकि इससे एक फायदा जरूर हुआ, प्रकाशन से जुड़ी तमाम जानकारियाँ जहन में पैबस्त हो गईं, फिर इस सन्दर्भ में व्यापक वैचारिक मन्थन किया और पाया कि मेरे जैसे हजारों कवि, लेखक भी इसी त्रासदी से गुजर रहे होंगे, तो क्यूँ न अपना प्रकाशन ही स्थापित कर लिया जाये, जिससे स्वयं के साथ अन्य लोगों को भी कम समय, कम दाम और उच्च गुणवत्ता के साथ अपनी किताबें प्रकाशित कराने का सुअवसर प्राप्त हो सके, सहूलियत हो!
बस उसी के साथ ‘‘शब्दकार प्रकाशन’’ और ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका की पंजीयन, मार्क रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई, इसका परिणाम भी बेहद सुखद रहा, शब्दकार प्रकाशन में कविता, गीत, कहानी आदि की किताबें हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, रूसी व अन्य भाषाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं !
शब्दकार प्रकाशन की बढ़ती लोकप्रियता से उत्साहवर्धन भी हुआ और यह ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका अभी ‘‘ई-पत्रिका’’ के रूप में आपके सामने प्रस्तुत है, निश्चित ही कुछ माह बाद आप इसे ‘‘ई-पत्रिका’’ के साथ-साथ मुद्रित पत्रिका के रूप में भी पायेंगे ! आपके प्यार, स्नेह, आत्मीयता और सहयोग का आकांक्षी हूँ !
पत्र-पत्रिकाओं का एक लंबा इतिहास है! कुछ समाचार पत्र भी रविवार को साप्ताहिकी अंक भी निकलते थे,जिनका सभी कवियों लेखकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था, इस मामले में ‘‘दैनिक जागरण’’ के साप्ताहिक परिशिष्ट की अलग पहचान थी, बाकी ‘‘अमर उजाला’’ ‘‘दैनिक आज’’, ‘‘दैनिक भाष्कर’’ आदि-आदि !
आइये चलते हैं पत्र-पत्रिकाओं की पिछली पीढ़ी की ओर- जहाँ तक समझा जाता है हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई, जिसमें सबसे प्रथम 1780 ई. में प्रकाशित ‘‘बंगाल गजट’’ है! बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है! इस समाचार पत्र के सम्पादक गंगाधर भट्टाचार्य थे! इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना जागृत की !
30 मई 1826 को कलकत्ता से पण्डित जुगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में निकलने वाले ‘‘उदन्त मार्तण्ड’’ को हिन्दी का पहला समाचार पत्र माना जाता है ! ‘‘तत्वबोधिनी’’ पत्रिका साप्ताहिक थी और इसका प्रकाशन बरेली से होता था! ‘‘मालवा’’ साप्ताहिक मालवा से एवं ‘‘वृतांत’’ जम्मू से तथा ‘‘ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका’’ लाहौर से प्रकाशित होते थे, हालाँकि इनमें प्रयुक्त भाषा (हिन्दी) बहुत ही साधारण किस्म की, टूटी फूटी हिन्दी हुआ करती थी !
भारतेन्दु युग पूर्व की पत्र-पत्रिकाओं में 1845 ई. में राजा शिव प्रसाद सिंह ‘‘सितारे हिन्द’’ ने ‘‘बनारस अखबार’’ निकाला, जिसकी भाषा उर्दू-हिन्दी मिश्रित थी ! हिंदी प्रदेश से निकलने वाला यह पहला पत्र था! इसकी लिपि नागरी थी!
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के विकास में भारतेन्दु युग का महत्वपूर्ण स्थान है! सन 1868 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘‘कवि वचन सुधा’’ का प्रवर्तन किया और यहीं से हिन्दी पत्रिकाओं के प्रकाशन में तीव्रता आई! ‘‘कवि वचन सुधा’’ में पुराने कवियों की रचनाएं छपा करती थीं! भारतेन्दु ने 1873 ई. में ‘‘हरिश्चंद्र मैगजीन’’ मासिक पत्रिका निकाली जो 8 अंक निकलने के बाद ‘‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’’ हो गई ! हिंदी गद्य का परिष्कृत रूप पहले पहल इसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ ! 1873 ई. में भारतेन्दु ने स्त्री शिक्षा के सम्बंध में ‘‘बालबोधिनी’’ नामक पत्रिका निकाली ! बदरी नारायण चौधरी के संपादन में मिर्जापुर से निकलने वाली पत्रिका ‘‘आनन्द कादम्बिनी’’ में ही पुस्तकों की आलोचना सर्वप्रथम छपी ! इसके अतिरिक्त अन्य पत्र-पत्रिकायें भी प्रकाशित होती रहीं !
अब इसके बाद अगर हम महावीर प्रसाद द्विवेदी के काल को देखते हैं तो यह समय हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के लिये स्वर्ण-काल कहा जा सकता है! नागरी प्रचारिणी पत्रिका का संपादन गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, मुंशी देवी प्रसाद, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तथा श्यामसुंदर दास ने मिलकर 1896 ई. में निकाला था, रामचन्द्र शुक्ल और केशव प्रसाद मिश्र भी संपादक रहे !
‘‘सरस्वती’’ का पहला अंक बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर और बाबू श्यामसुंदर दास ने मिलकर निकाला था! दूसरे वर्ष का सम्पादन श्यामसुंदर दास ने अकेले किया था! 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी करने लगे और पत्रिका काशी से इलाहाबाद आ गई ! रवि वर्मा पौराणिक चित्र तैयार करते और द्विवेदी जी कवियों से उनपर कवितायें लिखवाया करते थे !
‘‘सरस्वती’’ के बाद सर्वाधिक ख्याति बनारसीदास चतुर्वेदी की ‘‘विशाल भारत’’ पत्र को प्राप्त हुई ! इसमें ‘‘कला अंक’’ और ‘‘राष्ट्रीय अंक’’ जैसे महत्वपूर्ण अंक निकाले! अज्ञेय और मोहनसिंह सेंगर, श्रीराम शर्मा भी इसके सम्पादकों में रह चुके हैं! ‘‘विशाल भारत’’ के द्वारा ही चतुर्वेदी जी ने ‘‘घासलेटी साहित्य’’ के विरुद्ध आंदोलन खड़ा किया! कस्मै देवाय ? के द्वारा भी उन्होंने साहित्यिकों के सामने यह प्रश्न रखा कि वे किसके लिए लिखें ! चतुर्वेदी जी ने टीकमगढ़ से ‘‘मधुकर’’ नामक पत्र निकाल कर बुंदेलखंड की संस्कृति और उसके लोक साहित्य से हिन्दी जगत को परिचित कराया !
‘‘सरस्वती’’ और ‘‘विशाल भारत’’ के बाद ‘‘हंस’’ पत्रिका का महत्वपूर्ण स्थान है! 1933 ई. में इसने अपना ‘‘काशी विशेषांक’’ प्रकाशित किया ! 1936 ई. के बाद जैनेंद्र कुमार और शिवरानी देवी ने हंस का संपादन किया ! हिंदी साहित्य में रिपोर्ताज लिखने की प्रथा भी इसी पत्र के द्वारा ही पड़ी ! ‘‘मर्यादा’’ पत्रिका के सम्पादन कृष्णकांत मालवीय,
सम्पूर्णानन्द और प्रेमचन्द जुड़े रहे ! ‘‘प्रभा’’ पत्रिका का सम्पादन कालूराम ने 1913 में खंडवा से किया, उसे बाद में
बालकृष्ण ‘‘नवीन’’ और माखनलाल चतुर्वेदी ने कानपुर से निकाला! ‘‘विश्ववाणी’’ के संस्थापक सुंदरलाल थे! सम्पादन इलाचन्द्र जोशी ने किया ! इसका ‘‘बौद्ध संस्कृति अंक’’ महादेवी के सम्पादकत्व में निकला था, बाद में ‘‘सोवियत संस्कृति अंक’’, ‘‘चीन अंक‘‘ ‘‘अंतरराष्ट्रीय अंक’’ जैसे कई महत्वपूर्ण अंक निकले !
इसी क्रम में आगे छायावादी युग में महिला समस्या और समाज सुधार को लेकर निकलने वाले पत्रों में सर्वाधिक ख्याति ‘‘चाँद’’ ने प्राप्त की! इसने ‘‘फाँसी अंक’’ और ‘‘मारवाड़ी अंक’’ निकाल कर समाज में हलचल मचा दी! जिसका सम्पादन महादेवी वर्मा ने किया था! दुलारे लाल भार्गव ने जिस ‘‘माधुरी’’ को लखनऊ से निकाला था उसे बाद में रुपनारायण पांडेय, कृष्ण बिहारी मिश्र और प्रेमचंद ने भी अपने सम्पादकत्व में निकाला ! 1923 ई. में ‘‘मतवाला’’ पत्रिका के सम्पादन से महादेव प्रसाद सेठ के बाद शिवपूजन सहाय और निराला भी जुड़े !
छायावादोत्तर युग की पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुख ‘‘विप्लव’’ भी है जो 1938 ई. में लखनऊ से यशपाल के सम्पादन में निकली, इसका उर्दू संस्करण ‘‘बागी’’ नाम से निकला ! विप्लव का फरवरी 1939 के अंक ‘‘चंद्रशेखर आजाद अंक’’ था , जो क्रांति की गाथाओं से भरा था ! छायावादोत्तर पत्रिकाओं में ‘‘सारिका’’ पत्रिका भी काफी चर्चित रही, जिसके संपादकों में रतनलाल, कमलेश्वर तथा कन्हैयालाल नन्दन प्रमुख हैं, यह पत्रिका दिल्ली और मुंबई से निकलती थी! इसी अवधि में ‘‘हंस’’ पत्रिका भी राजेन्द्र यादव के सम्पादन में पुनः चालू हुई ! इस अवधि में ‘‘साहित्य सन्देश’’, ‘‘आजकल’’, ‘‘धर्मयुग’’ ‘‘नई कविता’’, ‘‘निकष’’, ‘‘दिनमान’’, ‘‘रविवार’’ ‘‘हिंदुस्तान’’, ‘‘कथादेश’’ आदि उच्च स्तरीय पत्रिकाओं का लम्बे समय तक प्रकाशन होता रहा !
समय अपनी चाल बदलता रहा, लोग बढ़ते गये मगर पत्रिकायें घटती गईं ! ‘‘धर्मयुग’’ में धर्मवीर भारती थे तो ‘‘सारिका’’ में कन्हैयालाल नन्दन जैसे उच्च कोटि के मनीषी, साहित्यकार, सम्पादन का कार्य कर रहे थे, वो भी पूरी निष्ठा और लगन के साथ-इसका एक वाकया मेरे साथ जुड़ा है, उन दिनों जब दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का संग्रह ‘‘साये में धूप’’ आ चुका था, ग़ज़ल लिखने वाले ज़्यादा थे, कहने वाले न के बराबर, अधिकतर हिन्दी कवियों को उर्दू अरुज़ और अर्कान की जानकारी नहीं थी, सभी हिंदी मात्रा के हिसाब से लिखते जाते थे, ज्ञान था भी तो अधूरा! फिर भी मैं ग़ज़लें कह रहा था ! मुझे याद है मैंने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल ‘‘सारिका’’ में भेजी, तब श्री नन्दन जी उसके सम्पादक थे ! तब सारिका जैसी पत्रिका में छपना एक खास बात थी, मुझे नन्दन जी का पत्र आया (जिसे मैंने आज भी सहेजकर रखा है) उन्होंने ग़ज़ल स्वीकृत कर ली थी, लेकिन उन्होंने एक सवाल भी रखा था- उसी ग़ज़ल के दो शे’रों पर मेरा ध्यान आकर्षित किया था, कहा था- ‘‘क्या इन अशआरों पर इसी बात को कुछ और बेहतर ढँग से कह सकते हो? और मैंने वो कर दिखाया जो वो चाहते थे, मुझे भी लगा ये बात मुझे पहले क्यूँ नहीं सूझी! ग़ज़ल छपी और बहुत बधाईंयाँ मिली।
उपरोक्त सन्दर्भ इसलिए भी कि क्या आज के दौर में कोई ऐसा सम्पादक है जो इन झमेलों में पड़ेगा, इतनी गहराई से रचनाओं को पढ़कर निर्णय लेगा, यही बात धर्मवीर जी के सम्बंध में लागू होती है, वे भी बड़ी पैनी नजरों से सभी रचनाओं पर ध्यान केन्द्रत करते थे, उन्होंने कभी ग़ज़ल शीर्षक में नुक्ता नहीं लगाया सिर्फ ‘‘गजल’’ लिखा! यही स्थितियाँ लगभग ‘‘रविवार’’, ‘‘आजकल’’ ‘‘हिंदुस्तान’’ पत्रिकाओं की रही और उन्होंने श्रेष्ठतम साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया !
70 के दशक से 90 के दशक तक जो समाचार पत्र प्रकाशित होते थे ! उनका रविवारीय अंक साहित्यिक ही रहता था, अक्सर दो पन्नों का कभी ज़्यादा भी, सभी को बेसब्री से उनका इंतिजार रहता था, इस मामले में ‘‘दैनिक जागरण’’ के रविवारीय परिशिष्ट का कोई जवाब नहीं था, उन दिनों 1976 से 1986 तक (सम्भवतः) उसके साहित्यिक सम्पादक विजयकिशोर ‘‘मानव’’ थे, एक श्रेष्ठ गीतकार, साहित्यकार, वे साहित्य को भलीभांति समझने वाले थे, उन दिनों मैं हर विधा में कुछ न कुछ लिख ही रहा था, मैं उन दिनों जितना अधिक जागरण में प्रकाशित हुआ, सम्भवतः मेरे समकालीन कवियों में कोई नहीं, अन्य अखबारों में भी स्थान मिला, एक ही काम था लिखना और पोस्ट करना, ये छपास कई वर्षों तक कायम रही! फिर जागरण में स्वयं प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन ही खुद अपनी ही कविताएँ छापने लगे और मानव जी भी ‘‘कादम्बिनी’’ में दिल्ली आ गये! सही माइनों में जागरण में कोई साहित्य समझने वाला साहित्य सम्पादक बचा ही नहीं! फिर जो होता है रविवारीय परिशिष्ट की स्थापित गरिमा लुप्तप्राय हो गई !
आज के समय ऊँगलियों पर गिनने भर को साहित्य की मासिक पत्रिकायें भी प्रकाशित नहीं हो रही हैं, कुछ त्रैमासिक है, कुछ अनियमित तो कुछ अर्धवार्षिक, अभी ‘‘हंस’’ और ‘‘पाखी’’ ने अपना क्रम जारी रखा है, कुछ और भी हो सकती हैं, लेकिन जो रेलवे स्टेशन पर भी देखने को न मिले, फिर कहाँ ढूँढिये! कुछ मासिक रेगुलर ‘‘ई-पत्रिकाओं’’ ने साहित्यिक और सामाजिक मोर्चा संभाल रखा है, वे भले ही विदेश में बैठे हों, लेकिन वे भारतीय मूल के है, एक दो पत्रिकाओं को जानता हूँ इसलिए कि इनमें मेरी रचनाएं छपी हैं एक तो कथा यू.के. जो पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित है और एक ‘‘पुरवाई’’ जो यू.के. लन्दन से प्रकाशित है जिसके प्रधान संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा जी हैं, उन्होनें भी अपना एक लेख इस ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका के प्रवेशांक हेतु भेजने की कृपा की है!
मुझे एक लम्बा समय साहित्य और साहित्यकारों के बीच बिताने का अवसर मिला है, बलवीर सिंह ‘‘रंग’’, गोपाल दास ‘‘नीरज’’ जैसे अनेक नामचीन लोग रहे हैं जो कालजयी हो गये, जिनका स्नेह, आशीष, आत्मीयता और सानिध्य भी लंबे अरसे तक रहा, इसी श्रृंखला से जुड़े न जानें कितने बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, साहित्यकार भी रहे हैं, जिनकी फेहरिश्त बहुत बड़ी है, जिनसे बहुत कुछ सीखने को मिला, लेकिन अब मेरे काल के व मुझसे पूर्व के लोग जानते हैं, आज भी उनके गीतों की पंक्तियां मन को अचरज प्रदान करती हैं, कहीं-कहीं तो उनकी लेखनी के आगे अपनी लेखनी बौनी लगने लगती है, ख्याति पाकर ऊंचाइयों पर खड़े लोग बौने दिखाई देते हैं, वे आज जीवित हैं या नहीं – इससे भी फर्क नहीं पड़ता, वे देश-प्रदेश स्तर पर अचर्चित ही रह गये, उनकी रचनायें पत्र-पत्रिकाओं में स्थान नहीं पा सकीं, या यूँ कहिए उन्होंने ज़्यादा महत्व नहीं दिया, कुछ नाम तो ऐसे भी हैं, जिनका कोई संकलन प्रकाशित नहीं हुआ, और प्रकाशित हुआ भी तो अचर्चित ही रह गया, क्योंकि उसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हो सका!
लेकिन प्रिय साथियों अभी भी वक़्त निकला नहीं है,इस पृथ्वी के सभी देहधारी जीवों, वृक्षों, पर्वत नदियों को मृत्यु प्राप्त हो सकती है लेकिन साहित्य तो कालजयी होता है, वो कभी नहीं मरता, यह मनुष्य की चेतन आत्मा है अन्यथा यह वेद पुराण, राम और कृष्ण कथा की उम्र इतनी लंबी न होती ! हम सब प्रयास करें तो गुदड़ी से ‘‘लाल’’ ढूँढकर सबके सामने रख सकते हैं, आपका सहयोग, आपका मशविरा, आलोचना, समालोचना इसे और ऊँचाइयों पर अवश्य ही ले जाएगा !
बहुत से ऐसे कवि, लेखक हैं जो अपनी किताबें छपवाने में असमर्थ हैं, वे भी अचर्चित न रह जायें, इसलिए आपका यह ‘‘शब्दकार प्रकाशन’’ और ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका मिलकर अभी प्रथम वर्ष में पांच ऐसे लोगों की किताबें निःशुल्क छापेगी !
आप अपनी रचनायें गीत, ग़ज़ल, दोहा, लघुकथा, कहानी, सामयिक लेख, आपकी सोच, आदि आपको जिस विधा में भी रुचि है, शब्दकार पत्रिका को भेजते रहें, हम भरपूर स्वागत करेंगे, आपकी रचनाओं के आधार पर ही आप अपना स्थान सुरक्षित कर पाने में सक्षम होंगे! पत्रिका में रचनायें भेजने हेतु नियम व शर्तों का अलग से विवरण ‘‘लेखकों से निवेदन’’ के माध्यम से किया गया है, आप प्रत्येक रचना पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं, जो अगले अंक में अवश्य प्रकाशित होंगी!
अभी भी बहुत सारे कॉलम रह गए हैं, ये शुरुआत है, बहुत से काम एक साथ थे, वेबसाइट बनवाना, पाठकों तक सुविधानुसार पहुँचाना, सभी लोग आसानी से अपने मोबाइल पर ही पढ़ सकें, पेज खोल सकें ! कुल मिलाकर असुविधा न हो इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया है !
अब अगले अंक के प्रकाशन तक के लिए आपसे विदा लेता हूँ , पत्रिका के विषय में अपने अन्य सुझाव व समीक्षा अवश्य भेजिएगा ! जो अगले अंक में प्रकाशित होंगी ! आशा है हमारा यह प्रयास आपको रुचिकर लगेगा ! शीघ्र ही इसकी ‘‘मुद्रित’’ पत्रिका भी आप तक पहुँचेगी ! आप सभी को ‘‘शब्दकार प्रकाशन’’ व ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका की ओर से हार्दिक शुभकामनायें! चलते-चलते अपनी ग़ज़ल का इक शे’र आप सभी को सौंपता हूँ !
इन अंधेरे रास्तों पर कुछ दिये रखता तो चल,
इक दिया दिल में तेरे जलता हुआ मिल जाएगा !
आपका अपना-
पीयूष अवस्थी
मुख्य सम्पादक