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पत्र-पत्रिका: यात्रा कथा

सम्पादकीय

पत्र-पत्रिका: यात्रा कथा

पीयूष अवस्थी

प्रिय दोस्तों ! मेरे अजीजों !

            आपके सामने हाजिर हूँ एक नई ‘‘ई-पत्रिका’’ ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका को लेकर! आपके प्यार, स्नेह और आत्मीयता का हमेशा से कायल रहा हूँ ! विश्वास है कि इस पत्रिका के माध्यम से, स्नेह, आत्मीयता, प्रसंशा व प्रतिक्रिया, सभी सन्दर्भों में, आपसे बराबर जुड़े रहने का सौभाग्य प्राप्त होता रहेगा ! इसका सम्पादकीय दायित्व ग्रहण करने के पूर्व मुझे यह कार्य सहज ही लगा था, लेकिन सच कहूँ, सभी रचनाओं को पढ़ना, उनमें प्रकाशन योग्य साहित्य को चयनित करना, साधारणतया कोई सरल कार्य नहीं है ! फिर भी मुझे यह कार्य करते हुए असीम सुखानुभूति हो रही है !

            इस पत्रिका को आप तक पहुँचाने की कहानी भी रोचक है, अपनी किताबों के प्रकाशन के लिए दिल्ली में डेरा जमाये देश और विदेश से सम्बंधित तमाम प्रकाशकों से सम्पर्क करता रहा, तमाम मनलुभावली स्कीमों, प्रलोभनों से भरे वायदों, और वसूला जाने वाला मूल्य, समय का झूठा वायदा इन सबसे रूबरू होता गया, कई जगह तो एडवांस भी वापस नहीं हुआ, एक साल तो प्रतीक्षा में ही निकल गया! हालाँकि इससे एक फायदा जरूर हुआ, प्रकाशन से जुड़ी तमाम जानकारियाँ जहन में पैबस्त हो गईं, फिर इस सन्दर्भ में व्यापक वैचारिक मन्थन किया और पाया कि मेरे जैसे हजारों कवि, लेखक भी इसी त्रासदी से गुजर रहे होंगे, तो क्यूँ न अपना प्रकाशन ही स्थापित कर लिया जाये, जिससे स्वयं के साथ अन्य लोगों को भी कम समय, कम दाम और उच्च गुणवत्ता के साथ अपनी किताबें प्रकाशित कराने का सुअवसर प्राप्त हो सके, सहूलियत हो!

            बस उसी के साथ ‘‘शब्दकार प्रकाशन’’ और ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका की पंजीयन, मार्क रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई, इसका परिणाम भी बेहद सुखद रहा, शब्दकार प्रकाशन में कविता, गीत, कहानी आदि की किताबें हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, रूसी व अन्य भाषाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं !

            शब्दकार प्रकाशन की बढ़ती लोकप्रियता से उत्साहवर्धन भी हुआ और यह ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका अभी ‘‘ई-पत्रिका’’ के रूप में आपके सामने प्रस्तुत है, निश्चित ही कुछ माह बाद आप इसे ‘‘ई-पत्रिका’’ के साथ-साथ मुद्रित पत्रिका के रूप में भी पायेंगे ! आपके प्यार, स्नेह, आत्मीयता और सहयोग का आकांक्षी हूँ !

            पत्र-पत्रिकाओं का एक लंबा इतिहास है! कुछ समाचार पत्र भी रविवार को साप्ताहिकी अंक भी निकलते थे,जिनका सभी कवियों लेखकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था, इस मामले में ‘‘दैनिक जागरण’’ के साप्ताहिक परिशिष्ट की अलग पहचान थी, बाकी ‘‘अमर उजाला’’ ‘‘दैनिक आज’’, ‘‘दैनिक भाष्कर’’ आदि-आदि !  

            आइये चलते हैं पत्र-पत्रिकाओं की पिछली पीढ़ी की ओर- जहाँ तक समझा जाता है हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई, जिसमें सबसे प्रथम 1780 ई. में प्रकाशित ‘‘बंगाल गजट’’ है! बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है! इस समाचार पत्र के सम्पादक गंगाधर भट्टाचार्य थे! इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना जागृत की !    

            30 मई 1826 को कलकत्ता से पण्डित जुगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में निकलने वाले ‘‘उदन्त मार्तण्ड’’ को हिन्दी का पहला समाचार पत्र माना जाता है ! ‘‘तत्वबोधिनी’’  पत्रिका साप्ताहिक थी और इसका प्रकाशन बरेली से होता था! ‘‘मालवा’’ साप्ताहिक मालवा से एवं ‘‘वृतांत’’ जम्मू से तथा ‘‘ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका’’ लाहौर से प्रकाशित होते थे, हालाँकि इनमें प्रयुक्त भाषा (हिन्दी) बहुत ही साधारण किस्म की, टूटी फूटी हिन्दी हुआ करती थी !

            भारतेन्दु युग पूर्व की पत्र-पत्रिकाओं में 1845 ई. में राजा शिव प्रसाद सिंह ‘‘सितारे हिन्द’’ ने ‘‘बनारस अखबार’’ निकाला, जिसकी भाषा उर्दू-हिन्दी मिश्रित थी ! हिंदी प्रदेश से निकलने वाला यह पहला पत्र था! इसकी लिपि नागरी थी!

            हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के विकास में भारतेन्दु युग का महत्वपूर्ण स्थान है! सन 1868 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘‘कवि वचन सुधा’’ का प्रवर्तन किया और यहीं से हिन्दी पत्रिकाओं के प्रकाशन में तीव्रता आई! ‘‘कवि वचन सुधा’’ में पुराने कवियों की रचनाएं छपा करती थीं! भारतेन्दु ने 1873 ई. में ‘‘हरिश्चंद्र मैगजीन’’ मासिक पत्रिका निकाली जो 8 अंक निकलने के बाद ‘‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’’ हो गई ! हिंदी गद्य का परिष्कृत रूप पहले पहल इसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ ! 1873 ई. में भारतेन्दु ने स्त्री शिक्षा के सम्बंध में ‘‘बालबोधिनी’’ नामक पत्रिका निकाली ! बदरी नारायण चौधरी के संपादन में मिर्जापुर से निकलने वाली पत्रिका ‘‘आनन्द कादम्बिनी’’ में ही पुस्तकों की आलोचना सर्वप्रथम छपी ! इसके अतिरिक्त अन्य पत्र-पत्रिकायें भी प्रकाशित होती रहीं !

            अब इसके बाद अगर हम महावीर प्रसाद द्विवेदी के काल को देखते हैं तो यह समय हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के लिये स्वर्ण-काल कहा जा सकता है! नागरी प्रचारिणी पत्रिका का संपादन गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, मुंशी देवी प्रसाद, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तथा श्यामसुंदर दास ने मिलकर 1896 ई. में निकाला था, रामचन्द्र शुक्ल और केशव प्रसाद मिश्र भी संपादक रहे !

            ‘‘सरस्वती’’ का पहला अंक बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर और बाबू श्यामसुंदर दास ने मिलकर निकाला था! दूसरे वर्ष का सम्पादन श्यामसुंदर दास ने अकेले किया था! 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी करने लगे और पत्रिका काशी से इलाहाबाद आ गई ! रवि वर्मा पौराणिक चित्र तैयार करते और द्विवेदी जी कवियों से उनपर कवितायें लिखवाया करते थे !

            ‘‘सरस्वती’’ के बाद सर्वाधिक ख्याति बनारसीदास चतुर्वेदी की ‘‘विशाल भारत’’ पत्र को प्राप्त हुई ! इसमें ‘‘कला अंक’’ और ‘‘राष्ट्रीय अंक’’ जैसे महत्वपूर्ण अंक निकाले! अज्ञेय और मोहनसिंह सेंगर, श्रीराम शर्मा भी इसके सम्पादकों में रह चुके हैं! ‘‘विशाल भारत’’ के द्वारा ही चतुर्वेदी जी ने ‘‘घासलेटी साहित्य’’ के विरुद्ध आंदोलन खड़ा किया! कस्मै देवाय ? के द्वारा भी उन्होंने साहित्यिकों के सामने यह प्रश्न रखा कि वे किसके लिए लिखें ! चतुर्वेदी जी ने टीकमगढ़ से ‘‘मधुकर’’ नामक पत्र निकाल कर बुंदेलखंड की संस्कृति और उसके लोक साहित्य से हिन्दी जगत को परिचित कराया !

            ‘‘सरस्वती’’ और ‘‘विशाल भारत’’ के बाद ‘‘हंस’’ पत्रिका का महत्वपूर्ण स्थान है! 1933 ई. में इसने अपना ‘‘काशी विशेषांक’’ प्रकाशित किया ! 1936 ई. के बाद जैनेंद्र कुमार और शिवरानी देवी ने हंस का संपादन किया ! हिंदी साहित्य में रिपोर्ताज लिखने की प्रथा भी इसी पत्र के द्वारा ही पड़ी ! ‘‘मर्यादा’’ पत्रिका के सम्पादन कृष्णकांत मालवीय,

सम्पूर्णानन्द और प्रेमचन्द जुड़े रहे ! ‘‘प्रभा’’ पत्रिका का सम्पादन कालूराम ने 1913 में खंडवा से किया, उसे बाद में

बालकृष्ण ‘‘नवीन’’ और माखनलाल चतुर्वेदी ने कानपुर से निकाला! ‘‘विश्ववाणी’’ के संस्थापक सुंदरलाल थे! सम्पादन इलाचन्द्र जोशी ने किया ! इसका ‘‘बौद्ध संस्कृति अंक’’ महादेवी के सम्पादकत्व में निकला था, बाद में ‘‘सोवियत संस्कृति अंक’’, ‘‘चीन अंक‘‘ ‘‘अंतरराष्ट्रीय अंक’’ जैसे कई महत्वपूर्ण अंक निकले !

            इसी क्रम में आगे छायावादी युग में महिला समस्या और समाज सुधार को लेकर निकलने वाले पत्रों में सर्वाधिक ख्याति ‘‘चाँद’’ ने प्राप्त की! इसने ‘‘फाँसी अंक’’ और ‘‘मारवाड़ी अंक’’ निकाल कर समाज में हलचल मचा दी! जिसका सम्पादन महादेवी वर्मा ने किया था! दुलारे लाल भार्गव ने जिस ‘‘माधुरी’’ को लखनऊ से निकाला था उसे बाद में रुपनारायण पांडेय, कृष्ण बिहारी मिश्र और प्रेमचंद ने भी अपने सम्पादकत्व में निकाला ! 1923 ई. में ‘‘मतवाला’’ पत्रिका के सम्पादन से महादेव प्रसाद सेठ के बाद शिवपूजन सहाय और निराला भी जुड़े !

            छायावादोत्तर युग की पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुख ‘‘विप्लव’’ भी है जो 1938 ई. में लखनऊ से यशपाल के सम्पादन में निकली, इसका उर्दू संस्करण ‘‘बागी’’ नाम से निकला ! विप्लव का फरवरी 1939 के अंक ‘‘चंद्रशेखर आजाद अंक’’ था , जो क्रांति की गाथाओं से भरा था ! छायावादोत्तर पत्रिकाओं में ‘‘सारिका’’ पत्रिका भी काफी चर्चित रही, जिसके संपादकों में रतनलाल, कमलेश्वर तथा कन्हैयालाल नन्दन प्रमुख हैं, यह पत्रिका दिल्ली और मुंबई से निकलती थी! इसी अवधि में ‘‘हंस’’ पत्रिका भी राजेन्द्र यादव के सम्पादन में पुनः चालू हुई ! इस अवधि में ‘‘साहित्य सन्देश’’, ‘‘आजकल’’, ‘‘धर्मयुग’’ ‘‘नई कविता’’, ‘‘निकष’’, ‘‘दिनमान’’, ‘‘रविवार’’ ‘‘हिंदुस्तान’’, ‘‘कथादेश’’ आदि उच्च स्तरीय पत्रिकाओं का लम्बे समय तक प्रकाशन होता रहा !

            समय अपनी चाल बदलता रहा, लोग बढ़ते गये मगर पत्रिकायें घटती गईं ! ‘‘धर्मयुग’’ में धर्मवीर भारती थे तो ‘‘सारिका’’ में कन्हैयालाल नन्दन जैसे उच्च कोटि के मनीषी, साहित्यकार, सम्पादन का कार्य कर रहे थे, वो भी पूरी निष्ठा और लगन के साथ-इसका एक वाकया मेरे साथ जुड़ा है, उन दिनों जब दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का संग्रह ‘‘साये में धूप’’ आ चुका था, ग़ज़ल लिखने वाले ज़्यादा थे, कहने वाले न के बराबर, अधिकतर हिन्दी कवियों को उर्दू अरुज़ और अर्कान की जानकारी नहीं थी, सभी हिंदी मात्रा के हिसाब से लिखते जाते थे, ज्ञान था भी तो अधूरा! फिर भी मैं ग़ज़लें कह रहा था ! मुझे याद है मैंने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल ‘‘सारिका’’ में भेजी, तब श्री नन्दन जी उसके सम्पादक थे ! तब सारिका जैसी पत्रिका में छपना एक खास बात थी, मुझे नन्दन जी का पत्र आया (जिसे मैंने आज भी सहेजकर रखा है) उन्होंने ग़ज़ल स्वीकृत कर ली थी, लेकिन उन्होंने एक सवाल भी रखा था- उसी ग़ज़ल के दो शे’रों पर मेरा ध्यान आकर्षित किया था, कहा था- ‘‘क्या इन अशआरों पर इसी बात को कुछ और बेहतर ढँग से कह सकते हो? और मैंने वो कर दिखाया जो वो चाहते थे, मुझे भी लगा ये बात मुझे पहले क्यूँ नहीं सूझी! ग़ज़ल छपी और बहुत बधाईंयाँ मिली।

            उपरोक्त सन्दर्भ इसलिए भी कि क्या आज के दौर में कोई ऐसा सम्पादक है जो इन झमेलों में पड़ेगा, इतनी गहराई से रचनाओं को पढ़कर निर्णय लेगा, यही बात धर्मवीर जी के सम्बंध में लागू होती है, वे भी बड़ी पैनी नजरों से सभी रचनाओं पर ध्यान केन्द्रत करते थे, उन्होंने कभी ग़ज़ल शीर्षक में नुक्ता नहीं लगाया सिर्फ ‘‘गजल’’ लिखा! यही स्थितियाँ लगभग ‘‘रविवार’’, ‘‘आजकल’’ ‘‘हिंदुस्तान’’ पत्रिकाओं की रही और उन्होंने श्रेष्ठतम साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया !

            70 के दशक से 90 के दशक तक जो समाचार पत्र प्रकाशित होते थे ! उनका रविवारीय अंक साहित्यिक ही रहता था, अक्सर दो पन्नों का कभी ज़्यादा भी, सभी को बेसब्री से उनका इंतिजार रहता था, इस मामले में ‘‘दैनिक जागरण’’ के रविवारीय परिशिष्ट का कोई जवाब नहीं था, उन दिनों 1976 से 1986 तक (सम्भवतः) उसके साहित्यिक सम्पादक विजयकिशोर ‘‘मानव’’ थे, एक श्रेष्ठ गीतकार, साहित्यकार, वे साहित्य को भलीभांति समझने वाले थे, उन दिनों मैं हर विधा में कुछ न कुछ लिख ही रहा था, मैं उन दिनों जितना अधिक जागरण में प्रकाशित हुआ, सम्भवतः मेरे समकालीन कवियों में कोई नहीं, अन्य अखबारों में भी स्थान मिला, एक ही काम था लिखना और पोस्ट करना, ये छपास कई वर्षों तक कायम रही! फिर जागरण में स्वयं प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन ही खुद अपनी ही कविताएँ छापने लगे और मानव जी भी ‘‘कादम्बिनी’’ में दिल्ली आ गये! सही माइनों में जागरण में कोई साहित्य समझने वाला साहित्य सम्पादक बचा ही नहीं! फिर जो होता है रविवारीय परिशिष्ट की स्थापित गरिमा लुप्तप्राय हो गई !

            आज के समय ऊँगलियों पर गिनने भर को साहित्य की मासिक पत्रिकायें भी प्रकाशित नहीं हो रही हैं, कुछ त्रैमासिक है, कुछ अनियमित तो कुछ अर्धवार्षिक, अभी ‘‘हंस’’ और ‘‘पाखी’’ ने अपना क्रम जारी रखा है, कुछ और भी हो सकती हैं, लेकिन जो रेलवे स्टेशन पर भी देखने को न मिले, फिर कहाँ ढूँढिये! कुछ मासिक रेगुलर ‘‘ई-पत्रिकाओं’’ ने साहित्यिक और सामाजिक मोर्चा संभाल रखा है, वे भले ही विदेश में बैठे हों, लेकिन वे भारतीय मूल के है, एक दो पत्रिकाओं को जानता हूँ इसलिए कि इनमें मेरी रचनाएं छपी हैं एक तो कथा यू.के. जो पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित है और एक ‘‘पुरवाई’’ जो यू.के. लन्दन से प्रकाशित है जिसके प्रधान संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा जी हैं, उन्होनें भी अपना एक लेख इस ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका के प्रवेशांक हेतु भेजने की कृपा की है!

            मुझे एक लम्बा समय साहित्य और साहित्यकारों के बीच बिताने का अवसर मिला है, बलवीर सिंह ‘‘रंग’’, गोपाल दास ‘‘नीरज’’ जैसे अनेक नामचीन लोग रहे हैं जो कालजयी हो गये, जिनका स्नेह, आशीष, आत्मीयता और सानिध्य भी लंबे अरसे तक रहा, इसी श्रृंखला से जुड़े न जानें कितने बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, साहित्यकार भी रहे हैं, जिनकी फेहरिश्त बहुत बड़ी है, जिनसे बहुत कुछ सीखने को मिला, लेकिन अब मेरे काल के व मुझसे पूर्व के लोग जानते हैं, आज भी उनके गीतों की पंक्तियां मन को अचरज प्रदान करती हैं, कहीं-कहीं तो उनकी लेखनी के आगे अपनी लेखनी बौनी लगने लगती है, ख्याति पाकर ऊंचाइयों पर खड़े लोग बौने दिखाई देते हैं, वे आज जीवित हैं या नहीं – इससे भी फर्क नहीं पड़ता, वे देश-प्रदेश स्तर पर अचर्चित ही रह गये, उनकी रचनायें पत्र-पत्रिकाओं में स्थान नहीं पा सकीं, या यूँ कहिए उन्होंने ज़्यादा महत्व नहीं दिया, कुछ नाम तो ऐसे भी हैं, जिनका कोई संकलन प्रकाशित नहीं हुआ, और प्रकाशित हुआ भी तो अचर्चित ही रह गया, क्योंकि उसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हो सका!

            लेकिन प्रिय साथियों अभी भी वक़्त निकला नहीं है,इस पृथ्वी के सभी देहधारी जीवों, वृक्षों, पर्वत नदियों को मृत्यु प्राप्त हो सकती है लेकिन साहित्य तो कालजयी होता है, वो कभी नहीं मरता, यह मनुष्य की चेतन आत्मा है अन्यथा यह वेद पुराण, राम और कृष्ण कथा की उम्र इतनी लंबी न होती ! हम सब प्रयास करें तो गुदड़ी से ‘‘लाल’’ ढूँढकर सबके सामने रख सकते हैं, आपका सहयोग, आपका मशविरा, आलोचना, समालोचना इसे और ऊँचाइयों पर अवश्य ही ले जाएगा !

            बहुत से ऐसे कवि, लेखक हैं जो अपनी किताबें छपवाने में असमर्थ हैं, वे भी अचर्चित न रह जायें, इसलिए आपका यह ‘‘शब्दकार प्रकाशन’’ और ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका मिलकर अभी प्रथम वर्ष में पांच ऐसे लोगों की किताबें निःशुल्क छापेगी !

            आप अपनी रचनायें गीत, ग़ज़ल, दोहा, लघुकथा, कहानी, सामयिक लेख, आपकी सोच, आदि आपको जिस विधा में भी रुचि है, शब्दकार पत्रिका को भेजते रहें, हम भरपूर स्वागत करेंगे, आपकी रचनाओं के आधार पर ही आप अपना स्थान सुरक्षित कर पाने में सक्षम होंगे! पत्रिका में रचनायें भेजने हेतु नियम व शर्तों का अलग से विवरण ‘‘लेखकों से निवेदन’’ के माध्यम से किया गया है, आप प्रत्येक रचना पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं, जो अगले अंक में अवश्य प्रकाशित होंगी!

            अभी भी बहुत सारे कॉलम रह गए हैं, ये शुरुआत है, बहुत से काम एक साथ थे, वेबसाइट बनवाना, पाठकों तक सुविधानुसार पहुँचाना, सभी लोग आसानी से अपने मोबाइल पर ही पढ़ सकें, पेज खोल सकें ! कुल मिलाकर असुविधा न हो इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया है !

            अब अगले अंक के प्रकाशन तक के लिए आपसे विदा लेता हूँ , पत्रिका के विषय में अपने अन्य सुझाव व समीक्षा अवश्य भेजिएगा ! जो अगले अंक में प्रकाशित होंगी ! आशा है हमारा यह प्रयास आपको रुचिकर लगेगा ! शीघ्र ही इसकी ‘‘मुद्रित’’ पत्रिका भी आप तक पहुँचेगी ! आप सभी को ‘‘शब्दकार प्रकाशन’’ व ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका की ओर से हार्दिक शुभकामनायें! चलते-चलते अपनी ग़ज़ल का इक शे’र आप सभी को सौंपता हूँ !

इन अंधेरे रास्तों पर कुछ दिये रखता तो चल,

इक दिया दिल में तेरे जलता हुआ मिल जाएगा !

आपका अपना-

पीयूष अवस्थी

मुख्य सम्पादक

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‘शब्दकार’ पत्रिका – मुख्य सम्पादक परिचय

‘शब्दकार’ पत्रिका - मुख्य सम्पादक परिचय

पीयूष अवस्थी, मुख्य सम्पादक

‘‘पीयूष अवस्थी ’’
आत्मज- स्व. प्रेम नारायण अवस्थी
जन्म तिथि – 11-01-1957
शिक्षा – एम. ए. (अर्थशास्त्रा)
संप्रति – मुख्य सम्पादक ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका, शब्दकार
प्रकाशन एवं बहुभाषा अनुवादक

  • ‘‘खो गई चाँदनी’’ (ग़ज़ल संग्रह) 2006,
  • ‘‘बिम्ब नहीं दिखता दर्पण में’’ (गीत संग्रह) 2006,
  • ‘‘मगर जरा सा अलग- अलग है’’ (ग़ज़ल संग्रह) 2017
  • ‘‘रुख़्सार’’ (ग़ज़ल संग्रह) हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित 2022
  • “मन पतंग सा” (गीत संग्रह) हिन्दी व रोमन में प्रकाशित 2023
  • ‘‘पिता हूँ मैं’’ (कतआत/मुक्तक – खण्डकाव्य) हिन्दी, रोमन, रूसी, अंग्रेजी, उर्दू में प्रकाशित 2023
  • ‘‘पियूषा दोहावली’’ (दोहा-संग्रह) हिंदी, रोमन, रूसी, अंग्रेजी में प्रकाशित 2024
  • ‘‘खलिश’’ (ग़ज़ल संग्रह) हिन्दी, रोमन (लिपियांतर) 2024
  • ‘‘चराग़ों का सफ़र’’ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशनाधीन।

  • ‘‘कैकेयी के राम’’ ( उपन्यास) प्रकाशनाधीन
  • ‘‘जननी’’ (खण्ड काव्य) प्रकाशनाधीन
  • “The Last Turn Of My Life”  (Autobiography) Running On The Way

 वर्ष 1975 से अद्यतन कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, व्यंग्य लेख,

लघु कथा, सामयिक लेख आदि का अनवरत सृजन !
देश के तत्कालीन एवं कुछेक वर्तमान के पत्र-पत्रिकाओं यथा-
धर्मयुग, हिदुस्तान, सारिका, रविवार, आजकल हंस, कादम्बिनी,
सुपर ब्लेज, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक आज, दैनिक
भाष्कर, अमृत प्रभात, दैनिक हिंदुस्तान, पुरवाई (यू.के. लन्दन),
सेतु (पिट्सबर्ग अमेरिका) आदि में रचनाओं का प्रकाशन !
साझा संकलनों – कानपुर के कवि, ‘‘प्रतिनिधि ग़ज़लगो कवि’’,
‘‘कहानी के बाद कहानी’’ आदि में ग़ज़ल, कहानी आदि
प्रकाशित !

देश के तमाम कवि सम्मेलनों व मुशायरों में काव्य पाठ !
वर्ष 1979 में दूरदर्शन के ‘‘सरस्वती’’ कार्यक्रम में काव्य पाठ
का लाइव प्रसारण !
वर्ष 1980 में आकाशवाणी लखनऊ व कानपुर से गीत, ग़ज़ल
का प्रसारण !
वर्ष 2016 में लाइव उत्तर प्रदेश चैनल द्वारा ‘‘गीत गोविंद’’
पुरस्कार से अलंकृत !

E-mail : piyush-avasthi3@gmail.com

Mobile No. : +91-81142 10572 (W)

Add : Andheri East, Mumbai.

Sec-16 B Greater Noida,

Gautam Budh nagar – 201308, U.P. , INDIA

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प्रेम रसायन है दर्शन नहीं !

समय की आवाज़

प्रेम रसायन है दर्शन नहीं !

दीप प्रकाश गुप्ता

                              प्रेम अंधा नहीं होता, अंधा तो व्यक्ति होता है। प्रेम कोई व्यक्ति थोड़ी है जो अंधा या बहरा होगा।दरअसल किसी अंधे को प्रेम हो गया तो उसने कह दिया कि प्रेम अंधा होता है।अंधे के लिए तो पूरी दुनिया ही अंधेरी है। किंतु अंधा है कौन? जिसके पास आंख नहीं क्या वो अंधा है?अंधा वो है जो आंख होते हुए भी देखना नहीं चाहता,जो जागना नहीं चाहता वो है अंधा।प्रेम में धोखे खा चुके लोग अधिकतर वो लोग हैं जो जागे हुए नहीं हैं जिनको आंख हैं किन्तु वो अहंकार के कारण देखना नहीं चाहते,जागना नहीं चाहते।धोखेबाज व्यक्ति के चेहरे पर स्पष्ट लिखा होता है कि वो धोका दे सकता है किन्तु आंखें तो सब देखकर भी धोखे खा जाती है।प्रेम में धोखा मिलने का अर्थ है कि प्रेम था ही नहीं वो आकर्षण था।आकर्षण क्या है?जो चीज आपको पसंद आती हो अगर वो किसी व्यक्ति में दिखने लगे तो आकर्षित हो जाते हो।एक काल्पनिक कहानी से बहुत कुछ स्पष्ट हो जावेगी…।

एक लड़की बड़ी मासूम सी,बड़ी संवेदनशील…उसको कुछ चीज़ बहुत पसंद आती थी जैसे उसे ऐसा इंसान पसंद आता था जो मुंहफट हो..किसी से लड़ लेता हो..ताकतवर हो..संयोग से उसे वैसा ही लड़का मिल गया….अब चूंकि उस लड़के में उस लड़की को अपने पसंद की बहुत सारी चीज़ें मिल गई अब वो लड़की उस लड़के के प्रति आकर्षित हो गई…एक पागलपन का  नशा सवार हो गया… हर दिन हर रात वो उसको ही निहारना चाहती थी,उसके बिना एक पल भी जीना गवारा था…वो उसको पाने के लिए जाने कितने जतन किए…अंततः वो लड़का उसको धोखा दे गया….!!!!क्या क्या क्या कहा….?हां तुमने सच सुना उस लड़के ने धोखा दे दिया….अब लड़की का राग अलाप शुरू..अरे मैंने तो प्यार किया था उससे..सारा दिन सारी रात उसकी यादों में पलकें भिगोए हैं मैंने…उसको हर पल निहारा है मैंने…उसको पाने के लिए कितने जतन किए…क्यों मिलता है अच्छे लोगों को धोखा क्यों मिलता है…. मैंने क्या बिगाड़ा था उसका…(नोट-कहानी का पात्र लड़का भी हो सकता था उदाहरण के लिए प्रयोग किया गया है)

मैंने कल्पना किया जैसे वो मेरी की कहानी लड़की मेरे पास आ गई…. मैंने उससे पूछा सुनो बच्चे क्या तुम्हें लगता है कि तुमको उससे प्यार था?उसने कहा हां प्यार था मैंने उसके लिए क्या नहीं किया,सारा दिन सारी रात उसके बारे में ही सोचा…उसके लिए क्या नहीं किया हर पर मुझे सिर्फ उसका ही ख्याल रहता था।मैंने उसको बिठाया और कहा..सुनो मान लो तुम बाज़ार में जा रहे तुम्हें कोई शो रूम में कोई स्कूटी पसंद आ गई,अब तुम उसे खरीदना चाहती हो तो अब या तो तुम पापा को कहोगी या फिर खुद से कमा कर उसे खरीदना चाहोगी…स्कूटी के खरीदने में जीत की अनुभूति होगी…स्कूटी खरीद लेना अर्थात स्कुटी को जीत लेना…हम जिस चीज को जीतना चाहते हैं उस चीज को लेकर प्यास होती है तड़प और बेचैनी होती है और जब वो चीज मिल जाती है तो कुछ क्षण तक जीत की आपार खुशी महसूस होती है और फिर वो खुशी खत्म हो जाती है।फिर कोई नई स्कूटी दिख जाती है ऐसा ही होता है।ये जो घटनाएं घटित हुई वो दो चीज के कारण घटित हुई पहला पसंद के कारण और दूसरा जीत की उम्मीद के कारण।इंसान किसी पसंद की चीज़ को किसी तरह जीतना चाहता है….इसलिए किसी इंसान को कोई लड़का या लड़का पसंद आ जाए तो उसे जीत लेना चाहता है अगर वो जीतने में असफल हो रहा तो फिर वो ब्लैकमेल करना शुरू कर देता है।

अर्थात व्यक्ति का “पसंद”और “जीत लेने की ललक”ये दोनों मिलकर व्यक्ति के भीतर जुनून और जोश पैदा करता है।पागलपन पैदा करता है,अंधा बना देता है।जीत लेने में अलग ही जुनून होता है इसलिए आमतौर पर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले लोग….जीतने की ललक रखते हैं जुनून सवार रहता है…जिस कारण वो बहुत महत्व पूर्ण चीज भी जीवन में छोड़ देते हैं…..आपको ऐसा लगता है जैसे ये प्रेम है…किंतु ये प्रेम नहीं है….ये आपके पसंद की चीज़ों को पाने का केवल अहंकार मात्र है…जिसमें आनंद है,जोश है,जुनून है,नशा है,पागलपन है….और अगर ये सब आपके जीवन में पहली बार हो रहा तो फिर पागलपन का स्तर सर्वोच्च होगा….पहली बार अगर अपनी पसंद की चीज़ों को पाने की इच्छा जागृत हुई,पागलपन सवार हुआ तो इसी को पहला प्यार कह दिया जाता है।किंतु ये प्रेम नहीं….पर वास्तव में फिर प्रेम है क्या?

प्रेम रसायन है दर्शन नहीं।

“आपके चेतना की संगति किसी अन्य चेतना के साथ हो जाना ही प्रेम है।”

रसायन शास्त्र कहता है “लाइक डिजॉल्व लाइक”अर्थात जो जैसा है वो अपने भीतर वैसे को ही घोलना चाहता है।पानी में पानी ही घुलेगा तेल नहीं।अगर पानी में पानी को घोल दिया जाए तो पता भी न चले की पानी में कुछ मिलाया भी गया है।दो से एक होने की क्रिया…घुल जाने की क्रिया प्रेम है।जो आपकी मूल चेतना है,जो आपका मूल स्वभाव है अगर ठीक उसी तरह का कोई व्यक्ति आपके करीब आ गया और आपकी चेतना ने उसे महसूस कर लिया तो फिर वो प्रेम होगा।किंतु प्रेम होने में लंबा समय लग जाता है,आप एक बार दो बार तीन बार आकर्षण के कारण धोखा खा चुके होते हैं।आप अपने दिल के दरवाजे बंद कर लेते हैं जैसे अब तो प्रेम होगा ही नहीं,अब तो प्रेम करना ही नहीं,अब किसी को दिल में जगह देना ही नहीं है।यही वो समय है जब आपके जीवन में प्रेम का आगमन होता है।आप दरवाजे बंद कर चुके हैं दिल के…फिर भी एक झटका मिलता है जैसे खोलो दरवाजा अब सही चीज़ मिल रही है तुम्हें….फिर इंसान धीरे धीरे चुनाव करने के सलीके को सीख जाता है तब जो बंधन होता है वो प्रेम का बंधन होता है।फिर उस प्रेम में घुल जाने का बोध होता है,स्थिरता और शांति महसूस होने लगती है।उसमें चंचलता नहीं होती है।घुल जाने में क्या चंचलता उसमें तो स्थिरता है।

चंचलता तो तब थी जब आप किसी ऐसे व्यक्ति को पसंद कर रहे थे जो आपके लिए सही नहीं था और ऐसे व्यक्ति को इग्नोर कर रहे थे जो आपके लिए सही था।क्योंकि तब आपको चुनाव करने नहीं आता था।तब आपकी छठी इंद्रियां विकसित नहीं हुई थी।प्रेम चेतना के घुल जाने का नाम है।दो से एक हो जाने का नाम है।आपका मूल स्वभाव जैसा है वैसा ही अगर कोई व्यक्ति मिल गया तो फिर आप एक जैसा महसूस करेंगे यही प्रेम है। आप संवेदनशील हैं आपको आपके जैसा ही कोई मिल गया।आप केयरिंग नेचर के हैं आपको आपके ही जैसा कोई मिल गया।।।।इसमें बहुत अधिक चंचलता,पागलपन जुनून तो नहीं होती इसलिए ये कम आकर्षित करने वाला होता है।प्रेम स्थिरता का बोध कराता है…जबकि पसंद और आकर्षण पागलपन और जुनून का बोध कराता है।

पागलपन और जुनून में मजा है जबकि प्रेम में स्थिरता और शांति इसलिए व्यक्ति प्रेम से प्रभावित नही होता बल्कि आकर्षण से अधिक होता है।

– दीप प्रकाश गुप्ता

लेखक, विचारक

समस्तीपुर बिहार

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अनुभव से खुलते है सफ़लता के द्वार

समय की आवाज़

अनुभव से खुलते है सफ़लता के द्वार

नृपेन्द्र अभिषेक नृप

                                        जीवन में सफल होने के लिए मनुष्य अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करता है। सफलता की प्राप्ति के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। ज्ञान प्राप्ति का एक प्रमुख मार्ग अनुभव होता है, जिसके द्वारा हम अपने जीवन की नैया पार लगाते हैं। वास्तव में अनुभव वह सीख है जो प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूलों से प्राप्त करता है। हम सब अपने जीवन में कई कठिन परीक्षाओं से गुजरते रहते हैं। कई बार गलतियां होती हैं तो अक़्सर विफल रह जाते हैं। हम अपने जीवन में कुछ ऐसी गलतियां करते हैं जो हमें तत्काल तो कटु अनुभव देती हैं, परंतु वे भावी जीवन में तमाम संभावित स्मृतियों को मधुर बनाने का आधार बनती हैं। दरअसल, उनसे प्राप्त अनुभव के आधार पर अगली बार हम ऐसी गलतियों से बचते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि गलती करना मूर्खता नहीं होती, बल्कि गलतियों को दोहराना बहुत बड़ी मूर्खता होती है। अनुभव ही हमें ऐसी गलतियों से बचाने में सहायक सिद्ध होता है। राजा ठाकुर ने कहा है- “दूसरों के अनुभववों के ख़ज़ाने में सेंधमारी करने वाला शख़्स बुद्धिमान है।”

अनुभव सामान्य हों या महत्वपूर्ण, मनुष्य के जीवन में सबका महत्व है। कोई भी काम स्वयं करके सीखने की प्रक्रिया में सफलता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण असफलता होती है जो सीखने वाले को समझ की गहराइयों में ले जाती है। हमारी परम्परागत शिक्षा व्यवस्था असफलता को अच्छी नज़र से नहीं देखती और दंडनीय समझती है। परिमाणस्वरूप बच्चे गलतियां छुपाने की कोशिश करते हैं और ग़लत हो जाने के डर से सीखने से वंचित रह जाते हैं।

अनुभव हमारी जिंदगी से कमाया हुआ वह फल है, जो हमें हर समय काम आता है। अनुभव ऐसी कीमती वस्तु है जो, जितना अधिक पास होगा, उतना ही वो खास होगा। अनुभव से हासिल समझ, सीखने वाले में आत्मविश्वास पैदा करती है। यह आत्मविश्वास क़िताबी ज्ञान से नहीं मिलता। दुःख की बात है कि हमारी स्कूली शिक्षा अनुभव को पर्याप्त तवज्जो नहीं देती। परिणामस्वरूप क़िताबी सूचनाओं को रटकर अच्छे-से अच्छे अंकों से परीक्षा पास करना ही शिक्षा का अंतिम उद्देश्य बन गया है। जीवन की असल चुनौतियों को हल करने में स्कूली शिक्षा कतई काम नहीं आती है।

इस संदर्भ में महात्मा गांधी ने कहा है- “भूल करके सीखा जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जीवन भर भूल ही की जाए।” सीखने मात्र के लिए हम अपने जीवन में हमेशा भूल करते नहीं रह सकते हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हर एक गलती से अनुभव लिया जाए और भविष्य में उस गलती को न दोहराएं। अतीत से सबक लेकर उसमें सुधार करें और जीवन में आगे बढ़ने की अपनी राह प्रशस्त करें। हमारे जीवन के कुछ बड़े अनुभव कठिन परिस्थितियों से प्राप्त होते हैं। इसलिए सच ही कहा गया है कि अनुभव से बड़ा और बेहतरीन न कोई मार्गदर्शक होता है, न कोई शिक्षक होता है और न ही कोई सचेतक होता हैं । अनुभव रहित जीवन बिन पतवार की हिचकोले खाती हुई नाव के समान है। हालांकि अनुभव तभी गुणकारी होता है जब हम कर्म की कसौटी पर उसके खरेपन को परखते हैं और बदली हुई परिस्थितियों के हिसाब से उसमे निरंतर सुधार लाते रहें।

– नृपेन्द्र अभिषेक नृप

छपरा, बिहार

लेखक परिचय:

मूल रूप से बिहार में जन्में आप वर्तमान में दिल्ली में रह कर सिविल सेवा की तैयारी के साथ-साथ शोधकार्य भी कर रहे हैं। पठन-पाठन में रुचि की वज़ह से सभी विधाओं में आपकी कलम चलती रही है। विगत 15 वर्षों में देश तथा विदेशों के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके सैकड़ों आलेख, दर्जनों कविताएं, कहानियां एवं व्यंग्य प्रकाशित हुई हैं।

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दुनियादारी का ज्ञान

समय की आवाज़

दुनियादारी का ज्ञान

रेखा शाह आरबी

                                    इस दुनिया में शरीफ और तमीजदार होने के बहुत नुकसान  भी है। कोई चाह कर भी हमेशा के लिए शरीफ और  तमीजदार नहीं रह सकता है।  यह एक ऐसा गुण है जो जिसके पास रहता है ।उसी को परेशान करके रखता है ।रोज मुफ्त की मुसीबत खड़ी कर देता है । कोई  कुछ भी बोलकर निकल जाता है ।शराफत का  हर कोई फायदा उठा लेता है । सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि  तमीजदार रहने पर बहुत सी भावनाएं दिल के अंदर ही दम तोड़ देती है। जो कूटने लायक काम करते है। उनके साथ भी तमीजदारी दिखानी पड़ती है। क्योंकि बात उनकी इज्जत की भले ना रहे लेकिन अपनी इज्जत की रहती है।

वह कहावत तो आपने सुनी ही होगी कीचड़ में पत्थर मारने से कीचड़ के छींटे  पड़ते हैं।बहुत सी भावनाये मन में मार कर इज्जत से पेश आना पड़ता है ।अब क्या किया जाए शरीफ जो है।शरीफ  अंदर ही अंदर घुटता  रहता है।  जैसी दुनिया है उसके हिसाब से तमीजदार होकर जीना आसान नहीं है । लाख ही तमीजदारी  दिखाइए लेकिन कोई ना कोई ऐसा बिना तमीज वाला  मिल ही जाता है  जो   तमीज की कमीज उतार कर रख देता है ।

ऐसे ही सभ्य  और सुसंस्कृत इंसान है मनमौजी जी बिल्कुल गाय  आदमी हैं। और उनका उतने ही धूर्त पड़ोसियों से पाला पड़ा है । मनमौजी के जी के सुबह की पहली पसंद  पेपर उनका  पड़ोसी पहले  पढ़ता  और उसे अस्त व्यस्त करके वापस देता। मनमौजी जी लिहाज करके रह जाते । कोई पार्टी होती तो छककर खाने का लुफ्त उठाते। लेकिन अपने घर उनको कभी नहीं बुलाते। मनमौजी जी की बाइक उनके काम कम और पड़ोसी के काम ज्यादा आती थी। एक दिन इमरजेंसी में उनके मांगने पर उनकी बाइक  का पेट्रोल ही खत्म, ब्रेक खराब जैसी बीमारी हो गई थी।

आखिरकार मनमौजी जी ने भी शिद्दत से मना करना सीख लिया। बहाने बनाने की कला में तो महारत हासिल कर लिया है । अब किसी के बाइक मांगने पर उनकी चाबी ही गुम हो जाती है। अब उनके पड़ोसी उनकी बुराई करते हैं । गाय जैसी बुद्धि वाले मनमौजी जी को उनके पड़ोसी ने लोमड़ी जैसी फितरत का बना ही दिया। आखिर दुनिया ने उनको भी दुनियादारी सिखा ही दिया। आखिरकार इस दुनिया में जीने के काबिल बन ही गए।

– रेखा शाह आरबी

बलिया( यूपी )      

rekhasahrb@gmail.com

(संक्षिप्त परिचय:

लेखन में प्रचलित नाम –रेखा शाह आरबी

मूल रूप से नाम–रेखा देवी

जन्म स्थान: बेल्थरा रोड (बलिया )

शिक्षा: स्नातक,

व्यवसाय: पत्रकारिता 

रुचि: समाचार पत्र-पत्रिका के लिए , लेखन, पठन

  • संघर्षों की रेखाए (कवितासंग्रह )
  • दैनिक जागरण, अमर उजाला, अन्य राष्ट्रीय समाचार पत्र पत्रिकाओं में नियमित व्यंग्य, कहानी का प्रकाशन देश के विभिन्न समाचार पत्रों में आलेख, कविता इत्यादि प्रकाशन
  • क्षितिज के पार -पत्रिका में हास-परिहास स्तंभ लेखन

* वर्तमान पता एवं स्थाई निवास: गिरजा इलेक्ट्रॉनिस /काशीपुर / बलिया- बैरिया मार्ग/ जिला +पोस्ट= बलिया /जिला =बलिया (उत्तर प्रदेश) पिन नंबर- 277001

मोबाइल नंबर एवं व्हाट्सएप नंबर– 87 3686 3697

मेल आईडी–rekhasahrb@gmail.com )

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शांति का केंद्र–आत्मचेतना से भेंट

ऊर्जस्वी

शांति का केंद्र–आत्मचेतना से भेंट

मेघा राठी की कलम से...

                               कभी आंखें बंद करना और पलकों में महसूस होती लाल से रंग की रोशनी में रेखाओं के अक्स देखते हुए खो जाना किसी अनजान लोक में….आती जाती सांसों की लय पर अवचेतन मन एक अदृश्य कहानी लिखने लगता है जिसमें शब्द नहीं केवल भाव हैं … वे भाव जो कभी लिखे नहीं गए,जिनको केवल चेतना ने जाना है। जिसका कथानक कुछ भी नहीं किंतु उसे उठती गिरती सांसों के साथ महसूस करना ही सुकून देने लगता है।

आस– पास की ध्वनियों से प्रभावहीन श्रवण इंद्रियां सुन पाती हैं तो मात्र उन पलकों की थिरकन को, त्वचा में जाग्रत ऊष्मा के प्रवाह को और…और अधरों पर खिंच रही स्मित रेखा को को मन के आनंद में गुम गहरी होती जा रही है।

कपोलों की रक्तिम आभा हथेलियों की छुहन के साथ कांतिमय होती जाती है।

कहानी के अंश बदलते ही नेत्र उस मूंदी अवस्था में भी दृश्य बदलते और परदा गिरते हुए देख कर मुदित होते हैं। दीर्घ व्यतीत होता समय मात्र कुछ क्षण बन कर हृदय की मंजूषा में सहेज दिए जाते हैं और अचानक ही नेत्र यूं खुलते हैं जैसे कहानी का पलकों के पटल पर पटाक्षेप हो गया हो।

बाहर की दुनिया विचित्र सी अनुभूत होती है क्योंकि अभी जो कुछ देखा था वह सब आत्म चेतना से साक्षात्कार करने का एक बहुत ही नगण्य सा प्रयास था जो अनजाने ही हो गया था किंतु इस तनिक से प्रयास से जिस गहरी शांति की प्राप्ति हुई वह अन्य किसी भी वस्तु में, दृश्य में या व्यक्ति में नहीं।

तब सोचिए स्वयं की चेतना से मिलन कितना अभूतपूर्व और शांतिप्रद होगा।

प्रतिदिन की दिनचर्या से कुछ समय अपनी चेतना से मिलने का संकेत हमें हमारी चेतना ने ही आग्रहपूर्ण रूप से दिया होता है किंतु सांसारिक जीवन में या तो हम उसे समझ नहीं पाते या फिर उसे टाल कर अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं।

कभी आपको हुआ है ऐसा अनुभव … अचानक यूं ही , जब आपने खुद के मन की  यात्रा की हो यदि नहीं तो एक बार इस यात्रा पर अवश्य निकलें… नि: संदेह उसके बाद आप बार– बार इस यात्रा पर जाना चाहेंगे।

मेघा राठी

भोपाल मध्यप्रदेश

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गर्लफ्रेंड बनोगी

कथा- कहानी

गर्लफ्रेंड बनोगी

पारुल अग्रवाल मित्तल

                              रितिका का जन्मदिन है आज। डाइनिंग टेबल पर ब्रेक फास्ट करते रजत से मां ने पूछा…

” आज क्या करना है शाम को रितिका का जन्मदिन है? बाहर लेकर चलोगे की घर में ही पार्टी रखे….

” मां मुझे तो आज बहुत काम है ,आप लोग देख लीजिए ।वैसे अब क्या ही बर्थडे मनाना।आठ साल हो गए शादी को।फिर भी जैसा आपको ठीक लगे।मैं लेट हो जाऊंगा।आप लोग एंजॉय करो….कहकर रजत बैग उठाकर ऑफिस चला गया।रितिका सब सुन रही थी।पिछले काफी समय से वो रजत के व्यवहार में रूखापन देख रही थी।और महसूस भी कर रही थी। जाने क्या ही था रजत के मन में ….

” मां घर में ही कुछ कर लेते है ना….रजत नहीं होंगे तो बाहर क्या ही जाना….रितिका ने बोझिल मुस्कान चेहरे पर लाते हुए कहा।

रजत को ऑफिस पहुंचने की बड़ी जल्दी थी।आज तृप्ति का प्रमोशन हुआ था। तृप्ति उसकी कलीग थी।रजत शादीशुदा था लेकिन तृप्ति से बहुत प्यार करता था। तृप्ति के साथ में उसे सुकून मिलता था।पिछले दस महीने से दोनो रिलेशन में थे…… तृप्ति ने कुछ और दोस्तो को भी अपने घर इनवाइट किया था पार्टी में।रजत को पता चला तो उसे बुरा लगा।

” तुमने … सौरभ को भी बुलाया है? रजत ने पूछा

” हां..क्यों? सवाल के जवाब में तृप्ति ने एक और सवाल पूछा।

” इसीलिए कि वो निहायत ही घटिया इंसान है। तृप्ति समझो उसकी नीयत अच्छी नहीं…और मुझे वो पसंद नही।तुम उससे मेल जोल खत्म करो…..रजत ने तृप्ति से कहा।

” मुझे तो सौरभ में कोई खोट नजर नहीं आता….हमेशा मेरी हेल्प करता है…..मां की बीमारी में भी कितने चक्कर काटे उसने…सॉरी रजत लेकिन इतना तो तुम भी नही कर पाए……. तृप्ति ने अपना पक्ष रखते हुए कहा।

” तृप्ति ये उसकी चाल है ,समझो ….मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूं ….सौरभ को तुम्हारे आस पास बर्दाश्त नहीं कर सकता…. बस अब तुम उससे मिलना जुलना बंद करो…मुझे वो ज़रा पसंद नही….रजत ने तृप्ति को अपनी ओर खींचते हुए कहा।

” ये क्या जिद्द है रजत…. तृप्ति ने खिसयाते हुए पूछा।

” कितने सवाल करती हो….तृप्ति तुम बदल रही हो अब …पहले झट मेरी बात मान जाया करती थी।अब हर बात में बहस करती हो….क्या हो गया है तुम्हे..तृप्ति मैं तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूं।मैं आज भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं….रितिका की बर्थडे पार्टी छोड़कर तुम्हारे पास हूं….रजत ने कहा।

” रजत सॉरी…लेकिन तुम्हारा प्यार बेड़ी बनने लगा है मेरे लिए।इससे बात मत करो ,उससे मत करो ।यहां मत जाओ ,ये नही करो वो नही करो….रजत गर्ल फ्रेंड हूं तुम्हारी बीवी नही हूं….तो प्लीज गर्ल फ्रेंड की तरह ही ट्रीट करो…मेरा पति बनने की कोशिश न करो…. पति ऑलरेडी है मेरे पास।मुझे मेरी आजादी सबसे प्यारी है और तुम वही छीन रहे हो….अब तुम सोच लो।मेरे अनुसार आगे बढ़ सको तो ठीक वरना तुम अपने रास्ते और मैं अपने…. तृप्ति ने गुस्से से कहा।

” तृप्ति….तुम ऐसा कैसे कह सकती हो…हम एक दूसरे से प्यार करते है…मैने अपनी गृहस्थी दांव पर लगा रखी है और तुम सब खत्म कर रही हो….रजत ने रूआंसा होकर पूछा।

” रजत जाओ तुम,मुझे कोई लेक्चर नही सुनना….कहकर तृप्ति ने मुंह फेर लिया।

रजत बहुत कुछ कहना चाहता था लेकिन तृप्ति सुनना नही चाहती थी।रजत के कानो में तृप्ति के शब्द गूंज रहे थे” पत्नी नही हूं तुम्हारी” …..रजत के मन में आवेग था एक तूफान था।दिल बहुत भारी हो रहा था… वो सोच रहा था कब वो तृप्ति को पत्नी की तरह ट्रीट करने लगा।तभी रितिका का मैसेज आया” कितनी देर में आ रहे हो”

रजत ने एक फैसला किया और एक गिफ्ट खरीद कर घर पहुंचा ।रजत को समय से घर आया देख सभी खुश थे।अच्छे से रितिका का जन्मदिन मनाया गया।सभी के जाने के बाद रितिका कमरे में आई ।रजत उसी की प्रतीक्षा कर रहा था।

” आप सोए नही…रितिका ने कहा।

” नही…तुम्हारा इंतजार कर रहा था…सुनो…

” जी कहिए…..

” रितिका …..गर्ल फ्रेंड बनोगी मेरी….मैं तुम्हे अब एक प्रेमिका के रूप में देखना चाहता हूं…..अपने रिश्ते को खूबसूरत और मजबूत बनाना चाहता हूं…..बोलो गर्ल फ्रेंड बनोगी मेरी….रजत ने कहा।

” हां…..क्यों नही….कहकर रितिका रजत की बाहों में समा गई।उसके जन्मदिन का इससे अच्छा उपहार क्या होगा की उसका पति एक प्रेमी के रूप में लौट आया।

पारुल अग्रवाल मित्तल

Aligarh

agarwalmittalparul@gmail.com

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खट्टे सपने

कथा- कहानी

खट्टे सपने

वैभव दुबे

                आज पूरे बारह दिनों के बाद मैसेंजर पर मिले हुए रिप्लाई को देखकर मैं जोर-जोर से हँस पड़ा और धीरे से बुदबुदाया,”फंस गया एक और बकरा हलाल होने के लिए”…मैं पागलों की तरह हँसे जा रहा था तभी मोबाइल से नज़रें हटाकर सामने देखा तो ऑफिस के सभी लोगों की मुझसे सवाल करती हुई नजरें मेरी तरफ थी…मैं झेंप गया और जैसे तेज रफ्तार से चलती गाड़ी के आगे अचानक किसी के आने से इमरजेंसी ब्रेक लगते हैं वैसे ही मेरी हँसी को भी ब्रेक लग गया था….

किरन भी मुझे बड़े ध्यान से देख रही थी।शायद… वो मन ही मन मुझे चाहती थी  ….पर मेरे ख्वाबों ख्यालों में तो कोई अनदेखा चेहरा ही बसा हुआ था ….मेरी नज़र में वो मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी बस…सिर्फ दोस्त! मेरी हंसी को देखकर उसका गुलाब सा चेहरा मुरझा सा गया था ….जैसे अपने प्यार को किसी और के साथ देख कर सीने में जलन सी होती है ठीक वैसे ही लगभग चिढ़ते हुए मुंह पर बनावटी हंसी लाकर बिल्कुल मेरे पास आकर फुसफुसा कर वो बोली,”क्यूँ कोई मिल गई है क्या मुझसे भी अच्छी?”

मैंने उसके गाल पर धीरे से चपत लगाते हुए जबाब दिया,”मिल नहीं गई है…मिल गया है”पगली..

किरन ने ऐसे मुंह बनाया जैसे कह रही हो…मैं कुछ समझी नहीं!

मैंने मुस्कुराते हुए शाहरुख खान के अंदाज में कहा,”तुम नहीं समझोगी कि.. कि… कि..कि..किरन…।”

और हंसते हुए अपनी फाइल उठा कर बॉस के केबिन की ओर बढ़ गया….

मुझे अब फेसबुक पर लड़की वाली आई डी बनाकर लड़कों को उल्लू बनाने में बहुत मजा आने लगा था …..सुबह का घटनाक्रम भी इसी बात से जुड़ा हुआ था …दरअसल एक स्मार्ट से लड़के आर्यन की आई डी पर मैंने आलिया नाम की अपनी फर्जी आईडी से फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी…और आज उसने रिकवेस्ट एक्सेप्ट भी कर ली थी और साथ ही मैसेंजर पर मैसेज किया था कि….”हैल्लो फ्रेंड….”

मैंने भी लड़कियों जैसे ही नखरे दिखाते हुए चार दिन बाद एक स्माइली चिपका दी…तब तक उसके गुड मॉर्निंग,गुड नाईट के मैसेज देख कर मैं रोज हंसता मगर रिप्लाई नहीं करता था..

मुझे पता था ये लड़का भी पहले ऐसे ही हेल्लो फ्रेंड बोलेगा फिर. ….हेलो डिअर, फिर हेलो माई स्वीटहार्ट बोलेगा और फिर लव वाली शायरी …ढेर सारे फूल …और न जाने क्या क्या..फिर कभी रात की तन्हाई में बात करते हुए मुझे किस करने की इच्छा जतायेगा…और फिर एक दिन अपनी औकात पर आ ही जायेगा और मुझे किसी होटल में अकेले मिलने बुलायेगा…बस यही वो पल होगा जब मैं उसे सच से रूबरू कराऊंगा ….और जब उसका दिल जमीं पर गिरकर टूटा हुआ बिखरे हुए आईने की तरह बेबस सा पड़ा होगा…मैं जोर-जोर से ठहाके लगाऊंगा….

मेरी और आर्यन की चैटिंग लगभग रोज ही होने लगी थी…पर उस बन्दे में कुछ तो था.. फिसलने का नाम ही नहीं ले रहा था …मैं चाहता तो उसे ब्लॉक भी कर सकता था पर अब वो मेरे लिए एक चेलेंज की तरह था…एक दिन किरन कि बर्थ डे पार्टी में मुझे एक ख़्याल सूझा मैंने आर्यन के चैटिंग बॉक्स में लिखा”आर्यन हमें चैटिंग करते हुए बहुत दिन हो गए हैं आज मैं तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहती हूँ.. मेरे पर्सनल नम्बर के लिए तो तुम्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा पर तुम मुझे मेसेंजर पर वॉइस कॉल कर सकते हो….अभी मैं मेरी एक फ्रेंड की बर्थ डे पार्टी मे आई हूं  फिर घर पहुंच कर बात नहीं हो पाएगी …क्योंकि तुम्हें तो पता ही है कि मैं एक कंजर्वेटिव  फैमिली से बिलोंग करती हूं और कॉलेज में भी मुझे मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है…

ऑनलाइन होते हुए भी उसका कोई रिप्लाई नहीं आया…और अचानक वो ऑफलाइन हो गया….मैं सोच में पड़ गया आज के समय में ऐसे भी लड़के होते हैं क्या ?लड़की ऑफर दे रही है और ये ….?अजीब है…

बर्थ डे पार्टी में केक कटने के बाद सभी डिनर लेने लगे पर मुझे भूख ही नही  लग रही थी ।मैं न जाने क्यों बार-बार मैसेज बॉक्स खोलकर बैचेनी से दिमाग में कई सवाल लिए हुए आर्यन के मैसेज का इंतजार कर रहा था …

“इतनी बैचेनी तो लड़कियों में ही होती है”मैंने मन ही मन बड़बड़ाया।नहीं…मैं तो लड़का ही हूँ  मेरा नाम डॉक्यूमेंट में भी रोहित ही लिखा हुआ है …पर मुझे आर्यन से इतना लगाव सा क्यूँ लग रहा है  उससे चैटिंग करने का मन क्यूँ करता है अब उसके मैसेज देखकर जोर-जोर से हंसता क्यूँ नही  हूँ …क्या मुझे लड़के पसन्द हैं?….छि..ई.ईई….ये नहीं हो सकता?मुझे आज ख़ुद पर शक होने लगा था।मैं लड़का ही हूँ… मैं लड़का ही हूँ …ख्यालों में खोये हुए कब मेरी  आवाज

मेहमानों का हालचाल लेती हुई बर्थ डे गर्ल किरन के कानों में पहुंच गई..मुझे पता ही नहीं चला…

“हाँ तुम लड़के ही हो मुझे पूरा विश्वास है”किरन ने हंसते हुए कहा और प्लेट से उठाकर केक का एक बड़ा सा टुकड़ा लगभग मेरे मुंह मे ठूस ही दिया ।मैंने भी ख़ुद को सम्हालते हुए केक उठाकर उसके पूरे मुंह पर मल दिया सब लोग हमें देखकर ठहाके लगा कर हंस पड़े और हम दोनों भी…..

पार्टी का लगभग दी एंड हो चुका था पर डीजे पर अभी भी “पार्टी अभी बाकी है” की धुन बज रही थी और किरन के रूम पर बस किरन को मिलाकर हम पांच सबसे अच्छे दोस्त ही रुके हुए थे …किरन हम सभी को खींचते हुए डांस फ्लोर पर ले गई और फिर शुरू हो गया था बादशाह के गानों पर मस्ती डांस…..मैंने एहतियातन अपना मोबाइल जेब से निकाल कर कुछ दूर रख दिया था….डांस करते हुए अचानक मोबाइल की स्क्रीन चमक उठी….मैंने दौड़कर मोबाइल को हाथों में उठा लिया …अरे ये तो आर्यन की वॉइस कॉल है..मैंने नाचती हुई किरन का हाथ पकड़ा और उसे डांस फ्लोर से दूर ले गया.. ,”किरन.. यार प्लीज तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है न?मेरा एक काम कर दे…प्लीज कर दे न!

“बस सबसे अच्छी दोस्त?”किरन ने मेरी आँखों मे आंखे डालते हुए पूछा…

उसके इस तरह से देखने ने मुझे अंदर तक एक अनजाने डर से कंपा दिया था…पर मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा ,”हाँ अभी तो बस सबसे अच्छी दोस्त पगली” इधर किरन को मनाने में मुझे वक़्त लग रहा था उधर आर्यन की कॉल छठवीं बार रिंग कर रही थी…आखिर किरन मान ही गई मैंने उसे सब बता दिया था अब वो बन गई थी आलिया…

मैंने कॉल उठाई और स्पीकर ऑन कर दिया …आलिया बनी हुई किरन ने फुसफुसा कर कहा हेलो…उधर से आर्यन की आवाज़ आई “हेलो… सॉरी यार मैं हॉस्पिटल में था,माँ का अचानक बी.पी. बढ़ गया था तो हॉस्पिटल आना पड़ा ,तुम परेशान मत होना अब सब ठीक है”तुम घर पर आ गए हो क्या?…किरन ने धीरे से कहा, “हाँ… इतनी रात को मुझे घर से बाहर रहने की इजाजत नहीं है,मैं चुपके से बाथरूम में आकर बात कर रही हूँ”

“ओके ….ओके.. ..ओके तुम जाओ अभी।वैसे तो बात करने का बहुत मन था पर तुम्हें किसी तरह की कोई प्रॉब्लम न हो जाये..हम फिर कभी बात कर लेंगे।अब तुम फोन रखो और जाओ ।गुड नाईट डिअर”आर्यन ने कहा और किरन का जबाब सुने बिना ही फोन काट दिया।

हम दोनों आपस में कुछ कह पाते उससे पहले ही अजय,मनीषा और वरुण की ओ…हो…हो.. हो…करती हुई आवाज़ सुनाई दी …”अच्छा बेटा तो हम तीनों को उधर डांस में बिजी कर के तुम दोनों यहां रोमांस फरमा रहे हो”…,”मनीषा ने बनावटी गुस्से से कहा”अजय वरुण ताली मार कर ठहाके लगा रहे थे  यह सुनकर किरन तो ऐसे शरमा गई जैसे सच में मैंने उसे किस ही कर लिया हो…मैंने झेंपते हुए कहा ,”अरे नहीं यार एक अर्जेंट बात थी” अजय बोला ,”हम्म… हम सब समझ गए हैं तुम्हारी अर्जेंट बात” उधर वरुण जोर जोर से गाना गाने लगा ,” दो दिल मिल रहे हैं मगर चुपके चुपके,सबको हो रही है ख़बर चुपके चुपके….”मुझे यह सब बहुत इरिटेट कर रहा था इसीलिए मैं वहां से किसी से बिना कुछ बोले ही अपने घर की ओर निकल पड़ा।

अगले दिन सुबह सन्डे को मैं देर से सोकर उठा।”ये किरन का बर्थ डे सैटरडे को होने से देर रात तक पार्टी भी हो गई और मस्त नींद भी पूरी हो गई”मैंने हाथों की उंगलियों को आपस में फंसा कर ऊपर की ओर खींचकर जम्हाई लेते हुए खुद से ही कहा।मैनें पास में रखा हुआ मोबाइल उठाया (जो कि रात से ही साइलेंट मोड पर था)…देखा तो चौंक गया आर्यन के देर रात के कई मैसेज पड़े हुए थे ….मैं उन्हें पढ़ने लगा…

“मुझे पता है तुम सो गई हो और मेरे मैसेज सुबह ही पढ़ोगी पर कुछ पूछने का मन कर रहा है अभी पूछता हूँ सुबह पढ़कर जबाब देना…”

मैं आगे के मैसेज और उत्सुकता से पढ़ने लगा…

“जब तुम्हारी हेलो पहली बार सुनी तो न जाने क्यूँ मुझे ये लगा ही नहीं कि ये तुम हो क्योंकि तुम्हारे लिखने के अंदाज में जो मासूमियत नज़र आती है वो तुम्हारे द्वारा बोले गए शब्दों में नहीं आ रही थी,क्या सच में वो तुम ही थी???ये सुनकर हो सकता है तुम्हें बुरा लगे पर प्लीज तुम नाराज मत होना…”

मैं एकदम से चौंक गया था वास्तव में मैंने उससे बात ही नहीं की थी वो तो किरन थी और आखिर रोहित आर्यन से बात करता भी तो कैसे?पर ये जान कैसे गया?मैंने कौतुहलवश आगे पढ़ना शुरू किया…

“मेरे मन मे जो आता है उसे दिल में नहीं रखता बोल देता हूँ ।हम अच्छे दोस्त हैं इसीलिये एक दूसरे को समझते भी हैं …तुम बहुत प्यारी लड़की हो मैं तुम्हारा कुछ भी ऐसा वैसा कहकर दिल नहीं दुखाना चाहता।हो सकता है मैं ही ग़लत हूँ पर तुमसे कहकर अब हल्कापन महसूस हो रहा है…ओके गुड नाईट डिअर…

सोर ड्रीम…

सोर ड्रीम????मतलब खट्टे सपने …कमाल का बन्दा है …लोग स्वीट ड्रीम कहते हैं और ये सोर ड्रीम…ह्म्म्म….”मैंने बड़बड़ाते हुए कहा”

“वैसे लिखना तो मैं भी चाह रहा था कि तुम जब लिखते हो तो बिल्कुल लड़कियों की तरह शब्द होते हैं तुम्हारे पर जब कल आवाज़ सुनी तो तब जाना कि तुम सख्त लौंडे हो”मन ही मन यह सोचकर मैं खुलकर हंस पड़ा….

मैंने बस रिप्लाई में इतना लिखा कि, “गुड मॉर्निंग….आज सन्डे है तो अब कल बात होगी Tk cr☺️”

अगले दिन उसका कोई मैसेज नहीं आया…फिर एक और दिन गुजर गया कोई खबर नहीं???!!!ऐसे एक-एक दिन गुजरते गए पर उधर से कोई रिप्लाई ही नहीं आया और वो कभी भी ऑनलाइन भी नज़र नहीं आया… हालांकि मैंने उसे रोज मैसेज किये पर….नो रिप्लाई!!

“कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे मेरी सच्चाई का पता चल गया हो कि मैं जो रोज उसे आलिया नाम से बातें करता हूँ …एक लड़का हूँ” सोहलवें दिन मैंने सुबह की चाय पीते हुए ख़ुद से बड़बड़ाते हुए कहा।”तुम हमेशा नेगेटिव ही सोचते हो यार कभी तो पोजिटिव भी सोच लिया करो…”मैंने सामने लगे आईने में खुद को देखते हुए अपने ही   सर पर चपत लगाते हुए कहा…और मुस्कुरा दिया..

कहीं उसकी तबियत तो खराब नहीं है…नहीं…ये हो सकता है कि उसकी माँ की तबियत खराब हो गई हो उसने बताया था …

अभी कॉल करता हूँ उसे …बिल्कुल तय करते हुए मैंने मैसेंजर की वॉइस कॉल वाली कॉन्टेक्ट लिस्ट से उसका उसका नाम जैसे ही निकाला….”अरे तुम पागल तो नहीं हो गए…तुम आलिया नहीं हो रोहित हो.”..मैंने डांटते हुए खुद से कहा।

छोड़ो भी जब उसे फ़िक्र नहीं है तो मैं क्यूँ सोचूँ उसके बारे में…?अरे …फिर से मैं गर्लफ्रैंड की तरह सोच रहा हूँ…क्या हो गया है मुझे? लड़को को पागल बनाते बनाते कहीं मैं ही तो पागल  नहीं हो गया?मैनें मन ही मन सोचा और चल दिया अपना फेवरिट गेम बिलियर्ड्स खेलने…जिससे माइंड थोड़ा रिलेक्स हो सके!

इक्कीसवें दिन आर्यन का रिप्लाई आया,”सॉरी यार तुम्हारे ढेर सारे मैसेज आज पढ़ सका हूँ, मैं इंडिया में नहीं था माँ के ट्रीटमेंट के लिए अचानक अमेरिका जाना पड़ा था,अब सब ठीक है…तुम प्लीज गुस्सा मत होना”

कोइनसिडेंटिली मैं भी ऑनलाइन था,मैंने बस इतना लिखा ,”इट्स ओके”

“इट्स ओके”? बस…रोज मुझे मैसेज तो ऐसे कर रहे थे जैसे प्यार हो गया हो तुम्हें मुझसे” ऐसा लिखते हुए आर्यन ने ढेर सारी हंसती हुई आंखों में खुशी के आंसू वाली टेढ़ी स्माइली भेज दी….

रिप्लाई में स्माइली तो मैंने भी भेजी मगर

सच कहूँ तो शॉक्ड  हो गया था मैं ।

  मैंने आर्यन को लिखा,”क्या तुम्हें मुझसे प्यार है?”

“पता नहीं पर तुमसे बातें करना अच्छा लगता है…”

आर्यन का रिप्लाई आया और साथ ही उसने मुझसे पूछ लिया …,”और तुम्हें”

उसके उन दो शब्दों ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था ।इसी पल का तो इंतजार रहता था न मुझे…. कि कब वो प्यार-व्यार की बातें करे और कब मैं उसे जलील करूँ पर आज उसे सच बताने की हिम्मत क्यूँ नहीं जुटा पा रहा हूँ मैं?

इसी कशमकश में उलझे हुए मैंने उसे लिख दिया,”मुझे भी पता नहीं”

लगभग दो मिनट बाद आये हुए उसके रिप्लाई ने मेरे पैरों के नीचे से मानो जमीन ही हटा ली थी.. .. .उसने लिखा था ,”पर मुझे पता है तुम मुझे बहुत प्यार करती हो ,तभी तो इतनी चिंता करती हो मेरी …पर आज मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ कि मैं तुम्हारा बहुत अच्छा दोस्त तो बन सकता हूँ पर जीवनसाथी नहीं क्योंकि मेरी जिंदगी का एक बहुत बड़ा रहस्य है जो मैं तुम्हें नहीं बता सकता।मैं कभी तुम्हारा नहीं हो पाऊंगा पता नहीं क्यूँ मुझे भी तुमसे बात करके कुछ अलग वाली फीलिंग होती है।मैंने भी तुम्हें पूरे इक्कीस दिन ग्यारह घण्टे चौबीस मिनट अड़तालिस सैकेंड तक याद किया है और अब बात करते हुए पूरे बाइस दिन छत्तीस सेकेंड्स हो गए हैं…”

यह पढ़कर मैं आश्चर्यचकित रह गया

समय का इतना सटीक कैलकुलेशन तो बस कोई सच्चा प्यार करने वाला ही कर सकता है।

“बहुत सीधा बन्दा है बेचारा,आज के बाद मैं ये गन्दा खेल बन्द कर दूंगा,अगर वो सच जान गया तो बहुत ग़लत हो जाएगा।”मैंने बड़बड़ाते हुए खुद से कहा। मैं न जाने क्यों  उसे उदास नहीं होने देना चाहता था..

उसके मैसेज को मैंने तीन-चार बार पढ़ा …

उसके लिखे गए एक वाक्य “कहना चाहती हूँ “पर रिप्लाई देते हुए लिखा ,”चाहती हूँ नहीं चाहता हूँ मिस्टर आर्यन अग्रवाल…आपसे लिखने में मिसप्रिंट बहुत हो जाता है” बड़ी सभ्यता से मैंने उसे लिखा और उसे जितनी बड़ी हंसी वाली स्माइली भेजी उससे कहीं ज्यादा जोर से मैं हंस पड़ा।ओके गुड नाईट डिअर अपना ख्याल रखना…

ये मेरा आखिरी मैसेज था ।

मैंने मन ही मन में तय कर लिया था कि अब मैं उसे कभी मैसेज नहीं करूँगा।उससे दूर हो जाऊंगा ,”पर मन नहीं माना तो?”ख़ुद से सवाल किया मैनें और जबाब में डेटरमाइंड होते हुए अनमने मन से अपनी फेसबुक आई डी को ही डिलीट कर दिया।न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी…

अगली सुबह और उसके बाद का हर दिन पिछले दिनों की तुलना में बिल्कुल नया था.. मेरा व्यवहार बदल गया था अब मैं किसी को तंग नहीं करता था .ऐसा कोई काम नहीं जिससे किसी को नीचा देखना पड़े…किरन को मेरा ये बिहेबियर जरा भी पसन्द नहीं आ रहा था…उसने कई बार मुझे समझाने की कोशिश की…पर मुझे कुछ भी अच्छा ही नहीं लगता था।

धीरे-धीरे वो भी मुझसे कतराने लगी थी…और एक दिन मेरे हाथ में अपनी शादी का इनविटेशन कार्ड थमाते हुए लगभग खीझते हुए मुझसे बोली,”मैं अर्णव से शादी कर रही हूँ,बहुत अच्छा लड़का है  और हां वो तुम जैसा तो बिल्कुल भी नहीं है।” अर्णव ???अपने बॉस का बेटा न?मैंने उसकी आँखों मे आँखे डालते हुए पूछा।”हम्म..वही”उसने लम्बी सांस लेते हुए कहा….”तुम्हें जरूर आना है..आओगे न?”मेरा जबाब सुने बिना ही उसने फिर कहा,”तुम जरूर आओगे”ऐसा कहते हुए वो तेज कदमों से ऑफिस के दरवाजे से बाहर निकल गई और  मैं झटके से बन्द हुए आगे पीछे हिलते हुए दरवाजे को निहारे जा रहा था,पूरा स्टाफ मुझे ऐसी नज़रों से देख रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो मैंने!!!

किरन की शादी भी हो गई…वो अर्णव के साथ अब बैंगलोर शिफ्ट हो गई थी…जब मेरे घरवालों को पता चला (जो कि किरन और मेरी शादी के सपने देख रहे थे )तो उन्होंने मेरे लिए आने वाले रिश्तों के स्वागत में घर के दरवाजे खोल दिये थे।मैं घर का इकलौता चिराग जो था सब मुझे अपनी जान से ज्यादा प्यार करते थे …और मेरी शादी के तो ऐसे सपने सजाये थे कि  पूछो ही मत।

शादी तो मुझे भी करनी थी अब पूरे पच्चीस साल का भी तो हो गया था मैं….

छोटे चाचा जी रोज नई लड़कियों की तस्वीर लेकर आ जाते वो मुझसे बस दो साल ही बड़े थे तो मुझसे मजाक भी कर लेते थे….मैं लड़कियों की तस्वीर देखता और रिजेक्ट कर देता था…किसी भी तस्वीर में वो अट्रक्शन नहीं था जो मुझे दिल से अपनी ओर खींच ले…ऐसे करते करते छह महीने और गुजर गए …एक दिन बड़े चाचा जी ने गुस्से से कहा ,”अगर ऐसे ही हर किसी लड़की को रिजेक्ट करते रहोगे न तो एक दिन तय है रिश्ते आने भी बंद हो जाएंगे अब कर भी लो यार …शादी,तुम्हारे हिसाब से लड़की देखना बन्द मेरी अग्रवाल जी से बात हो गई है उनकी लड़की बहुत सुंदर,सुशील है कल हम सब उसे देखने दिल्ली चल रहे हैं कल संडे भी है तो कोई बहाना भी नहीं चलेगा तुम्हारा “ठीक है?चाचा जी ने जोर देकर पूछा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया।

मगर अग्रवाल नाम सुनकर आज पूरे तीन साल के बाद मुझे आर्यन अग्रवाल की याद आ गई थी…वैसे क्या मैं उस सख़्त लौंडे को कभी भूल पाया हूँ,”खुद से सवाल करते हुए मैं पुराने दिनों को याद कर के खिलखिलाकर हंस पड़ा”

अगले दिन मैं ,माँ ,बड़े चाचा ,छोटे चाचा और मौसी की बेटी यानी कि मेरी प्यारी बहन रिंकी दिल्ली के लिए रवाना हो गए…लड़की वालों के घर पहुंचते ही हमारा स्वागत ऐसे किया जा रहा था जैसे आज ही बहू को विदा करा के हम साथ में ले जाएंगे।मेन गेट से बगीचे को क्रॉस करते हुए हम एक हॉल में दाखिल हुए…दरवाजे के एकदम सामने एक बड़ी सी तस्वीर पर मेरी नज़र ठहर गई…और ठहरती भी क्यूँ न काले लिबास में लिपटी हुई संगमरमर सी सफेद लड़की जिसकी भीगी हुई जुल्फों से टपकती हुई पानी की बूंदें तस्वीर में भी वास्तविकता का अहसास करा रही थीं….सादगी ऐसी बेमिसाल की एक नज़र में ही प्यार हो जाये…मुंह से निकला बनाने वाले ने क्या तस्वीर बनाई है काश यही वो लड़की होती तो मैं बिना कुछ सोचे समझे हां कह देता…मेरे तस्वीर पर लगे ध्यान को रिंकी की बिल्कुल मेरे कान के पास आती हुई आवाज़ ने तोड़ा….भैया भाभी आने वाली है तस्वीर को छोड़ो अब रियल में देखो…

“क्या?सुनो रिंकी…!यही लड़की हम देखने आए हैं? …”हम्म अभी जब आप तस्वीर देखने में कहीं खोये हुए थे तभी होने वाली भाभी के भैया आर्यन ने मुझे बताया…..”रिंकी ने चुटकी लेते हुए मुझसे कहा।

आर्यन????वो भी अग्रवाल !!!ये क्या हो रहा है मेरे साथ?आखिर क्यूँ हो रहा है?

मैंने आर्यन की ओर देखा वो भी मुझे देख रहा था..उसने मुझे हेलो कहा ..मैंने भी उसके चहरे को लगभग घूरते हुए उसे हाय बोल दिया…

और दो मिनट बाद ही बड़ी हिम्मत जुटाकर आर्यन से बोला मुझे अपना घर नहीं दिखाओगे आर्यन?”श्योर..व्हाई नॉट…”आर्यन ने कहा. ..तभी माँ ने मुझे ऐसे देखा जैसे कह रही हों आर्यन ही क्यों?? घर देखना ही है तो जो चाय लेकर आने वाली है उसके साथ देखो… पर मैंने माँ के देखने को लगभग अनदेखा सा कर दिया…और आर्यन के साथ सबसे पहले बगीचे में आ गया…

उससे डायरेक्ट तो पूछ नहीं सकता था इसीलिए मैंने कहा,”आर्यन तुम्हें बॉलीवुड मूवी पसन्द हैं न “उसने हाँ में सर हिला दिया।मैंने फिर पूछा ,”तुम्हारा फेवरिट एक्टर कौन है?” टाइगर श्रॉफ …जबाब आया।और फेवरिट एक्ट्रेस पक्का आलिया ही होगी है न?मैंने पूछकर उसके चेहरे को ऐसे देखा जैसे मेरे दिमाग में उठते हुए हज़ारों सवालों का अब यही एक सही जबाब आने वाला है पर ‘आलिया’ नाम सुनकर भी उसके चेहरे के एक्सप्रेसन नहीं बदले “नहीं…मुझे यामी गौतम पसन्द है और आपको ?”आर्यन ने कहा तो मैं शॉक्ड रह गया,आर्यन के सवाल का कोई जबाब भी नहीं दिया और अब ‘आर्यन अग्रवाल’ का चैप्टर फिर से क्लोज हो गया था…मैंने बोझिल मन से आर्यन के साथ पूरा घर देखा …और लौटकर उसी हॉल में आ गया …

तभी सामने से हाथों में चाय की ट्रे लिए हुए वो लड़की आती हुई दिखाई दी….”प्रिया नाम है भाभी का”रिंकी ने फुसफुसाते हुए कहा।पीली साड़ी में कढ़ाईदार लाल कलर के फूल ,सुनहरा बॉर्डर,माथे पर छोटी सी गोल्डन कलर की बिंदी,सर पर पल्लू और झुकी हुई नज़रें…सच कहूँ तो वो सामने टँगी हुई तस्वीर से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत नज़र आ रही थी।

प्रिया ने सबको चाय दी और माँ के कहने पर उनके बगल में ही बैठ गई ,माँ ने प्रिया के सर पे बड़े प्यार से हाथ फेरा और बोलीं,”बेटा , तुम बहुत सुंदर हो मेरा रोहित भी बिल्कुल हीरो जैसा ही लगता है ….है न?”वो मुस्करा दी उसके चेहरे का रंग हल्का ग़ुलाबी हो गया था …शायद ये शर्म का रंग था।तभी बड़े चाचा  की आवाज़ आई ,”अग्रवाल जी आपने अपनी बेटी को इंग्लिश मीडियम कॉलेज में भले ही पढ़ाया हो पर संस्कार तो हिंदी वाले दिए हैं अपने प्यारे भारत वाले….हमें आपकी बेटी बहुत पसंद है ,अब ये दोनों भी मिलकर एकदूसरे को पसंद कर लें….चलिये हम सब किसी और कमरे में चलते हैं….

सब हम दोनों को अकेला छोड़कर चले गए….कुछ देर तक हम दोनों ही शांत रहे,न जाने क्यों उसकी तस्वीर देखकर मुझे उससे एक लगाव सा महसूस हुआ था जो सैकड़ों लड़कियों की तस्वीर देखकर नहीं लगा… ऐसा लग रहा था जैसे मैं पहले भी प्रिया से कभी मिल चुका हूँ, और अब वो मेरे करीब बैठी थी।मैंने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा ,”प्रिया जी आपकी ये बड़ी सी तस्वीर देखकर ही आपको मैंने पसन्द कर लिया था पर आप तो तस्वीर से भी ज्यादा प्यारी हैं घरवालों को आपका बिहेवियर बहुत पसंद आया”… और आपको? “उसकी मीठी सी आवाज़ ने जैसे कानों में अमृत घोल दिया हो”

मैंने कहा ,”मुझे भी ….और आपको मैं?”उसने बड़ी मासूमियत से हाँ में सर हिला दिया…भाभी को भैया पसन्द आ गए …पर्दे की ओट में छुपी हुई हमारी सारी बातें सुन रही रिंकी नाचते हुए शोर मचाते हुए सामने आ गई तो घर वाले भी हंसते हुए आ गए।छोटे चाचा ने लड्डू उठाकर अग्रवाल जी के मुंह में रख दिया  …..सब एक दूसरे को बधाई दे रहे थे और मैं प्रिया को देखे जा रहा था ।

हम कानपुर लौट आए और शादी की तैयारियां जोरों -शोरों से शुरू हो गई…दो महीने बाद प्रिया हमारे घर में बहू बनकर आ गई थी। ….

हमारी जिंदगी खुशियों की पटरी पर तेज रफ्तार से दौड़े जा रही थी…मैं प्रिया को पाकर बहुत खुश था उससे कोई पुराना रिश्ता महसूस होता था लगता ही नहीं था जैसे उसे पहली बार में ही देखकर पसन्द किया हो मैने।हमारा मालदीव का हनीमून भी बहुत प्यारा रहा…अब प्रिया मुझसे खुलकर बातें करने लगी थी …

लगभग छह महीने बाद जब घर पर सिर्फ हम दोनों ही थे एक संडे की सुबह नाश्ता प्रिया के मना करने के बावजूद भी मैंने ही बनाया,प्रिया किचिन में ही साथ में खड़ी होकर मुझे प्यार से देखती रही…और फिर अचानक आगे बढ़कर मेरे गाल पर प्यारी सी किस्सी देकर बोली,”थैंक्स फ़ॉर बीइंग माय हसबैंड”

मैंने मुस्कुराकर उसके माथे को चूम लिया।

नाश्ता रेडी था ..प्रिया बोली,”आप चलो मैं चाय बनाकर साथ में लेकर आती हूँ आप डाइनिंग टेबल पर पहुंचो…और हाँ मेरा मोबाइल प्लीज चार्जिंग पर लगा दो न ..अभी पापा जी से बात करनी है और बैटरी ओनली सिक्सटीन परसेंट ही है”मैंने मोबाइल लिया और डायनिंग टेबल पर आ गया।मोबाइल में कोई पासवर्ड भी नहीं लगा था…मेरी उंगलियां यूँ ही हर एक एप्प को खोलने बन्द करने लगी और आंखे किचेन के गेट पर लगी थी….तभी मेसेंजर ऑन हो गया….और जो मैंने देखा उसे देखकर मेरी तो सांसे ही रुक गईं थीं मानो ….

आर्यन अग्रवाल सेंट मैसेज टू आलिया. .

मैंने उसे क्लिक किया उसमें मेरे आखिरी मैसेज..”ओके गुड नाईट डिअर अपना ख्याल रखना…”के बाद के कई मैसेज पड़े थे…मैं एक सांस में मैसेज पढ़ता गया …

“सुनो आलिया अभी गुड नाईट मत बोलो अभी मुझे तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं ..

अरे ..ऑफलाइन हो ही गई तुम…कोई नहीं पर

आज एक झूठ से पर्दा उठ ही जाना चाहिए क्योंकि तुम बहुत प्यारी ,मासूम सी लड़की हो मैं तुम्हारा दिल नहीं तोड़ना चाहती ….

अब तुम सोचोगी की मैंने ‘चाहती’ क्यूँ लिखा …दरअसल मैं लड़का नहीं एक लड़की हूँ …प्रिया….नाम है मेरा …यह जानकर भी मुझसे दोस्ती करोगी तुम?दरअसल मेरे एक बेस्ट फ्रेंड को एक लड़के ने रिया बनकर इतना सताया कि वो डिप्रेसन में चला गया तो अब मैं भी फेसबुक पर लड़का बनकर लड़कियों को सताने लगी थी…पर तुमसे मिलकर अब और नहीं….जब तुमने फ्रेंड की बर्थडे पार्टी से मेसेंजर पर मुझे कॉल की थी न ….तब मैंने

तुम्हारी बात अपने भाई आर्यन से कराई थी ….वो भी इस शर्त पर की अगले दिन मैं उसे उसकी गर्लफ्रेंड से मिलने में हेल्प करूंगी।….फिर ढेर सारी स्माइली …

– वैभव दुबे

गजलगा, लेखक, इंजीनियर भेल

झांसी उत्तर प्रदेश

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कन्यादान

कथा- कहानी

कन्यादान

डॉ. मीरा सिन्हा

सामने मेज पर निमंत्रण कार्ड पड़ा था, जो के डाक से आया था, उसे उठा मैं बड़े गौर से देखने लगी, यह मेरी सखी रिश्म की शादी का कार्ड था !

मुझे अजीब सा आनंद महसूस हो रहा था ! यह शादी रूढ़ियों के बंधन को काटने जा रहा था !

पति के ऑफिस से आते ही मैंने खुशी से चहक कर कहा- रश्मि की शादी का कार्ड है !

कौन रश्मि ? ये चौंक गये ! मैंने हँसते हुए कहा- डॉ चौधरी जी जो दूसरे कालोनी में रहते थे,पर हम लोगों से बहुत आना जाना था !

ये एकदम चौंक गये- अच्छा !! कब शादी है?

मैंने कहा- इसी महीने के अन्त में, चलना है!

उन्होंने हामी भर दी !

मैं चाय उन्हें कुछ देर अकेले बैठ गई !

सारी कहानी एक चित्रपट की तरह घूम गई!

रमाकान्त जी कमिश्नर होकर रिटायर हुए थे, और मेरे घर से आगे दूसरे ब्लाक में आए थे !

एक ही बेटा था सजल चौधरी, जो यहाँ के हॉस्पटल में डॉक्टर था !

पैसे जो न कराये, रमाकान्त जी अपने लाडले बेटे को बहुत प्यार से पाले थे, जब वह मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था, तो बेहद रुईस की तरह रहता था, कुछ दोस्त उसके उसी तरह मिल गये थे ! पैसे का ज्यादा मिलना, सजल को नशा की आदत में डाल दिया, कुछ दोस्तों के साथ वह मॉफिन का इंजेक्शन लेने लगा !

रमाकान्त जी बेटे की शादी एक गरीब परिवार की खूबसूरत लड़की से किए, नाम था रश्मि !

रश्मि निहायत खूबसूरत थी और सारे कार्यों में दक्ष! सास ससुर बेहद खुश !

सजल भी पत्नी से बेहद खुश था, लेकिन वह चुपके से नशा कर आता था !

यह बात रश्मि को जल्द ही पता लग गया, वह बातों-बातों में एक दिन हमसे उसकी चर्चा की, चूाँकि वह हमें एक सहेली के रूप में देखती थी !

मैं क्या कहती, लेकिन यह चिन्ता का विषय था !

अगर सजल नशा नहीं करता, तो वह विद्रोह कर बैठता था और घर का सामान तोड़ने लगता था !

रश्मि परेशान थी, छै महीने तो किसी तरह बीते पर इस नशे की आदत ने सजल की नौकरी ले ली, क्योंकि वह ज्यादातर डयूटी नहीं जाता था !

अंन्त में ये लोग बैंगलोर चले गये, जहाँ उनका अपना घर था !

एक साल बाद पता चला, सजल की मौत हो गई, चूाँकि हमारी घनिष्टता काफी थी, अतः हम दोनों रमाकान्त जी से मिलने गये !

माहौल बहुत गमगीन था, रश्मि इन दिनों सूख गई थी चिन्ता के मारे !

मैं उससे लिपट रोने लगी, दोनों बहुत देर रोते रहे !

दूसरे दिन हमें लौटना था, मैंने समय देख रमाकान्त जी से अकेले में कहा- चाचाजी !! एक बात कहूँ ?

हाँ ! कहो !

बुरा न मानियेगा ! रश्मि आपकी बहू है और बेटी भी, अभी जवान है, आप दोनों हैं, आपके बाद उसका क्या होगा ?

उसे समय देख कहीं अच्छे लड़के से शादी कर दें!

— क्या ?? यह हमारे समाज में नहीं होता !

मैंने कहा- चाचा जी !! बहुत बात नहीं हुुई,लेकिन आज हो रही हैं न ! मेरी बातों पर ध्यान देंगे !

दूसरे दिन मैं चली आई !

उन्होंने आवाज दी, तो मैं चौंक गई- आई !

उन्होंने कहा- क्या सोच रही थीं ?

मैंने कहा- कुछ नहीं… नियत समय पर हम लोग रश्मि की शादी के लिए चल पड़े !

मन खुशी से झूम रहा था, आज समाज में एक नई बात होने जा रही थी, लड़का भी इंजीनियर मिला था, पररवार भी अच्छा ! नाम था संयोग ! सच है अंधेरे के बाद रौशनी आती है !

घर में काफी रौनक थी, रमाकान्त जी काफी खुश थे, तपाक से हम दोनों को ड्राइंग रूम ले गये, स्वागत किया !

मैं अंन्दर चाचीजी और रश्मि से मिलने गई,चाचीजी भी खुश थीं और रश्मि तो हमारे गले लिपट गई !

बहुत देर बाद हम दोनों एक साथ बैठ गप्प करने लगे !

समय पे शादी सम्पन्न हुुई, लड़का बहुत बढ़िया मिला था ! मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया !

रमाकान्त जी ने बेटी की तरह बहू का ‘‘कन्यादान’’ किया !

दूसरे कदन विदाई का बेला आई तो रश्मि अपनी सास से लिपट कर रोने लगी- माँ !! मुझे भुलाइएगा नहीं !

नहीं बेटी ! बेटी को कैसे भूलेंगे !

रमाकान्त जी भी रो रहे थे, यह बेटे की याद थी या एक नये कार्य की खुशी !

तभी रमाकान्त जी ने एक लिफाफा बड़ा सा अपने दामाद को दिया, बेटा- ये रश्मि की जायदाद का हिस्सा है!

संयोग (दामाद) ने ससुर के हाथ पकड़ लिए, बाबा- आपने रश्मि को एक नया जीवन दिया, यह कम है क्या, मुझे कोई हिस्सा नहीं चाहिए !

रमाकान्त जी रोने लगे- अब हम क्या करेंगे, यह उसी का है !

सुंयोग- आज से मैं ही आपका बेटा हूँ! जब मुझे जरूरत होगी, माँग लूँगा अभी आप इसे रखिए !

मैं यह देख अलग रो रही थी, पति भी गमगीन हो गये !

रश्मि की विदाई के बाद दूसरे दिन हम लोग भी चले आये !

रश्मि से अभी भी बातें होती हैं, वह बहुत खुश है, एक बेटा और एक बेटी हुुई!

मैं आँखें बन्द कर एक सुखद दुनिया में खो जाती हूँ।

डॉ. मीरा सिन्हा

नई दिल्ली।

संगीत प्रभाकर, शास्त्रीय संगीत (प्रयाग महाविद्यालय)

सम्प्रति: शिक्षिका, पूर्व व्याख्याता, इंटर कॉलेज 2 सी, बोकारो !

 

कृतियाँ:

s Sorry Mistake ho gayee (एकांकी)

s लॉटरी (एकांकी)

s किरायेदार (एकांकी)

s महिला सम्मेलन (एकांकी)

s सीपी में मोती (कविता-संग्रह) 2023

  (द्वितीय संस्करण)

s स्मृतियाँ जाने अनजाने (कहानी-संग्रह)

 

कृतित्व व उपलब्धियाँ : s  विभिन्न सामाजिक कार्य लगभग 35 वर्ष s भारत विकास परिषद, बोकारो संस्था में 22 वर्ष कार्य s साहित्य एवं संगीत की संस्था ‘‘संस्कार भारती’,  बोकारो में 25 वर्षों तक कार्य s महिला समिति, बोकारो के लिए 21 वर्षों तक कार्य  s अनेक कार्यक्रमों के लिये प्रसिद्ध एकांकी लेखन व निर्देशन का कार्य s वयस्क शिक्षा ‘‘महिला समिति’’में 3 वर्षों तक कार्य प्रभारी s चित्रगुप्त महापरिवार, बोकारो स्टील सिटी में अध्यक्ष पद पर 10 वर्षों तक पदभार, s ‘‘बसेरा, ‘‘स्मृति’,  ‘‘प्रखर-वाणी पत्रिकाओं का सम्पादन ! s बोकारो कवि सम्मेलन में शाल एवं प्रशस्ति पत्र द्वारा सम्मानित  s  तानसेन पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र से सम्मानित, स्थानीय, (बोकारो) !

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रोटी का धर्म

कथा- कहानी

रोटी का धर्म

पीयूष अवस्थी

             रजिया अब पचपन बरस पार कर चुकी थी,काले सफेद बालों की खिचड़ी सर पर झलकने लगी थी ! तीखे नयन नक़्श देखकर लगता था कि वह जवानी में अत्यंत सुन्दर रही होगी !

            कुछ महीने पहले अपने शौहर के इंतकाल के बाद ,रजिया ख़ुद को अकेला महसूस करने लगी थी,उसके चेहरे की चमक गायब हो चुकी थी, आँखों के नीचे कालिमा गहरा गई थी, माथे पर सलवटें पड़ने लगी थीं !

             रजिया के दो बच्चे थे एक अनवर जो अब लगभग 15 बरस का था और एक बेटी शबाना जो 12 साल की थी ,दोनों स्कूल जाते थे, रजिया आठवीं तक पढ़ी थी, उसने सोच रखा था जैसे भी वह अपने बच्चों को बड़े स्कूल तक पढ़ायेगी !

           उसके पति एक ब्रश कम्पनी में काम करते थे,अच्छे कारीगर थे, आमदनी भी ठीक थी,उसपर वह ओवरटाइम करके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, स्कूल- फीस का पुख़्ता इंतजाम कर लेते थे, रजिया भी मेहनती थी, घर का सारा काम करना, बच्चों को तैयार कर टिफिन के साथ स्कूल भेजना, पति को सुबह का नाश्ता और काम पर जाने के लिए टिफिन आदि लगाना, कपड़े धोना ,घर की साफ-सफाई करते कब दिन निकल जाता ,उसे पता नहीं चलता, पति उसे प्यार से रज्जो बुलाते थे, इसलिए पड़ोस के लोग भी उसे रज्जो ही बुलाते थे !

            रजिया जिस बस्ती में रहती थी वहाँ अधिकतर हिन्दुओं की बस्ती थी,वातावरण और माहौल ने उसे हिन्दू औरतों की तरह जीना सिखा दिया था, आस-पड़ोस की औरतों से उसकी हँसी- ठिठोली चलती रहती थी, अधिकतर सब उसे रज्जो बुलाती थीं, बगल में सक्सेना चाची ,सामने निगम साहब की बहू पुष्पा और बहुत से घरों में उसका आना जाना था, पड़ोसिन चाची तो उसे मसाले कुटवाने को बुला लेती थीं, सबके साथ उसे होली दीवाली मनाना खूब अच्छा लगता था ,जब किसी रिश्ते-नाते में जाना होता ,तभी वह बुर्का पहनती थी ,वरना धोती और सलवार सूट उसके पसंदीदा पहरावे थे ! सभी रज्जो की तारीफ करते थे, महल्ले के बुजुर्गों का उसे खयाल रहता था ,उसके सर से दुपट्टा नहीं गिरता था, कोई देखकर नहीं कह सकता था कि वह हिन्दू है या मुसलमान ,उसके पति भी खुशमिजाज थे , उनमें कोई धार्मिक कट्टरता की भावना नही थी ! सबसे दुआ सलाम, नमस्ते करना उनकी आदत में शुमार था !

            अचानक पति की मौत ने उसे झकझोर दिया था, धीरे-धीरे तीन महीने बीत गये और अब उसे घर चलाने,बच्चों को पढ़ाने की चिन्ता सताने लगी, जो कुछ थोड़ी जमा पूँजी थी वह भी ख़त्म होने की कगार पे थी ! आँगन की दीवार पर पीठ टिका वह आसमान ताके जा रही थी, जैसे अल्लाह से पूछ रही हो “ऐसा क्यों किया ?”

            सोचते-सोचते अचानक बड़बड़ाई -नहीं ! मैं नहीं हारूँगी ! अपने बच्चों को पढाऊँगी, काम करूँगी, मेहनत मजदूरी करूँगी !

            उसके घर से थोड़ी ही दूर बहुत अपार्टमेंट बने थे ,सोसाइटी में लोग रहते थे ,उसके महल्ले में यादव जी रहते थे जो किसी सोसाइटी में ठेकेदार थे ,यादव जी की पत्नी से उसकी अच्छी दोस्ती थी, वह यादव जी के घर जाकर उनसे बात कर आई ” भाई साहब ! आप तो जानते ही हैं, बड़ी मुश्किल में हूँ , आपकी सोसाइटी में खाना बनाने का काम ही दिलवा दीजिये !

रजिया खाना बनाने में बहुत होशियार थी,उसे खाना बनाना अच्छा भी लगता था खूब मन लगता था, एक सप्ताह में ही उसे दो घरों में खाना बनाने का काम मिल गया था ! यादव जी उसकी जिम्मेदारी ली थी,उसका नाम उन्होंने ‘रज्जो’ ही बताया था ,कहा था मेरे गाँव-पड़ोस की है !

            लोगों को उसका व्यवहार और खाना बेहद पसंद आने लगा था ,लेकिन सिर्फ दो घरों के काम से उसे कुछ राहत तो मिली लेकिन अभी भी तंगी कायम थी,वो और घरों में भी काम ढूँढने लगी, उसने गार्ड से भी कह रखा था,किसी को ज़रूरत हो तो मुझे बता देना !

            अभी डेढ़ महीना ही हुआ था कि एक दिन अचानक जिनके घर खाना बना रही थी, एक छोटे बच्चे ने काँच की कटोरी फर्श पर फेंक दी, काँच चारो तरफ बिखर गया था, रज्जो चौंक गई, उसने जल्दी से बच्चे को गोद में उठा लिया और उसके मुँह से- “हाय अल्ला” निकला ,तब तक आवाज सुनकर बच्चे की दादी भी किचेन में आकर खड़ी हो गई थीं, उन्होंने रज्जो के मुँह से निकला ” हाय अल्ला” सुन लिया था,

वह जोर से चिल्लाते हुये बोलीं- चल पहले काँच साफ कर” रज्जो जल्दी से झाड़ू ले काँच साफ करने लगी,दादी के चेहरे पर गुस्सा तमतमा रहा था !

            तो —तू मुसलमान है ,पहले बताया क्यों नहीं?

           माँ जी ! आपने पूछा नहीं, मैं तो नहा धोकर, साफ सुथरी होकर आती हूँ, खाना भी मन से बनाती हूँ !

              बनाती होगी ! लेकिन “ओम नमो नारायण” हम लोग हिन्दू है और तू मुसलमान, सारा पूजा-पाठ बेकार कर दिया, जा कल आकर अपना हिसाब ले जाना, अभी से तेरा काम ख़तम !””

            रज्जो रुआँसी हो गई ,उसने पलटकर कुछ नहीं कहा ,वह फ्लैट से बाहर निकल आई ! जोर से दरवाज़ा बन्द होने की आवाज़ सुनाई दी ! दूसरे घर तक भी यह बात पहुँचने में देर नहीं लगी, रज्जो समझ गई थी अब सोसाइटी में काम मिलना मुश्किल है,रोज किसी न किसी बहाने डाँट खाना है ,और अब मुसलमान का ठप्पा भी ! वह आँसुओं को बार-बार पोछती पैदल अपने घर की तरफ चल दी !

           घर पहुँच कर वह निढ़ाल सी चारपाई पर औंधे मुँह लेट गई ,कुछ देर सिसकियाँ लेती रही, बच्चों की आवाज़ सुनते ही उसने खुद को संभाला, आँसू पोछकर सामान्य सी हुई और गुसलखाने में जाकर मुँह धोया ! यह सारे ख़याल उसने मन से झटक दिए, कहीं मुझे उदास देख बच्चे न मायूस हो जायें ! बच्चों को नाश्ता खाना खिलाकर फिर वह अपने काम पर लग गई !

          अब उसने सोसाइटी जाना छोड़ दिया था, बच्चों ने पूछा तो उसने कह दिया– सब लोग बाहर गए हैं अभी छुट्टी है जब आ जाएंगे तो काम पर जाऊँगी !

बच्चे तो बहल गये लेकिन अपने मुसलमान होने की कीमत जो उसे चुकानी पड़ी वह उसके मन को बार-बार टीसती रहती ! इसी तरह लगभग एक महीना बीत गया !

         तभी अचानक एक दिन उसकी फूफी घर आई हालचाल लेने !

           अरे —!फूफी आप !! उसका चेहरा खुशी से खिल उठा ,वह दौड़कर फूफी से लिपट गई, खुशी के मारे उसकी आँखें छलछला आईं !

           फूफी उसी शहर में करीब दस किलोमीटर दूरी पर रहती थी ! रज्जो और फूफी के नज़दीकी रिश्तों के साथ सगी बहनों जैसी मजबूत दोस्ती भी थी ,किसी सहेली की तरह ही दोनों अपने दुख-सुख बाँटती थीं !

          रजिया जल्दी से चाय बना लाई, साथ में कुछ नमकीन भी ! फूफी –चाय ! थक गई होंगी !

           अरी रज्जो ! अब थकान कहाँ, काम में लगी रहती हूँ, घर में सब अच्छा चल रहा है,खुश हूँ, बच्चे भी पढ़ाई कर रहे हैं और मेरे काम में हाथ भी बटा लेते हैं,बड़े वाले लड़के ने कम्प्यूटर की पढ़ाई पूरी कर ली थी उसे अच्छी नौकरी मिल गई है,कुछ अलग से भी काम घर पर कर लेता है, घर में बाकी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का ख़याल रखता है !

           तेरा चेहरा क्यूँ उतरा-उतरा है, तेरा हाल भी नहीं मिल पाता, अबकी आऊँगी तो तेरे लिए एक फून भी लेती आऊँगी ,तुझसे बात करने का बहुत मन करता है !

          अब बता क्या बात है ? सुना था कुछ काम मिल गया है ,कैसा चल रहा है ?फूफी ने बहुत आत्मीयता से उसके सर पर हाथ फिराकर पूछा !

           रजिया की आँखों में आँसू तैर गये, क्या बताऊँ फूफी—- शुरू होने से पहले ही ख़तम हो गया, दो घरों में खाना बनाने का काम मिला था, पूरे मन से काम कर रही थी,फिर भी वो किसी न किसी बहाने डाँटते रहते थे ,कल नमक कम था,तीखा ज़्यादा हो गया,फिर भी मैं कहती ध्यान रखूँगी, खामोशी से अपना काम करती थी ! फिर उसने फूफी की सारी कहानी सुनाई —-! फूफी भी उसकी बातें सुनकर दुखी हो गई !

        फूफी के मन में दुख के साथ गुस्सा भी था ,बोलीं—-अरे तो क्या ! मुसलमान होना कोई गुनाह है क्या ? हमारे पुरखे भी किसी ज़माने में हिन्दू थे, कितने मुसलमान हैं जो पहाड़ों में बने मन्दिरों पर काम करते हैं, सामान ढोते हैं ,सवारियाँ ढ़ोते हैं,होटलों में खाना पकाते हैं ,परोसते हैं, उन्हें तो अपनी सुविधा के लिए कोई कुछ नहीं कहता —हुँ–ह ! अपनी मजबूरी हो तो कोई जात-पात नहीं !

        तू घबरा मत रज्जो ! अभी तेरी फूफी जिंदा है, सब ठीक हो जाएगा !

         मगर—कैसे !  रज्जो ने पूछा ! वह मायूसी से बोली घर का खर्च चलाना है, दो बच्चे हैं, बच्चों को पढ़ाना है,नहीं तो जाहिल बनेंगे, गलत हाथों में पड़ेंगे, मजदूरी करेंगे ! रज्जो सिसकियाँ ले रोने लगी !

        फूफी ने उसे अपनी बाहों में समेट लिया ! फूफी ने उसके आँसू पोछे –चुप कर पगली ! तू तो मेरी हिम्मती रज्जो है- मेरी बेटी है ,मेरी सहेली है ,तू है तो मेरा मायका है ,तेरे सिवा कौन है मेरा !

        मुझे देख दस बरस पहले तेरे फुफ्फा छोड़ गए,तेरे दो बच्चे हैं, मेरे तो छै बच्चे हैं ,और तब तो सभी बहुत छोटे थे ,किसी ने कोई मदद नहीं की, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी ,अब सब पढ़ाई कर रहे हैं, नौकरी भी ! अब अपना मकान भी पक्का हो गया है, अब बड़की बिटिया की शादी भी तय हो गई है अच्छे घर में,जल्दी ही वह भी जिम्मेदारी पूरी कर लूँगी !

         आपने ये सब कैसे किया फूफी ?

             अब गौर से सुन मेरी बात–दूसरे घरों में काम करेगी, डाँट भी खाएगी और पैसा भी कम मिलेगा ! तू अपना खुद का काम कर !

           अपना काम —मगर कैसे ?

           अरे ! जो मैं दस साल से कर रही हूँ, अब तो सबीना और सलाम भी संभाल लेते हैं, खूब अच्छी कमाई हो जाती है, बस थोड़ी सी मेहनत है ! और वैसे भी तुझे कुछ तो करना ही होगा !

              मगर—किस तरह !! रज्जो ने झिझकते हुए पूछा !

           कुछ नहीं ! मैं सुबह उठती हूँ, सब्जी मंडी जाती हूँ, मंडी से सब्जी लाकर उसे घर पर ही खूब साफ करती हूँ, फिर ठेली में लादकर पड़ोस के अपार्टमेंट के कोने में जहाँ और भी दुकानें लगती हैं,वहीं दुकान लगाती हूँ, अब तो मुझे सब पहचानते हैं,मैं बहुत ज़्यादा सामान नहीं लाती, ताज़ी सब्जियाँ लाती हूँ, शाम तक थोड़ा बहुत ही बचती हैं, वो वापस ले आती हूँ ! सब पैसा नगद और पेटीएम पे आता है,बड़े लड़के शाहिद ने सब बैंक से करा दिया है, शाम को वही सारा हिसाब मिला लेता है ,और अब तो मैं भी सीख गई हूँ !

           लेकिन मैं—मैं तो बाहर बाज़ार में ! कैसे बेचूँगी ? कैसे सामान लाऊँगी ! रजिया ने मायूसी से कहा !

           चल पगली—-अब ज़माना बदल गया है ! तू बुर्का पहनकर सब्जी बेचेगी क्या ? जैसा तेरा पहरावा है ऐसे ही जा ! अरी तू तो इतनी सुन्दर है लोग तुझे ही देख सब्जी खरीदने आ जायेंगे, फूफी ने ठिठोली करते कहा, रज्जो को भी हँसी आ गई !

          मैं खुद दो-चार दिन तेरे साथ तेरी दुकान पर बैठूँगी, कैसे सामान बेचती हूँ–देखती रहियो, सब सीख जाएगी और तेरी झिझक भी ख़तम हो जाएगी !

         लेकिन फूफी —सामान कैसे लाऊँगी—-मेरे पास तो —!

         मैं जानती हूँ ,घबरा मत, मैं तेरी फूफी ही नहीं तेरी सहेली भी हूँ, और फूफी ने अपने पर्स में हाथ डालकर पाँच हज़ार रुपये रज्जो की हथेली पर रख दिये, रख ले–कम पड़ेंगे तो और दे दूँगी !

         अरे ! ये क्या फूफी ! आप तो वैसे भी मदद करती रहती हैं, अब ये—-! रज्जो असमंजस में पड़ गई !

         फूफी बोली-ज़्यादा परेशान मत हो,जब तेरा काम चलने लगे तो धीरे-धीरे मुझे वापस कर देना ! अब मैं सत्तर साल की हो गई हूँ, तेरे सिवा मेरा मायके में कौन है, तू ही मेरा परिवार है, छोटी बहन की तरह है, रख ले !

          कल इतवार है, बच्चों की छुट्टी भी है, सुबह रिक्शा कर घर आ जाइयो, साथ में मंडी चलेंगे, तेरी सबसे पहचान भी करा देंगे, अब बहुत आढ़ती मुझे जानते हैं, तुझे भी ध्यान से सौदा देंगे !

          और तबसे यह सिलसिला चल रहा है, कोई नहीं पूछता कि तुम हिन्दू हो या मुसलमान ! अब धीरे-धीरे वह सबके लिए “ताई” हो गई थी ,कोई उसे अब रजिया या रज्जो नहीं बुलाता था ! अधिकतर सब नये ज़माने के लड़के-लड़कियाँ आते थे, उसकी साफ सुथरी सब्जी और उसका व्यवहार देखकर सब उसे ‘ताई’ पुकारने लगे थे ,ताई सुनकर उसे अपनत्व सा लगता था, वह खरीदी हुई सब्जी के साथ अलग से धनिया मिर्चा देना नहीं भूलती थी ! इन्ही बातों से उसका व्यापार चौगुना हो गया थी, बराबर भीड़ बनी रहती थी, दोपहर के समय जब भीड़ कम होती तो वह शबाना या अनवर को दुकान पर बैठा, घर जाकर अधूरे काम भी कर आती थी, बेटा अब इंटर में पढ़ाई कर रहा था और बेटी शबाना नवीं कक्षा में थी !

          आजकल के बच्चे होशियार हो गये हैं ,बेटे अनवर ने एक फोन माँ को दिला दिया था और उसपर पेटीएम भी ! अब उसे थोड़ा-थोड़ा चलाना भी आ गया था, उसको लेन-देन में बहुत आसानी हो गई थी !

          एक दिन रज्जो जिस घर में खाना बनाने का काम करती थी ,उसकी बहू और बेटा भी उसकी दुकान आ पहुँचे !

          टमाटर कैसे दिए ?

          रज्जो ने सर उठाकर देखा, अरे ! ये तो बहू जी हैं ,उसने कहा—नमस्ते बहू जी !

          अब सब्जी बेचती हूँ, वो भी बाजार में सबसे अच्छी वाली,इसमें मुसलमानी सब्जी कोई नहीं है, सब किसान की है, उसने हँसते हुए कहा !

           अरे –न ताई ! वो तो माँ जी हैं पुराने ख्यालों की ! अब से हम यहीं से सब्जी ले जाया करेंगे !

           रज्जो ने सब्जी तौल दी ,और अलग से बहुत सारा धनिया व मिर्चा डाल दिया ! उन्होंने पैसे चुकाए और नमस्ते करके चले गए ! फिर वह एकपल के लिए मुसलमान हिंदू के जुमले पर खो गई ! यह बात उसके ज़हन में गहरे से बैठ गई थी जो टीस बनकर उभरती रहती थी ,उसे आज कुछ खुशी सी महसूस हुई !

           धीरे-धीरे वक़्त अपनी रफ़्तार पकड़ता गया,फूफी अक्सर उसके पास आकर हालचाल लेती रहती थी, और फोन पर अक्सर बातें होती रहती थीं, फूफी को देखकर उसका मन गदगद हो जाता !

          इस तरह उसे काम करते पाँच बरस बीत गये !दोनों बच्चे पढ़ाई में होशियार निकले, आगे की पढ़ाई जारी थी, घर भी सुंदर हो गया था, घर में दरवाजे खिड़कियों पर नये परदे लहरा रहे थे और एक रंगीन टी.वी. कमरे की दीवार पर टँग गया था ! धीरे-धीरे उसने फूफी के पैसे भी लौटा दिए थे ! अब बस उसकी तमन्ना थी उसके बच्चे पढ़ लिखकर कोई अच्छी सी नौकरी पा जायें, उसका जीवन सफल हो !

          रोजमर्रा की तरह आज फिर सुबह मंडी जाकर सब्जी खरीद लाई थी, सब्जियाँ धोकर उसने ठेले पर रख दी थीं, फिर घर की सफाई, बच्चों का नाश्ता व टिफिन तैयार कर बाज़ार जाने के लिये तैयार हो गई !आज इन्हीं कामों में घ्यान बंटने से उसका दूध जल गया था और उबलने से उसकी गैस और भगौना भी बेहद गन्दा हो गया था, उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था, मन खिन्न था ,फिर भी उसे काम पर तो जाना ही था, बच्चों के कॉलेज जाते ही वह भी ठेली लेकर बाजार की ओर चल दी !

          रजिया ने फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे अपना ठीया बना रखा था, उसने चारो कोने पर बाँस गाड़कर उसने अपनी जगह पक्की कर ली थी, बाँसों के ऊपर से तिरपाल बाँध लेती थी जिससे धूप न लगे और सब्जी खराब न हो ! रोज सुबह की तरह आज भी रज्जो की दुकान आठ बजे सज गई थी !

         सुबह दुकान खुलते ही गुप्ता पालीथिन के पैकेट समय पर दे गया था, उसके मायके में पालीथिन बैग को “मोमिया” कहा जाता था, वह भी पालीथिन लिफाफे को मोमिया ही कहती थी !

          अरे –! गुप्ता जी ! कल बड़ी वाली मोमिया और दे जाइयो !

          जी–रज्जो बहना ! कल ले आऊँगा !

         ग्राहक आने शुरू हो गए थे, रज्जो ने एक पड़ोस के लड़के राजू को अपने काम पर रख लिया था, जिससे रज्जो को बहुत सहूलियत हो गई थी, रामू सामान तौलकर पालिथिन में भरता रहता था ,रज्जो सामान का मिलान कर पैसे जोड़कर ग्राहक को बताकर पैसे ले लेती ! कई परिचित चेहरे आते रहते,उनसे मुस्कुराकर हाल-चाल पूछती और महँगी हो गई सब्जियों पर ताने भी मारती रहती !

         क्या करूँ बाऊजी ! बहुत महँगी अदरक और लहसुन है इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाती हूँ !

         इसी तरह दोपहर के एक बज गये, गर्मी के कारण दोपहर में भीड़ कम हो गई थी, पेड़ की छाया उसे बहुत सुकून देती थी , उसने राजू से कहा- सब्जी पे पानी छिड़क दें ,बोरी से ढाँक भी दे !

         दोपहर हो गई थी अब उसे भूख लग आई थी,खाने की याद आते ही उसे दूध जल जाने की याद आई, आज फिर दूध लेना पड़ेगा और भगौना भी कितना काला हो गया !

         ताई !आप भी खाना खा लो, मैं भी अभी घर से खाकर आता हूँ ! राजू ने कहा

         ठीक है ! जल्दी आ जाइयो ! मैं भी खा लेती हूँ !

         राजू चला गया, रज्जो ने अपने झोले से अपना टिफिन निकाला और उसने खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसे ध्यान आया, उसने हाथ तो धोया ही नहीं ! कोने में रखी बाल्टी से जाकर हाथ धोने लगी—!

          रज्जो हाथ धो ही रही थी कि उसे जोर की आवाज़ में ” ताई ! ताई ! की आवाज सुनकर वह चौंक पड़ी !

         ताई ! वो–वो टिफिन ले गया ,टिफिन उठा लिया

         टिफिन ? किसका टिफिन ? उसने अपने टिफिन की तरफ देखा, टिफिन वहाँ नहीं था ,अरे—कहाँ गया ?

        बगल वाले दुकानदार की आवाज़ आई –अरे रज्जो बहन ! वो बन्दर उठा ले गया, पेड़ पर चढ़ा है !

       उसने सर उठाकर पेड़ की तरफ देखा,एक बन्दर उसका टिफिन हाथों में थामे था !

        अरे –नासपीटे ! छोड़ मेरा टिफिन !!

        वो बन्दर रज्जो की तरफ काटने की मुद्रा में खो-खों करने लगा !

        रज्जो ने नीचे पड़ा बेंत उठाया, जो उसने आवारा, गाय, सांडों को भगाने के लिए रखा था, उसने बेंत बन्दर की तरफ लहराया ,वो बन्दर पेड़ से कूदकर फुटपाथ की तरफ भागा !

         रज्जो भी बेंत लिए उसकी तरफ भागी ! छोड़ मेरा टिफिन—छोड़ !

          बन्दर एक पेड़ से दूसरे पेड़ की तरफ भागने लगा ! जब तक रज्जो वहाँ पहुँची वह उस पेड़ से कूदकर दूसरे पेड़ की तरफ भागा ! रज्जो भी डंडा लहराते हुए उसके पीछे भाग रही थी और जोर-जोर से चिल्ला भी रही थी —नासपीटे ! जहन्नुम जाएगा, मुसलमान की रोटी खायेगा, तेरा धरम भृष्ट हो जाएगा !अरे पापी हनूमान तेरे को सज़ा देंगे ! छोड़ मेरा टिफिन- छोड़ मेरा टिफिन —-!

          रज्जो दौड़ते- दौड़ते हाँफ गई थी, थककर रुक गई, उसका गला सूखने लगा था और बन्दर –पेड़ों की ओट में कहीं खो गया था ! उसका गुस्सा देख कुछ को मुस्कुराहट भी आ गई थी, और दयाभाव भी !

         वह निराश होकर थके-हारे क़दमों से अपनी दुकान की तरफ चल दी ! कमबख़्त –टिफिन ले गया—–जहन्नुम में जायेगा ! हिन्दू होकर मुसलमान का खाना खाता है, वह बड़बड़ाती हुई अपनी दुकान की तरफ बढ़ ही रही थी कि उसे अपनी दुकान के पहले एक पेड़ के नीचे सर पर गमछा बाँधे एक भिखारी जैसा बूढ़ा आदमी दिखाई दिया ,जो बड़े मजे से खाना खा रहा था, ऊँगलियाँ चाट कर खाना खा रहा था !

        रज्जो ने दुबारा गौर से देखा ,ये तो उसका टिफिन है , ऐ–बाबा ! ये तो मेरा टिफिन है !!

        भिखारी ने उसकी तरफ देखा भी नहीं ,कौर तोड़कर फिर खाने लगा !

        रज्जो ने गुस्से से छड़ी ज़मीन पर पटकी” सुनाई नहीं देता क्या–? ते तो मेरा टिफिन है !

        अब बाबा ने उसकी तरफ देखा ,बोला–हाँ–बहना ! ये अभी तक बन्दर का था, उसके हाथ से छूटा मेरी गोद में गिरा, दो दिनों का भूखा हूँ, मुझे लगा भगवान ने भेजा है ,बड़ा अच्छा खाना बनाती हो बहना !!

         तुम हिंदू हो -राम-नाम की गमछी बाँधे हो–मैं मुसलमान हूँ तुम्हारा धरम भ्रष्ट हो जायेगा ! रज्जो का लहज़ा इस बार कुछ नर्म था !

         हुँ—ह !! क्या बहना ! रोटी का भी कोई धर्म होता है ! अन्न का कोई धर्म नहीं होता, न ही भूखे का ! कहते हुए भिखारी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी !

        उसकी बात सुनकर रजिया को जैसे होश आया ! यह ज्ञानी है इसने सही बात की है ,हिन्दू -मुसलमान, धरम मजहब सब गलत ! सब गलत ! इंसानियत ही सच्चा धरम है !

          रोटी का कोई धरम नहीं ! उसके मन की सारी कुंठाएँ जैसे गायब हो गई थीं ,उसके चेहरे पर एक विजयी चमक थी,एक चुभी फ़ांस उसके दिल से निकल गई थी !

         उसने भिखारी की तरफ मुस्कुराकर देखा, बोली—बाबा ! आप पूरा खाना खा लो ,मेरी पास में दुकान है,टिफिन मुझे दे देना ,कल से आपके लिए भी चार रोटियाँ लेकर आया करूँगी !

         रजिया को लगा उसका पेट भर गया है ,एक अनोखी सी खुशी उसके दिल मे समाई थी ! वह मुस्कुराती हुई अपनी दुकान की तरफ चल दी !

***    • पीयूष अवस्थी

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रिटर्न गिफ्ट​

कथा- कहानी

रिटर्न गिफ्ट

मीता लुनिवाल "मीत"

                    सोनू और आरव बहुत अच्छे दोस्त थे वो दोनों साथ पढ़ते थे दोनों ही पढ़ाई में अच्छे थे पर आरव एक खानदानी रईस का लड़का था जिसे किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी जबकि सोनू एक मेडिकल की दुकान में काम करने वाले प्रकाश का बेटा था जो की सामान्य घर से था।

सोनू आरव एक छोटे से गांव में रहते थे जहां बस एक ही मेडिकल की दुकान थी जिस पर प्रकाश काम करता था और एक छोटा सा हॉस्पिटल जिसमे भी एक ही डॉक्टर रहता था छोटा सा बड़ा सुंदर सा गांव था ज्यादा जनसंख्या भी नहीं थी ज्यादा पढ़े-लिखे लोग भी नहीं रहते थे पर वह सब चाहते थे कि उनके बच्चे बहुत पढ़े।

एक बार आरव का जन्मदिन था उसके माता-पिता ने बहुत बड़ी पार्टी रखी थी आरव ने अपने स्कूल के सभी दोस्तों को बुलाया था और सोनू को भी , सोनू यही सोचता रहा कि आरव को जन्मदिन का क्या तोहफा दिया जाए बहुत सोचने के बाद आरव ने अपने माता-पिता से बात करी वह दोनों भी सोचने लगे तभी आरव की मां बोली की बेटा मैंने यह स्वेटर तुम्हारे लिए बनाया है आज ही बनकर तैयार हुआ है पर यह तुम अपने दोस्त आरव को दोगे तो उसे अच्छा लगेगा प्रकाश और सोनू यह सुनकर खुश हो गए और सोनू ने कहा हां मां यही अच्छा रहेगा यह स्वेटर बहुत सुंदर भी है कल आरव आया था जब आप स्वेटर बना रही थी तो उस को ये पसंद भी आया था।

वैसे प्रकाश इतना कमा लेता था कि वह खुद की और अपनी पत्नी का और अपने बच्चों की देखभाल कर सके पर उसके माता-पिता की जिम्मेदारी भी प्रकाश के ऊपर ही थी और उसके माताजी ज्यादा बीमार रहती थी उसकी दवाइयां का खर्चा बहुत ज्यादा था इलाज भी शहर में कराना पड़ता था। जिससे उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। 

आरव का जन्मदिन बहुत ही धूमधाम से मनाया गया स्कूल के सभी शिक्षक प्रधानाचार्य और स्कूल के काफी सारे बच्चे और गांव के बहुत से लोग शामिल हुए थे बहुत धूमधाम से देर रात तक पार्टी चली और जन्मदिन अच्छा मनाया गया सब ने बहुत बड़े-बड़े अच्छे-अच्छे तोफे दिए सोनू भी स्वेटर लेकर गया था फिर आरव ने सबको रिटर्न गिफ्ट के रूप में सब बच्चों को रिमोट वाली कार दी जो की काफी महंगी थी रिटर्न गिफ्ट मिलने पर सभी बच्चे बहुत खुश हो गए । जब पार्टी खत्म हो गई सभी अपने-अपने घर चले गए तब आरव अपने माता-पिता दादा दादी के साथ मिलकर गिफ्ट देखने की जिद्द करने लगा सब ने एक-एक करके बहुत से गिफ्ट देखे अच्छे-अच्छे गिफ्ट आए थे जब सोनू का गिफ्ट आया तो खोलते ही आरव बहुत खुश हुआ इतना सुंदर स्वेटर यह तो मुझे बहुत पसंद था आरव ने झट से वह स्वेटर पहन कर सबको दिखाया उसकी मां दादी और दादाजी भी खुश हुए पर उसके पिताजी को पसंद नहीं आया वह वैसे भी आरव और सोनू की दोस्ती से खुश नहीं थे वह आरव को हमेशा समझाते थे कि बराबर के लोगों से दोस्ती रखो पर वह सुनता ही नहीं था उसे सोनू की दोस्ती बहुत पसंद थी। 

कुछ समय बाद सोनू का भी जन्मदिन आया उसने भी अपने दो चार दोस्तों को बुलाकर एक छोटी सी पार्टी रखी सब ने गिफ्ट दिए और आरव ने तो उसे बहुत सारे गिफ्ट दिए जिसे वह अपनी मां के साथ बाजार से लेकर आया था जिन्हे प्रकाश लेना भी नहीं चाहता था पर आरव नहीं माना सोनू ने सबको रिटर्न गिफ्ट में छोटे-छोटे गमले में छोटे-छोटे पौधे बांटे क्योंकि उसके दादाजी की एक छोटी सी नर्सरी थी जिसमें पौधे तैयार करते थे पार्टी खत्म हुई सब अपने घर चले गए आरव जब घर पहुंचा तो पिताजी ने कहा की रिटर्न गिफ्ट क्या दिया तो आरव ने कहा एक पौधा दिया है छोटे से गमले में जिसे मैं अपने गार्डन में लगाऊंगा आरव के पिता हंसने लगे की कोई पौधा भी दिया जाता है कंजूस कहकर अपने कमरे में चले गए। पर आरव बहुत खुश था उसने दूसरे दिन सुबह उठते ही माली के साथ उस पौधे को अपने बगीचे में लगाया माली ने बताया यह आम का पेड़ है और बहुत अच्छी किस्म का लगता है सोनू के दादाजी बहुत अच्छे पौधे तैयार करते हैं उनके तैयार हुए पौधे में अच्छे फल फूल आते हैं यह माली काका ने आरव को बताया।

एक समय गांव के सरपंच की बेटी की शादी थी जिसमें गांव के बहुत से लोग पास के शहर में जहां सरपंच ने शादी रखी थी वहां गए हुए थे उसमें आरव के माता-पिता भी गए थे पर आरव की परीक्षाएं होने के कारण वो नहीं गया था और ना ही सोनू के घर से कोई गया था क्योंकि सोनू की दादी की तबीयत भी ठीक नहीं थी इसलिए कोई भी नहीं गया।

करीब रात के 12:00 बजे आरव अपने एक नौकर के साथ सोनू के घर आया और कहा मेरे दादाजी की तबीयत बहुत खराब है और डॉक्टर साहब भी यहां नहीं है शादी में गए हैं पापा मम्मी भी नहीं है आसपास कोई भी नहीं है तब प्रकाश अपना बैग लेकर आरव के घर गया जिसमें वह कुछ इंजेक्शन दवाइयां वगैरह सब रखता था वह गया उसने दादाजी का चेकअप किया उन्हें दवाइयां देकर उन्हें अस्थमा अटैक आया था उनके इंजेक्शन वगैरा लगाए पूरी रात वहीं रहा सोनू भी उनके साथ था सोनू आरव भी वहीं बैठे रहे।

सुबह जब आरव के माता-पिता आए उन्हें सारी जानकारी हुई तब डॉक्टर साहब भी साथ में आए थे क्योंकि नौकर ने शहर में उन्हें फोन कर दिया था डॉक्टर ने आकर दादाजी को देखा और प्रकाश से बात की क्या-क्या दवाइयां दी है फिर डॉक्टर ने आरव के पिताजी को बताया की आपके पिताजी अब बिल्कुल ठीक है अगर समय पर प्रकाश आकर उन्हें नहीं देखता तो कुछ भी हो सकता था प्रकाश एक बहुत समझदार और अच्छी जानकारी रखने वाला इंसान है अब के पिताजी ने हाथ जोड़कर प्रकाश का शुक्रिया किया उनकी आंखें भर आई थी और उनसे माफी भी मांगी आप इतने अच्छे इंसान हैं और मैं आपको हमेशा नीचा दिखाता रहा। अब उसे सोनू और आरव की दोस्ती पर कोई आपत्ति नहीं थी वो समझ गए थे कि इंसान पैसों से छोटा बड़ा नहीं होता है।

समय बदला आरव और सोनू बड़े हो गए और आरव का लगाया हुआ रिटर्न गिफ्ट आम का पौधा भी बड़ा हो गया और उसमें आम लगने लग गए थे सोनू और आरव आम खाते और गुठलियों भी लगा देते थे धीरे-धीरे बहुत सारे आम के पौधे हो गए जब दोनो बड़े हो गए तो उसने आम को अपना व्यापार बना लिया उसके बहुत सारे पौधे हो गए थे अब सोनू और आरव दोनों मिलकर आम का ही कारोबार करते थे अब आरव ने सोनू को अपना पार्टनर बना लिया था आज आरव के पिताजी कहते थे यह होता है रिटर्न गिफ्ट मैं तो इसे मामूली समझता था पर यह तो बहुत बड़ा रिटर्न गिफ्ट मिला।

– मीता लुनिवालमीत

जयपुर, राजस्थान

 

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गूलर के फूल

कथा- कहानी

गूलर के फूल

नंदन पंडित

विमल ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था।

“हेलो!” उधर से पत्नी की बिलखती हुई आवाज आई।

वह एक जूते का फीता बाँध चुका था। दूसरे जूते का फीता अज्ञात भय से उसके हाथ से छूट गया। काँपते हुए उसने कहा, “हाँ, कहो नीलम? क्या बात है?”

“म् म् मम्मी..।”

“हाँ हाँ मम्मी.. बोलो क्या हुआ?”

“मम्मी नहीं रहीं!” 

“क्या?” उसके श्रवणेन्द्रिय में जैसे किसी ने फेवीकोल डाल दिया हो। फोन चिपक गया कानों से, हाथ वहीं रुक गया। सम्पूर्ण शरीर जड़वत हो गया।

बड़ी मुश्किल से थोड़ी देर बाद स्वयं को संभालकर उसने प्रश्न किया, “कब?”

दूसरी ओर रुलाई अब भी जारी थी।

“सम्हालो स्वयं को।”

“क्या करूँ विमल, हृदय में धीर ही नहीं बँधता है।” नीलम कठिनता से बोल पाई।

“शाम को तो तुम बता रही थी कि वह ठीक हैं!” विमल ने फिर वही सवाल दुहरा दिया।

“कहाँ हो तुम?” 

“घ् घर पर।“ वह हकलाकर बोला।

“ठीक है, फौरन चल आओ।“

“हाँ, आ रहा हूँ, बस बॉस को इन्फार्म कर दूँ।”

उसने अँगूठा लगाकर मोबाइल का लॉक खोला और टूँऽ-टूँऽ-टूँऽ मोबाइल स्क्रीन पर नम्बर डायल करने लगा। पर अचानक विचारों की करवट ने अंगुलियाँ थाम दी उसकी। वह बॉस को फोन नहीं करेगा, केवल व्हाट्सएप से छुट्टी का मैसेज भेज देगा उन्हें। बॉस तमाम तरह के बहाने बनाकर उसे रोकने की कोशिश करेंगे। लेकिन अब वह जाएगा; नौकरी और बॉस जाए भाड़ में! अंतिम दरस को भी..नहीं अब वह नहीं रुकेगा, अब वह अवश्य जाएगा।

इस बॉस और नौकरी ने तो उसको स्वार्थ के साठ हाथ तले जमीन में गाड़ दिया। रोती रही सास, बिलखती रही बेवा, दामाद से मिलने की आस हृदय में सँजोए हुए प्यासी आँखें इस संसार से स्वर्ग सिधार गईं…किंतु वह उनसे मिलने न जा पाया।

सप्ताह भर पहले जैसे छोटे साले ने उनके बीमार होने की सूचना फोन कर दी, उसने पत्नी को तुरंत अस्पताल भेज दिया। लेकिन स्वयं बॉस के चक्कर में आजकल-आजकल कहकर टालमटोल करता रहा। डॉक्टर ने चार दिन हर सम्भव उपचार करके कह दिया, “घर ले जाकर माँ को खिलाओ-पिलाओ, सेवा सत्कार करो। जो कुछ कहें इनकी वह इच्छा पूरी करने का यत्न करो। अंतिम समय है, महीना पार नहीं कर पाएँगी।”

वे अस्पताल से घर आ गईं। सारे नाते-रिश्तेदार आकर मिल गए। किन्तु वह ऑफिस में कंप्यूटर के की-बोर्ड से खेलते हुए खाली समय तलाशता रहा।

मन में बवंडर मचा तो हृदय रो उठा उसका। आँखों में आँसू उमड़ आए। दो बेटे और एक बेटी की माँ जीवन भर उम्मीद की बाट जोहती रही लेकिन आशा हरजाई गूलर के फूल की तरह कभी न फूली। 

चार भाई-बहनों वाले घर में उर्मिला देवी ने जन्म लिया तो विपन्नता गोद में लेने के लिए बन-ठनके तैयार बैठी थी। जहाँ सुबह से शाम तक किसी प्रकार ठंडे चूल्हे को सुलगाकर पेट की अग्नि शांत करने की जद्दोजहद थी। तनिक होशियार हुई तो अभावों ने आसरे की अँगुली थमा दी। सुख-दुःख, अमीरी-गरीबी जीवन रूपी गाड़ी के पहिए हैं जो क्रमशः चलते रहते हैं। पहले सुख तो बाद में दुःख, पहले दुःख तो बाद में सुख। इस मृत्युलोक में आने वाले हर प्राणी को सुख-दुःख भोगना निश्चित है। भगवान राम, कृष्ण और भगवती सीता नहीं बच पाईं इस फेर से तो…  बड़े-बूढ़ों के मुख से प्रकटे ज्ञान ने उनके मन में आस की ज्योति जला दी। मायके में विपन्नता है तो ससुराल में अवश्य सुख, सम्पन्नता मिलेगी। दृढ़ मन से आशा की खूँट थामे सोलहवें वर्ष वे ससुराल आ गईं।

ससुराल में पाँच-पाँच सास और ससुर, भारी-भरकम परिवार था; जहाँ पहले ही अस्तित्व, अधिकार व अभावों के मध्य संघर्ष छिड़ा हुआ था। वे अभी कुछ समझ भी नहीं पाई थीं कि तब तक सगी सास ने ज्येष्ठ बहू का धर्म सिखाते हुए अरमानों पर पाबंदियों और मुख पर जिम्मेदारियों के ताले जड़ दिए, “तुम इस घर की सबसे बड़ी बहू हो। तुम्हें अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। तुम्हारा चाल-व्यवहार ही आने वाली परिवार की अन्य बहुओं के रास्ते का पत्थर बनेगा।”

वे अर-अराकर ढंग से ढह भी न सकीं। आरंभ में मन मलिन हुआ किंतु सुलझे हुए, विशाल सोच के परिश्रमी पति के निश्चल प्रेम ने दूसरे ही पल विश्वास के उस पार आसरे के दीप में और तेल डाल दिया। मन की सारी दुर्बलता त्याग कर वह दायित्वों का बोझ उठाकर आसरे की राह चल पड़ीं।    

वे रम गईं अपनी गृहस्थी में अभावों और सास-ससुर के तानों, प्रताड़नाओं को बिसारती हुईं। पति पंजाब जाकर धनार्जन करने लगे और वे घर में लक्ष्मी को सहेजने लगीं। परिश्रम ने रंग दिखाया, दूर स्थित आस के दीपक की मद्धिम-मद्धिम रोशनी अब दिखलाई पड़ने लगी। समय ने क्रमशः पुत्र, पुत्री और फिर पुत्र, तीन फूल आँचल में डाल दिए उनके। माँ बनते ही उनके कंधे पर जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ गया लेकिन इसी दायित्व बोध ने आस के दीप को और सन्निकट ला दिया। तीन-तीन हृष्ट-पुष्ट संतान, आशा का दीपक क्या, अब तो आसमान के सारे तारे उनके हुए। मन तनिक वास्तविक और अधिक काल्पनिक सुख का संसर्ग पाकर फूल उठा।

बाल-बच्चों को खेते-पखेते, पारिवारिक जिम्मेदारियों के मध्य वे सुनहरे कल की कल्पनाओं में डूबी नौका सी लहरा कर चल रही थीं। तभी एकाएक वह हुआ जिसकी कल्पना निर्दयी दुःखों ने भी न की थी। हृदयाघात ने पति को छीन लिया। गृहस्थी के हाथों की मेहंदी मिटी भी न थी कि जीवन को तुषार की साटिका ओढ़ाने के लिए सुबह परदेश से पति की लाश ले आया। उषा ढंग से विदा भी न हुई थी, सूर्य-रश्मियाँ पाँवों में पायल बाँध ही रही थीं कि रोना-पीटना मच गया। आगत तूफान से अनभिज्ञ उर्मिला देवी भीतर चूल्हे में उपले सुलगा रही थीं। द्वार पर रोना सुनकर वे लकड़ियों को सुलगते उपले पर हाली-हाली रखने लगीं। तब तक बड़ा बेटा पास आकर चिल्लाया, “मम्मीऽऽ!”

अचानक बेटे की आवाज पर वे हड़बड़ा गईं। हाथ कँपा, लकड़ियाँ हिलीं और चूल्हे के सिरहाने पर रखी बटुलोई का सारा पानी चूल्हे में भर गया। उनके मुख से कुछ निकलता तब तक बेटा फिर चीखा, “मम्मी! पापा को देखोऽऽ!” 

“पापा? कहाँ? वह तो…।” किसी अनहोनी की आशंका ने सवालों का बवंडर खड़ा कर दिया उनके मन में। 

बाहर सासू माँ के रुदन ने स्वर पकड़ा, “हमार हीरा काहे सो गए?”

वे बेतहाशा दौड़ीं। बाहर द्वार पर पेड़ के कटे तने की तरह उनके पति का मृत शरीर पड़ा था। वे मर्यादा भूल कर चीखीं और लड़खड़ाते हुए पति के पैरों पर गिर पड़ीं। मुँह से प्रलयकारी बम फुटा, “नहींऽऽ!”    

इसके आगे वे कुछ न बोल पाईं। पति की तरह उस क्षण जुबान भी दगा दे गई। वे बेहोश हो गईं। घर भर में कोहराम मच गया। पानी के छींटे मारे गए उनके मुँह पर। चेतना जगी फिर भी मुख से स्वर कम ही फुटा। बस आँसुओं ने साथ दिया। दोनों कपोल समन्दर हो गए। 

घट की कीमत कब तक जब तक उसमें पानी, शरीर की कीमत तब तक जब तक उसमें प्राण। सायंकाल होते-होते पति की अंत्येष्टि कर दी गई। लक्ष्मण की उर्मिला के उलट यह उर्मिला आजीवन पति से वंचित हो गई। बिना पंख चिड़ी को देखकर चिड़ी के बच्चों की तरह, उनकी सूनी मांग तथा सूने पाँव को देखकर तीनों बच्चे डरकर उनकी आँचल से लिपट गए।

बूढ़े मां-बाप और पत्नी इस कहर से कँहर ही रहे थे कि तब तक अवसरवादिता ने अपना रूप दिखला दिया। उनके परिवार में खर्च अधिक था, बच्चे छोटे थे और सास-ससुर बूढ़े थे। परिवार का कमाऊ जन मर जाने से शेष चाचा-दादाओं के परिवार वालों ने अपना-अपना घोंसला अलग कर लिया। चालाक विहग सदा अपने आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को चौकस रखते हैं, मूर्खों की तरह एक डाल पकड़कर उससे चिपके नहीं रहते। 

समय ने दुःख दिया, समय ने उबारा। कालांतर में बूढ़े सास-ससुर के साथ मिलकर उन्होंने तीनों बच्चों का विवाह कर दिया। थोड़े दिनों तक सब सामान्य रहा। फिर दोनों बेटों ने भी अपना घोंसला अलग कर लिया। बेटी अपने घर चली गई। वह बेवा पेट के लिए हर महीने नाद बदलने लगीं। दोनों बेटों पर वे बोझ बन गई थीं। किसी तरह एक-एक महीने की पारी से उन्होंने उन्हें अपने पास रखने का समझौता किया।

विमल ने खूँटी पर टँगी मोटरसाइकिल की चाबी उतारी और दालान में से बाइक बाहर निकाला। मोटरसाइकिल रोज से अधिक भारी थी। उसे संदेह हुआ। पहिया देखा तो संदेह को बल मिला। पिछला टायर सम्भवतः पंचर हो गया था।

“सिट्  इसे भी आज ही होना था!”  उसने गुस्से में फर्श पर पैर पटका।

 टायर ट्यूबलेस थी।

‘चलो गनीमत है।‘ उसने भीतर से एयर पंप निकालकर टायर में हवा डाली। गेट लॉक किया और चाबी गाड़ी की डिग्गी में डालकर वह ससुराल की ओर चल पड़ा। मिनट भर में मोटरसाइकिल साठ में चलने लगी और उसका मन एक सौ बीस में उड़ने लगा।

प्रारम्भ में उसका व्यवहार भी उनके प्रति बहुत असभ्य व कठोर था। वह उन्हें कंजूस, लालची और न जाने किन-किन उपाधियों से नवाजता था तथा उनसे बात भी नहीं करता था। उनकी सूरत से ही उसके मुँह का भूगोल बिगड़ जाता था, गुस्से से उसका नथुना फूल जाता था। 

ब्याह के सात-आठ वर्ष तक उसने उनसे बात भी न की थी। वे करीब आतीं तो वह किसी न किसी बहाने से वहाँ से उठ जाता या बात की दिशा मोड़ देता अथवा मोबाइल से किसी दूसरे से बात करने लगता। 

नीलम के मामा की लड़की न मिलती तो शायद अब भी वह बात न करता। शालू ने ही एक दिन पूछा था, “जीजू! आप बुआजी से क्यों नाराज हैं?”

उसके इस सवाल से वह सकपका गया था, सम्हलकर कहा, “क्या मतलब?”

“मतलब कि आप उनसे बात क्यों नहीं करते?” 

शालू विमल का बड़ा आदर करती थी। उसे लगा कि सम्मान बचाने के लिए अब इसे सारी बात बताना ही पड़ेगा। वह बोला, “जानती हो कि उस नाटकी औरत ने क्या किया है मेरे साथ?”

“मैं तो नहीं जानती। आप बताएँ तो शायद कुछ जान पाऊँ।“ शालू की आवाज में नियंत्रित क्रोध था।

“उस औरत ने मेरे दोस्तों के बीच मेरा बड़ा अपमान किया। विवाह- वेदी पर कलेवा के समय नेग के रूप में उसने मुझे सौ रुपल्ली दिए।“ कहते हुए विमल का मुँह लाल हो गया।

“कुछ दिया ही न?”

“तुम जानती नहीं, मेरे दोस्तों ने मेरी कितनी खिल्ली उड़ाई बाद में। एक सरकारी क्लर्क को उसकी सास ने कलेवा का नेग सौ रुपए दिया। अरे! इस नौटंकीबाज को कुछ नहीं देना था तो मुझसे कहती, मैं उसे चार-छह हजार पहले दे देता, कम से कम दोस्तों और भाइयों के बीच मेरी इज्जत तो बच जाती!”

“लेकिन मुझे मालूम है कि उस समय तो सब बढ़िया से निपट गया था?”

“मेरे कारण, मेरे कारण निपट गया था बढ़िया से। मैं उस बेहया औरत की तरह तमाम लोगों के बीच उसकी और अपनी फजीहत नहीं कराना चाहता था।”

“ओह! तो बात रुपए की है?” 

“नहीं, बात रुपए की नहीं; मान सम्मान की है।”

“वही, वही! मान सम्मान मतलब आपके रुपए।”

इससे पूर्व विमल ने शालू को इतना कटु कभी नहीं देखा था। वह तिलमिलाकर रह गया। 

थोड़ी देर रुककर शालू पुनः कहने लगी, “एक बात पूछूँ, जीजू?”

“हाँ, पूछो।” अब वह उसके पास से जल्दी निकलना चाहता था।

“शादी से पहले आपको नहीं पता था कि आपकी सास विधवा हैं, कहें तो दूसरे के आश्रित! ससुर नहीं हैं!”

“जानता था लेकिन सास इतनी कंजूस होगी, कदापि नहीं सोचा था।”

“जीजाजी, आप इतने पढ़े लिखे हैं, समाज की हालत भी बखूबी समझते हैं फिर भी एक बेवा स्त्री की अवस्था नहीं समझते?” 

“तुम क्या कहना चाहती हो?” 

“हाँ जीजू! बेरोजगार बेटे, बूढ़े व बीमार सास-ससुर तथा एक असहाय विधवा! उस अकेली औरत ने कैसे बच्चों को पढ़ाया-लिखाया होगा और कैसे सबका विवाह किया होगा, आपने कभी सोचा? आप के लिए लाख-पचास हजार रुपयों की कोई कीमत नहीं होगी किन्तु एक बेवा के लिए दस रुपए भी दस हजार के बराबर हैं। उसने आपको सौ रुपए दिए तो समझो दस-बीस हजार दिए।”

शालू की बात सुनकर उसके अहंकार व रोष का किला ढहने लगा। 

वह बोलती गई, “जीजू, आपने शायद गौर नहीं किया होगा कि कलेवा के समय सौ रुपए देते वक्त उनकी आँखों में आँसू क्यों थे? ये वह आँसू थे जो वे किसी भी कीमत पर परिणय की शुभ वेदी पर गिरने नहीं देना चाहती थीं। उनके यह आँसू किसी भी गहने-गधेले से अनमोल थे।”

“मुझे नहीं मालूम था।”

“आपको तो यह भी नहीं पता कि वह आपसे बात न कर पाने के कारण कितना मन ही मन तड़पती हैं। बुआ को और कोई रोग नहीं है, इसी चिंता में वे बीमार रहती हैं। उन्होंने कई बार मुझसे कहा है कि शालू, मैं भी चाहती हूँ कि अपने दामाद के पास बैठूँ, मैं भी उससे अपने दिल की दुख-दर्द कहूँ। ..जीजू, आप क्या जाने की एक बेवा स्त्री की घर और समाज में क्या दुर्दशा होती है? घर में कोई उसकी पीड़ा सुनना नहीं चाहता और बाहर वह किसी से कह नहीं सकती। जीजू! अपना दामाद डायन को भी प्यारा होता है, वे तो फिर भी एक स्त्री हैं। और एक बात और आपकी नाराजगी वे बखूबी समझती हैं। उन्होंने कई बार मुझसे कहा है कि मैं तेरे जीजा को सोने की अँगूठी देना चाहती हूँ किन्तु क्या करूँ दोनों लड़के मेरी विधवा पेंशन का भी रुपया भी नहीं छोड़ते। जीजा, वे पूरा जीवन केवल उम्मीदों पर जीती आई हैं। वह उम्मीद जो कभी पूरी नहीं हुई। वे अब भी अपने दामाद को अपनी कोई निशानी देने की आशा पाले हुए हैं।”

“ब बस शालू! मुझे क्षमा कर दो। मैं अपने व्यवहार पर बहुत शर्मिंदा हूँ। स्वार्थी, नौटंकीबाज और लालची वे नहीं, मैं हूँ स्वार्थी घमंडी और लालची। वे तो बहुत महान हैं।” कहते-कहते वह रोने लगा।

सामने पंचर की दुकान थी। पाँच मिनट रुककर उसने पंचर बनवा लेना उचित समझा। बाइक डबल स्टैंड पर खड़ी करके वह फोन पर पत्नी से वहाँ के इंतजाम की जानकारी लेने लगा। आध घड़ी में पंचर बन गया तो वह पुनः गाड़ी पर बैठकर उड़ने लगा। विचारों ने एक बार पुनः उसकी मोटरसाइकिल की गति से होड़ लगाना शुरु कर दिया।

उस दिन बहुत खुश हुई थीं वे, जब वह उनसे प्रेमपूर्वक मिला था। सीने से लगाकर देर तक रोती रही थीं। सिर पर हाथ रखकर ढेरों आशीर्वाद दिया था। विमल फिर सोचने लगा। लेकिन उसके बाद वह पुनः कभी उनके पास अधिक देर तक नहीं बैठ सका। हर बार नौकरी और उसका अंतर्मुखी स्वभाव बाधक बनकर उनके बीच आ जाता। वे जीवनपर्यंत कुरछती रहीं अपने मन की बात उससे करने को। 

वे बहुत मान देती थीं उसे। उसकी गलती रहने पर भी वे सदा अपनी बेटी को ही दोषी ठहराती थीं। कहतीं थीं, “बेटा मैं जानती हूँ, यह कमअक्ली, जिद्दी स्वभाव की है। लेकिन मैं क्या करती? माँ थी, पालन-पोषण में बाप की तरह कड़ाई न कर सकी। इसलिए बच्चे अधिक जिद्दी हो गए।”

हर बार जब वह नीलम को लिवाने ससुराल जाता तो वही एक ही बात हाथ जोड़कर वे बोलतीं, “बेटा, इसे माफ कर देना। इसकी गलतियों के लिए मैं तुमसे क्षमा माँगती हूँ।”

एक्सीलेटर खींचकर वह ससुराल पहुँचा। दरवाजे के सामने जमीन पर पुआल बिछा हुआ था जिस पर वही भागलपुरी चद्दर पड़ी थी जो उनके पति मृत्यु से पहले लुधियाना से लेकर आए थे। उनका मृत शरीर उसी पर लिटाया हुआ था। उसने जैसे उनके चेहरे की ओर देखा लगा जैसे किसी ने पूछा हो, “बेटा पाँव धुला किसी ने?..ठहरो मैं पानी लाकर धुलती हूँ।”

उसकी आँखों से आंसू झरने लगे। उनकी गोल-गोल बड़ी-बड़ी आँखें, माथे पर अब भी तेज था। मानो सो रही हों, अभी उसका आना जानकर तुरंत उठ पड़ेंगी।

सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। टिकठी (विमान) भी बन गई। आधे घंटे में विमान उठाया गया तो उसने भी लपककर एक ओर का पाया पकड़ लिया। लोगों ने मना किया, “तुम इनके मान्य (पूज्यनीय) हो, आखिरी में उनका धर्म भ्रष्ट न करो।”

“आखिर में मुझे मेरा धर्म निभाने से मत रोको।” विमल रुँधे हुए गले से बोला।

दाह-संस्कार के बाद सभी अपने घर को चले गए। नीलम से मिलकर विमल भी अपने घर जाने लगा। भीतर से आवाज आई, “रुको बेटा। दामाद हो, जो कुछ फूल-पाती तुम्हारी सास के पास है, ले लिया करो। जाने कोई मेरे बाद दे न दे।”

उसने मुड़कर देखा, वहाँ कोई नहीं था। वह फफककर रोते हुए मोटरसाइकिल पर बैठ गया।

 

नंदन पंडित

इटियाथोक, गोण्डा-उत्तर प्रदेश 

 

संक्षिप्त परिचय:- 

     जन्मतिथि- 20 अगस्त 1983 ई॰।

कृतित्व- अँखुआ (गीत संग्रह), बोल कबूतर (बाल काव्य संग्रह), रेती की सौंह (उपन्यास), माड़ौ होइ गे (उपन्यास)। 

  सम्प्रति- अध्यापन, बेसिक शिक्षा गोण्डा।

 

पत्राचार-

गाँव- गजाधरपुर 

पोस्ट- अयाह, इटियाथोक 

जनपद- गोण्डा, उत्तर प्रदेश 

पिन कोड- 271202

मो॰ न॰- 9415105425

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“किशोरावस्था का प्रेम”

कथा- कहानी

"किशोरावस्था का प्रेम"

सतीश "बब्बा"

                   हल्की – हल्की रेखा, नाक के नीचे भूरी लाइन से मूछों का आकार और चिकने – चिकने गालों पर भूरे – भूरे रोंएं मुझको आकर्षक बनाती थीं। मैं अब समझ पाया जो मेरी भाभियां कहतीं थीं कि, “पा जाऊं तो दबाकर रखे रहूं!” उनकी रहस्यमय बातें तब मैं समझ नहीं पाता था। 

अपनी हमजोली विषमलिंगी के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था। शायद यही किशोरावस्था थी कि, शरारतें बढ़ने लगी थीं। 

लेकिन अम्मा और बापू का डर बहुत था। मजाल क्या थी अपनी कि, किसी को बिना मतलब टोंक सकते। 

प्राथमिक पाठशाला छूट गई थी। जूनियर हाईस्कूल से अब कालेज में पढ़ाई के लिए पैदल छः – सात किलोमीटर जाना पड़ता था। और घर में भी पढ़ाई अलग करते थे। 

छुट्टी पर और शाम को सहपाठियों के साथ प्राइमरी स्कूल की तरफ खेलने चले जाते थे। जहां बचपन की ताजा यादें और छूटते बचपन का गम भावविभोर करता था। 

वैसे भी किशोरावस्था में बापू का डर बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर बाप की कड़ी निगरानी न हो तो पूरा जीवन दुखमय हो सकता है। किशोरावस्था में बापू का भय हमें बहुत ऊंचाई तक पहुंचाने में कारगर होता है। फिर भी पिता जी की आंखें बचाकर स्वस्थ शरारतें हो ही जाया करती थीं। 

हम भी प्राइमरी स्कूल के पास रहने वाली रानी की ओर आकर्षित हो गये थे। कितनी सुन्दर थी वह बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर उसने भी पांव रखा था। वह सिर्फ नाम की रानी नहीं थी; वह रूप की रानी और दिल की रानी थी। 

प्राथमिक पाठशाला पास होने के कारण रानी कक्षा पांच पास कर लिया था, वरना उस जमाने में फिर गांव में बेटियों को कहां पढ़ाते थे कोई! तेरह साल में शादी की चर्चा और फिर शादी; फिर पांच या सात साल में गवना कर दिया जाता था। 

हां तो अब समझ में आ रहा है कि, मेरा आकर्षण साधारण नहीं था, मुझे रानी से प्यार हो गया था। फिर भी मैं उससे कभी भी इसका इजहार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि बापू की इज्जत का और गांव, परिवार तथा बुजुर्गों के डर के अलावा एक डर और था कि, कहीं मेरा प्यार एकतरफा न हो! वह डर भी मैं सम्मानजनक मानता हूं; यही डर तो हमारा संस्कार और संस्कृति है। 

मैं कालेज से आकर जल्दी जल्दी रानी के घर की ओर भागता। 

कुछ सहपाठी मित्र मेरे साथ हुआ करते थे। हम रानी के दरवाजे के सामने जोर – जोर से बोलते, बातें करते और प्राइमरी स्कूल के कुएं जाकर बैठा करते थे! जहां रानी मिट्टी का घड़ा अपने कमर में दबाकर एक हाथ से और एक हाथ में लोहे की बाल्टी लटकाए रस्सी कंधे पर डालकर आ जाया करती थी। 

रानी के घरवाले खेतों से रात में ही लौटते थे और रानी सभी काम कर लेती थी और पानी में खूब समय लगाया करती थी। मैं उस घड़े और रस्सी के भाग्य पर जलता था। 

कुछ सहेलियां रानी की कुएं के पनघट पर हंसी – ठिठोली रानी के साथ किया करती थीं। जाने क्या कहतीं, लेकिन उनकी हंसी से ऐसा लगता था जैसे गुलाब के फूल झरते हों। 

कभी कभी हिम्मत करके मैं बिना प्यास के ही प्यासा हो जाता फिर भी रानी से नहीं कह पाता उसकी सहेलियों से कहता और उसकी सहेलियां कहतीं, “रानी, बेचारा प्यासा है, तुम प्यास बुझाओ इसकी!” 

शायद उनको पता था, फिर भी मैं उनके इस बात को भी नहीं समझ पाया था। रानी मुझे पानी पिलाया करती थी अपनी बाल्टी में धार बनाकर और मैं चुल्लू से पानी पीता कहां पानी को बहाते हुए रानी के चेहरे पर आंखें गड़ाए देखा करता था। 

जब कोई सयानी भाभी और बूढ़ी काकी आती तब रानी शर्म से लाल हो जाती और मैं पानी पीना छोड़कर एक तरफ जहां से वह दिखाई देती और उसके घर का रास्ता होता वहां जाकर अपने मित्र मंडल के साथ बैठ जाया करता था। 

रानी को देने के लिए मैं रोज प्रेम – पत्र लिखा करता, शायरी लिखता और उसे देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। बापू का और रानी का बराबर डर था कि, कहीं नाराज न हो जाए। 

ऐसे ही ऐसे में वर्षों बीत गए। मेरी शादी हो गई और रानी भी अपने ससुराल चली गई। तब मोबाइल की कल्पना तक नहीं थी; रेडियो का समय आ गया था। 

आज बहुत सालों बाद रानी मिली थी। उसका भाई उसे लिवाकर आया था। उसने मुझे मेरा नाम लेकर बुलाया था और मैं भी उससे, “रानी कब आई तुम?” पूछा था। 

उसके चेहरे पर आज भी वही वही आकर्षण था फिर कुछ खोई सी लगी थी वह मुझे। सरकारी नौकरी वाला पति था उसका, मैं उसके बारे में पता किया था। 

मैंने उससे कहा, “रानी, तुम्हें याद है जब हम पैदल कलकहाइन लोखरी मेला करने बैसाख में जाया करते थे!” 

उसने कहा, “हां हां क्यों नहीं, तुम किस्सा – कहानियों की किताबें ज्यादा खरीदते थे। और मुझे एकबार जलेबी दो आने की पाव भर दिलाया था!” 

मैंने कहा, “रानी, माघ मे हम लालापुर मेला करने गए थे तब तुमने मुझे नंदन और चंपक खरीद कर दिया था वह मेरे पास अभी भी लाइब्रेरी में मेरे रखी हैं!” 

उसके भाई ने कहा, “कल आपके घर रानी आने को कह रही थी तब और बातें कर लेना अभी जाने दीजिए देर हो रही है!” 

हम फिर अपने घर आ गए और रानी अपने भाई के साथ उसके घर चली गई। 

उसके तीसरे दिन में अपने आफिसनुमा बैठकें में बैठा था कि, रानी आ गई। 

मैंने उसे आदर के साथ बैठाया और नाश्ते के लिए पूछा। तब वह कहने लगी, “बब्बा, बब्बा नाम और बब्बा हो भी गए हो, परंतु आज मैं नाश्ता करने नहीं तुमसे बात करने आई हूं!” 

उसकी जबान से तुमसे संबोधन सुनकर बहुत ही अच्छा और अपनापन लगा। फिर भी मैं चुप रहा। 

रानी ने कहा, “और सुनाओ बब्बा, अभी भी तुम बारह साल के हो क्या?” 

मैं अपने प्रेमाश्रु कहूं या दुखाश्रु या या और कोई अश्रु कहूं उन्हें छुपाने की कोशिश के साथ इतना ही कह पाया, “रानी, तुम कैसी हो!” 

रानी ने कहा, “बहुत बड़े धन की मालकिन हूं मैं! फिर भी बचपन और किशोरावस्था का प्रेम तुम जो हो मैं भुला नहीं पाई हूं, आज मुझे कहने में कोई डर भी नहीं है और आज गांव खुसर – फुसर भी नहीं करेगा और तुम्हारे मेरे बापू का डर भी नहीं है!” 

अब मैंने कहा, “हां रानी, तुम यह बताओ क्या मेरी तरफ तुम भी मुझसे प्यार करती थी? मैं नहीं जानता वह प्यार ही था या चाहत, आकर्षण लेकिन तुम्हें देखे बिना मुझे चैन नहीं मिलता था!” 

आज बिना झिझक, बिना डरे मैंने उससे अपनी बात कह दी थी। 

रानी की आंखों से चंद अश्रुबिंदु गिरे और फिर उसने उन्हें आंचल से पोंछा और कहने लगी, “शायद वही प्यार था, पवित्र प्यार मेरा पानी भरा रहता था फिर भी मैं तुम्हारी आवाज सुनकर घिनौची का भरा पानी फेंककर दौड़ी – दौड़ी कुंए पर तुम्हें देखने आती थी; इस बात को मेरी सखियां भी जानतीं थीं!” 

मैंने पूछा, “फिर तुमने मुझसे कभी कहा क्यों नहीं?” 

वह गंभीर थी और कहने लगी, “यही तो हमारे संस्कार थे, मेरी तुम्हारी समस्या एक थी। मैं तुम्हें कमजोर नहीं, तुम्हें पूजती हूं। मैं लड़की जाति शर्म और मर्यादा में बंधी हुई थी, तुमसे कुछ कहने में शर्माती और डरती थी कहीं तुम मुझसे दूर न हो जाओ!” 

मैंने कहा, “पगली कहीं की, मैंने बहुत खत लिखे थे तुम्हें, और रात भर जाग – जागकर तुम्हारी तस्वीरें बनाया करता था मैं!” 

रानी गंभीर थी। उसने कहा, “तुम्हारी मेले वाली जलेबी इतनी स्वादिष्ट थी, सोंधी थी और मीठी थी जो इतने दिनों बाद भी उस स्वाद को दुबारा नहीं पा सकी हूं, इसी बात से तुम अंदाजा लगा सकते हो!” 

रानी ने रुंधे गले से कहा, “कहने को सभी सुख हैं मुझे, एक तेरे प्यार से वंचित मैं आज भी कुछ खो गया है इस दुख से दुखी हूं!” 

मैंने कहा, “रानी, मैं इतना कहां कमाता हूं, मैं तो तेरे सुख की कल्पना से खुश हूं और जीवित हूं!” 

रानी ने कहा, “बब्बा, तेरे जैसा प्यार करने वाला शायद ही दुनिया में दूसरा कोई और होगा, मैं तो एक बार, एक टाइम खाकर भी तेरे संग सुखी रहती। सामाजिक तौर पर भी तेरा – मेरा विवाह हो सकता था लेकिन मर्यादा में बंधे हम दूर हो गये, तुम मेरी नजर में गिरे नहीं हो, तुम महान हो!” 

मैंने उसे समझाया, “शायद कुदरत को यही मंजूर था!” 

मैं आज भी रानी का हाथ पकड़ कर चूमना चाहता था लेकिन आज भी मैं मर्यादा नहीं लांघने की कोशिश की और तमाम बातें करते रहे मुझे ऐसा लगता था कि, वह बैठी रहे और कभी न जाए। 

शायद रानी की भी मनोदशा यही थी और मेरी स्थिति को जान रही थी। 

रानी ने कहा, “बब्बा, इसीलिए तुम मुझे आज भी बहुत अच्छे और महान लगते हो तुम आज भी मर्यादित हो! मैं जानती हूं कि तुम मुझे छूने के लिए आतुर हो क्योंकि मैं भी तुम्हें स्पर्श करना चाहती हूं, नहीं हम दोनों आज भी अपनी और अपने खानदान की, अम्मा – बापू की मर्यादाएं नहीं तोड़ना चाहते, तुम महान हो बब्बा!” 

मैंने झट कहा, “रानी, मैं कुछ भी नहीं हूं तुम्हारे सामने, तुम प्रेम की प्रतिमूर्ति हो, मर्यादा और संस्कारों की देवी हो!” 

हम दोनों बहुत देर तक आंसुओ से अपने – अपने चेहरों को भिगोते रहे। 

हमारे पास आज कोई नहीं था न कुछ कहने वाला न ही आने वाला। फिर भी हम दोनों मर्यादा से बंधे हुए थे। अपने – अपने बच्चों के लिए। 

जो उसकी सहेलियां थीं और मेरे सहपाठी थे आज भी वो हमसे हमारे इस किशोरावस्था के प्रेम का जिक्र कभी कभी कर ही देते हैं। और हम अपने बीते दिनों की अनुभूति से रोमांचित हो जाते हैं। 

समय हो गया था और हम दोनों को फिर से मर्यादा का पालन करना था। एक दूसरे से अलग होकर कभी अलग न होकर भी अलग हो जाना था। 

मैं रानी को अपने बैठकें से बाहर तक छोड़ने आया और रानी बिना मुड़े तेज कदमों से अपने मायके अपने घर की ओर चली गई। 

उसके अंदर क्या था वह जाने अनुमानित शायद मेरी तरह के के हिलोरें वह भी दबाना चाह रही थी। 

– सतीश “बब्बा” 

पता – सतीश चन्द्र मिश्र, ग्राम+ पोस्टआफिस= कोबरा, 

जिला – चित्रकूट, उत्तर – प्रदेश, पिनकोड – 210208.

मोबाइल – 9451048508, 9369255051. 

ई मेल – babbasateesh@gmail.com

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उसके लौट आने की आस

कथा- कहानी

उसके लौट आने की आस

डॉ प्रदीप उपाध्याय

                          मैं जब ट्रेन से लौट रहा था तब रह-रहकर वही सब बातें जेहन में आ रही थी। मैंने सोच भी तो लिया था कि अब तत्काल वापस लौटने का कोई मतलब नहीं। लेकिन फिर भी मन नहीं माना और हिमांशु से कहकर ट्रेन से वापसी का रिजर्वेशन करवा लिया था। कहीं न कहीं मन में आस थी कि छोटू लौट आएगा। मुझसे ज्यादा तो सविता के मन में यह बात थी और वह कह भी रही थी कि मुझे तो आज भी विश्वास नहीं हो रहा है कि छोटू नहीं रहा। ट्रेन से उतरते समय भी और रिक्शे में सवार होते समय भी छोटू ही दिलो-दिमाग में पैठ जमाए हुए था।

मुझे याद आ रहा था जब उस रात मैं कितना  परेशान  रहा । सविता भी लगातार कह रही थी कि देखो छोटू कल से घर नहीं पहुंचा। बगीचे और मकान पर नौकर-चाकर रखने का क्या मतलब है आखिर उनको छोटू का भी तो ध्यान रखना चाहिए था। हम सिर्फ  चौकीदार  रखकर ही काम चला सकते थे लेकिन सोचा था कि परिवार वाला रहेगा तो अच्छे से देखभाल हो सकेगी।

मैंने भी तो घर से निकलते वक्त ही किशन को ताकीद कर दिया था कि एक तो तुम्हें पेड़ -पौधों का ध्यान रखना है और दूसरा खास तौर पर ध्यान रखना है छोटू का।बस इन्हीं में मेरी जान अटकी रहती है और इसीलिए मैं कहीं आता-जाता नहीं हूं, शहर से बाहर जाने का कोई अवसर आता भी है तो किसी न किसी बहाने से टाल दिया करता हूं, लेकिन जहां जाना जरूरी रहता है, वहां तो जाना ही पड़ता है।

इसीलिए इस बार भी मैंने जाने से पहले किशन से कहा  था कि -“पिछली बार चार दिन के लिए ही साहित्यिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए जयपुर गया था किन्तु तुम चार दिन भी ठीक से देखरेख नहीं कर सके थे और टफी चला गया…तुमने मुझे ज़माने भर का दर्द दे दिया  …किन्तु देखना किशन,इस बार कोई ग़लती मत करना,कहीं कोई गड़बड़ मत होने देना।”

तब उसने मेरी बात पूरी होने के पूर्व ही आश्वस्त करते हुए  कहा  था कि -“नहीं बाबूजी,अब कोई ग़लती नहीं होगी,आप तो बेफ़िक्री से भैया के घर होकर आओ। यहां हम लोग सब संभाल लेंगे।” और मैंने उसकी बात पर विश्वास करते हुए हिंमाशु से पन्द्रह दिन रीवा रहने की सहमति दे दी थी।रीवा जाकर रोजाना की खोज खबर तो किशन से मोबाइल पर लेता ही रहता था और साथ में सीसीटीवी कैमरों पर भी वॉच कर लेता था किन्तु उस दिन जब दोपहर से ही छोटू के घर से गायब होने की सूचना मिली, तभी से किसी अनिष्ट की चिंता सताए जा रही थी। अन्तर्मन सशंकित तो था ही।मैंने जब सीसीटीवी कैमरे पर  सुबह-सुबह देखा था तब वह पोर्च में कुर्सी पर बैठा हुआ था और सुस्त भी दिखाई दे रहा था। 

मैंने चौकीदार किशन से पूछा भी था -” छोटू ठीक तो है न!” तब भी उसने यही कहा था कि-” हां,वह ठीक है।” सविता ने भी फोन लगाकर उसके हालचाल पूछ लिए थे और किशन की पत्नी राधा से यह भी कह दिया था कि -“छोटू यदि ज्यादा परेशान कर रहा हो तो हमें बता देना,हम तत्काल लौट आएंगे , भैया की छुट्टी भी है,वे छोड़ जाएंगे ।”

राधा ने इतना जरूर कहा था कि- “छोटू, दिनभर गेट की तरफ देखता रहता है।उसे लगता है कि आप जल्दी वापस आ जाओगे।पहले टफी था,तब  दोनों साथ में रहते थे,उस समय इतनी दिक्कत नहीं थी।अब वह गेट से बाहर जाने की कोशिश करने लगा है।एक बार तो साइड की दीवार कूदकर बाहर निकल गया था। किन्तु आप लोग किसी बात की चिंता मत करना।हम लोग संभाल लेंगे।”

लेकिन फिर भी मुझे लगा कि वे लोग सही स्थिति नहीं बता रहे थे और इसीलिए मन में धुकधुकी बनी हुई थी। हालांकि वे हर बार यही कहते रहे कि छोटू ठीक है।आप परेशान मत होइए।

हमसे हिमांशु ने कहा भी था कि मम्मी -पापा आप लोग दिन में चार -छ: बार कैमरे देख लेते हो।छोटू के बारे में आपकी बैचैनी समझ में आती है। आपको हमसे ज्यादा चिंता तो आपके उन बच्चों की रहती है।दीदी भी यही कह रही थी। वह कह रही थी कि पापा -मम्मी हफ्ते -दस दिन के लिए आते हैं लेकिन उनका मन तो वहीं अटका रहता है। इसीलिए कह रहा हूं कि आप कहें तो छुट्टी वाले दिन आप लोगों को छोड़ आता हूं।

तब सविता ने उससे कहा भी था कि अरे तुम क्यूं परेशान होते हो। सरकारी नौकरी में कहां बार-बार छुट्टी मिल पाती है। तुम तो  ट्रेन का रिजर्वेशन करवाकर बैठा देना।तब मैंने ही कहा था कि नहीं एक सप्ताह के बाद तो हिमांशु को भी जाना ही है,तभी उसके साथ चले चलेंगे,अभी उसे क्यों डिस्टर्ब करें। लेकिन मुझे क्या मालूम था कि छोटू के बारे में हमारी आशंका सही साबित हो जाएगी। मुझसे ज्यादा आशंकित तो हिमांशु था और शायद इसीलिए वह बार-बार हमें वापस लौटने का कह रहा था। संभवतः उसे कुछ पूर्वाभास हो रहा था या फिर उसके मन में यह बात रही हो कि छोटू को कुछ हो गया तो सारा दोष उसी के सिर होगा क्योंकि वही उन्हें लेकर आया था।

इसी संशय पूर्ण स्थिति में जब कमलेश का फोन आया कि मामाजी,छोटू नहीं रहा। संभवतः रात को ट्रेन की टक्कर से उसके प्राण पखेरू उड़ गए।तब मैं यह सुनकर स्तब्ध रह गया। कुछ पल के लिए तो मैं अवाक सा मोबाइल थामे बैठा रहा,उधर से हेलो -हेलो की आवाज भी शायद मेरे कानों तक नहीं पहुंच पा रही थी।कुछ देर बाद जब मैंने अपने आप को संयत किया तब भी मेरे मन में एक ही ख्याल बार बार आता रहा कि ऐसा कैसे हो गया। आखिर छोटू लावारिस की तरह ऐसे कैसे जा सकता है! फिर भी मन मानने को तैयार नहीं था ।पास ही खड़ी सविता ने जब यह वार्तालाप सुना तो उसका तो रो-रोकर बुरा हाल हो गया।वह मुझपर ही बरस पड़ी और गुस्सा होकर प्रलाप करने लगी और बोली -” मैंने तो आपसे पहले ही कहा था कि हम लोग वापस चले चलते हैं। नौकरों के भरोसे छोटू को नहीं छोड़ सकते।” मैं कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं था क्योंकि मेरी भी आंखों से अश्रुधारा बह चली थी।

मैंने अपने आप को थोड़ा संयमित करते हुए कमलेश से पूछा कि एक बार फिर से देख आओ कि वह छोटू ही  है।ऐसा तो नहीं कि ट्रेन की टक्कर के कारण तुम उसे पहचान ही नहीं पाए हो और वह कोई और हो।तब उसने कहा था कि नहीं मामा जी,वह छोटू जैसा ही लग रहा है।उसका शव ज्यादा क्षत-विक्षत नहीं हुआ है। लगता है कि अचानक ट्रेन के आ जाने की वजह से वह तेजी से दूसरे ट्रैक की तरफ मुड़ा हो और इसी बीच उसे हल्की सी टक्कर पीछे से लगी हो और वह जब-तक दूसरे ट्रैक पर पहुंचा होगा, दूसरी तरफ से आ रही ट्रेन से उसका मुंह टकरा गया होगा, जिससे वह संभल नहीं पाया होगा।बस उसके मुंह पर ही चोंट के निशान दिखाई दे रहे हैं। मैं पहुंचा तब तक उसे वहां से हटाकर किनारे पर रख दिया गया था। मुझे लगता है कि वह छोटू ही है। रतन सिंह ने भी जाकर देखा था और वह भी यही कह रहा था कि वह छोटू ही है।

इतना सुनने के बाद मैं कमलेश से कुछ कहने-सुनने की स्थिति में ही नहीं था।अब कहता भी तो क्या कहता।शायद इस स्थिति के लिए मैं ही जवाबदार था। मैं मन ही मन खुद को कोस रहा था। मुझे लगा कि छोटू की मौत का मैं ही गुनहगार हूं। इसी बीच भावना का भी दिल्ली से फोन आ गया था। शायद उसे भी खबर लग गई थी।हम लोग तो छोटू के बारे में ऐसा सुनकर कुछ सोचने समझने की स्थिति में ही नहीं थे लेकिन भावना ने फोन पर हिमांशु से कहा कि छोटू को लावारिस जैसा मत छोड़ो। किसी से कहकर उसका अंतिम संस्कार तो करवा दो। हिमांशु ने तत्काल अपने मित्रों से फोन पर कहकर घर के बगीचे में ही टफी के पास छोटू को दफन करने का इंतजाम करवा दिया और वीडियो कॉल कर हिमांशु को बता भी दिया।

मैं वह परिदृश्य देखने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था।इधर मेरे मन में उथल-पुथल कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मुझे वह बात भी याद आ रही थी जब सविता खुद  दो-तीन दिनों से लगातार कह रही थी कि चलो,हम लोग वापस चले चलते हैं। किशन पर हमें जरा भी यकीन नहीं है। पिछली बार भी उन लोगों ने ध्यान नहीं रखा था।और अभी भी स्थिति वैसी ही है। पिछली बार ठंड का सीजन था और अत्यधिक ठंड लगने से टफी बीमार हो गया था जबकि उसके ठंड से बचाव का पूरा इंतजाम करके गए थे लेकिन किशन ने ध्यान नहीं दिया और अभी बारिश का सीजन चल रहा है।ये लोग तो नौ बजे से दरवाजा बंद कर सो जाते हैं। बाद में यह भी नहीं देखते कि कौन आ रहा है,कौन जा रहा है।छोटू भी सीसीटीवी कैमरे में कई बार नहीं दिखाई दिया। मुझे तो शंका है कि वह रात रात भर गायब रहता रहा होगा। लेकिन मैंने सविता को यह कहकर तब चुप करा दिया था कि अब हम लोगों को अधिकांश समय तो यहीं रहना है। इसलिए उसे भी आदत में आ जाने दो।छोटू को आदत हो जाएगी अपने बिना रहने की।

लेकिन क्या यह संभव था।जब हमारा यहां रीवा आने का कार्यक्रम बन रहा था, उसके दो दिन पहले की ही तो बात थी जब हम दोनों ही घर के बाहर लगी कुर्सियों पर बैठे थे।वह भी सुस्त उदास बैठा था,मेरे मन में भी बेचैनी थी। शायद उसे भी बिछोह का अहसास हो गया था।तभी तो वह मेरी ओर देख रहा था। शायद कुछ कहना चाह रहा था और मैंने प्यार से उसके माथे पर हाथ फेर कर सहला दिया था।तब भी वह मेरी ओर ही देखता रहा। वैसे भी उसके देखने का अंदाज ही कुछ ऐसा था कि उसके प्रति वात्सल्य भाव उमड़ता ही चला जाता था। ये बातें सोच -सोचकर मन में पश्चाताप का भाव भी उमड़ रहा था कि  सविता की बात मानकर मैंने तत्काल वापस लौटने का मन क्यों नहीं बनाया!

छोटू रह -रहकर मेरी स्मृति में आकर झकझोर रहा था।मुझे याद आ रहा था जब पहली बार वह मेरे पीछे पीछे चला आया था। मैं उज्जैन से एक साहित्यिक कार्यक्रम से लौट रहा था। कॉलोनी की मुख्य सड़क पर ही मित्र वर्मा जी से कह दिया था कि यहीं ड्राप कर दें,भीतर उबड़-खाबड़ रास्ता है। वहां से जब मैं घर की ओर चला आ रहा था तभी मुझे आभास हुआ कि मेरे पीछे पीछे एक छोटा सा मरियल सा पिल्ला भी मेरा अनुसरण कर रहा है। मेरे रूकने पर वह भी खड़ा हो गया और पूंछ हिलाने लगा। मैंने उसे डांटते हुए वापस भगाया तो वह कुछ दूर वापस जाकर रुक गया था। इसके बाद मैं अपने घर के मुख्य द्वार से होकर घर में प्रवेश कर गया था। कुछ देर बाद एक पिल्ले के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दी तो मैं घर के बाहर निकला , दरवाजे के बाहर उसे ही खड़ा पाया जो टफी से डरकर चिल्ला रहा था। जबकि टफी उसे सुंघने और पहचानने में लगा हुआ था। उसे दूसरा कोई हाथ भी नहीं लगा पा रहा था,वह डरकर जोर से चिल्लाने लगता था।

मैंने टफी को दूर किया और उसे एक कटोरी में थोड़ा दूध दिया और रोटी दी जिसे वह इतनी जल्दी चट कर गया जैसे बरसों का भूखा हो। मुझे दया आ गई थी। सविता ने भी कहा कि इसे यहीं रहने दो,हमारा इतना बड़ा बगीचा है, कहीं भी रह लेगा।बाहर आवारा कुत्ते इसे मार देंगे। हां,इसे घर के अंदर नहीं आने देंगे, टफी घर में पड़ा रहता है,यही काफी है। मैं घर की सफाई करते करते परेशान हो जाती हूं।

तब मेरा मन भी उसकी मासूमियत देखकर पसीज गया था।और मैंने हामी भर दी थी। उसके बाद से तो वह पूरे समय मेरे पीछे पीछे ही घूमा करता था।जब मैं घर के अंदर प्रवेश करता था तो वह घर की ड्योढ़ी के बाहर बैठकर घर के अंदर झांकता रहता था और उधर टफी शाही ठसक के साथ पूरे घर में विचरता रहता।अंदर सोफे पर बैठकर उसे मुंह चिढ़ाता हुआ दिखाई देता था और बेचारा छोटू अपने आप को अछूत मानकर बाहर से ही घर में झांकता रहता था। मुझे इस बात को लेकर टीस भी होती थी लेकिन परिजनों के कारण कुछ कह नहीं पाता था। गर्मी के दिनों में एक दिन दोपहर के समय छोटू घर के बाहर बुरी तरह से हांफ रहा था और टफी घर के अंदर आराम से पंखे की हवा में खर्राटे भर रहा था। मैंने जब उसकी स्थिति देखी तो उसे घर के अंदर बुला लिया। पहले तो वह अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि सभी ने उसे डरा रखा था किन्तु मेरी ओर से आश्वस्ति पाकर वह सीधे मेरी कुर्सी के नीचे आकर पसर गया। शायद उसे लगा था कि कोई कुछ कहेगा भी तो मैं उसका पक्ष लेने के लिए हूं ही।

एक बार जब उसका गृह प्रवेश हो गया तो उसका डर भी शायद खत्म सा हो गया। कुछ समय के बाद तो टफी का पलंग भी उसने हथिया लिया था और जब भी वह उसपर बैठने की कोशिश करता तो उसका गुर्राना शुरू हो जाता।कई बार दोनों के झगड़े भी तो मुझे ही सुलझाने पड़े। हां,छोटू ने हर जगह अधिकार जमाना शुरू कर दिया था लेकिन उसकी मासूमियत सबका दिल जीत लेती थी।

एक बार की घटना मुझे याद आ रही थी जब भावना बड़े गुस्से में मेरे स्टडी रूम की तरफ आई और बोली – “ पापा,आपने छोटू को बहुत बिगाड़ दिया है। आप पर बस एकमात्र छोटू का ही अधिकार रह गया है।आज तो उसने हद कर दी जब आपके नाती को ही उसने स्टडी रूम में घुसने नहीं दिया।जब तक आप यहां बैठते हैं,वह भी आपकी कुर्सी के नीचे बैठा रहता है और दूसरे किसी भी आने-जाने वाले पर गुर्राना शुरू कर देता है।” तब मैं बस मुस्कुरा कर रह गया था। वैसे भी छोटू इतना वफादार था कि घर और बगीचे के चारों ओर जरा सी भी आहट होने पर दौड़ पड़ता था। कई बार तो बगीचे में सर्प और दीवड़ निकल आने पर उसी ने हमें सचेत किया था। 

सुबह शाम जब मैं बगीचे में घुमता तो मेरे पास गेंद लेकर आ जाता, इधर उधर दौड़ लगाने लगता, बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह। जब मैं बगीचे में कुर्सी पर अखबार पढ़ रहा होता तो मेरे पैरों को चाटने लगता।जब वह आया था तब उसका नाम तो शेरू रखा था लेकिन नाती रोहन ने उसकी कद-काठी और हाव-भाव देखकर उसका नामकरण छोटू कर दिया था और हम सभी उसे छोटू नाम से ही पुकारने लगे थे।

यही सब विचार करते -करते ट्रेन से उतरकर रिक्शा में सवार होकर हम कब घर पहुंच गए,पता ही नहीं चला।मेरी विचार तंद्रा तो तब भंग हुई जब रिक्शे वाले ने कहा – “बाबूजी,गेट खुलवा लीजिए, ऑटो अंदर ही ले चलता हूं।”

इतने में सविता ने किशन को फोन कर दिया और उसने आकर गेट खोल दिया। मैंने दुखी मन से घर के दरवाजे पर लगा ताला खोला ही था कि बाहर के गेट से दौड़ता हुआ छोटू मेरे कदमों में आकर लौट लगाने लगा।मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, आंखें नम हो गई,किशन भी विस्मय से देख रहा था और सविता की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह चमत्कार कैसे हो गया और उधर किशन सफाई दे रहा था कि बाबूजी,हो न हो,अपना छोटू डर के कारण इतने दिनों तक कहीं इधर उधर छुपा रहा और आपको देखकर घर लौट आया।जो कुत्ता ट्रेन से कटा था,वह छोटू से मिलता जुलता मोहल्ले का कुत्ता रहा होगा!

आदरणीय  महोदय 

सादर नमस्कार

संलग्न कहानी प्रकाशनार्थ   प्रेषित कर रहा हूँ । रचना मौलिक होकर स्वरचित एवं अप्रकाशित  है।

  कृपया प्रकाशित कर अनुगृहीत करेंगे।रचना स्वीकृति/अस्वीकृति से अवगत कराने का कष्ट कीजिएगा।

सादर 

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तुम आओ

कविता

तुम आओ

संजय कुमार सिंह

तुम आओ

आँखों में स्वप्न

डालियों में फूल

कि जैसे गाँव में स्कूल।

तुम आओ

जैसे देहरी पर दीप

साँसों में प्रीत,

होंठों पर गीत।

तुम आओ

नदियों में पानी

नसों में जवानी

यादों में रवानी बनकर।

तुम आओ

दाने में दूध  

दिल में उम्मीद बनकर

चाँद, तारे  तितली, बादल, मोर , सोन चिड़ैया…

तुम आओ

जैसे आती है सुबह

अँधेरे और सारी दूरियों को 

पाटकर!

कैसे विदा करोगी?

तुम किसे विदा करोगी

कुछ दोस्त, कुछ सखा,कुछ सहचर

कोई चिट्ठी, कोई याद..

प्यार विदा नहीं होगा!

वह बरसेगा मेह बनकर

खिलेगा फूल बनकर

बहेगी नदी तो उसकी धार में प्यार

बहेगी हवा, तो हर झोंके में प्यार

हर बेचैनी, हर गुस्से का विलोम प्यार!

आदमी तो आदमी

पत्थर पर अंकित चित्रलिपियों में भी 

युगों से अब तक अक्षुण्ण है वह

जो बैठा है मन में देहरी अगोर कर

उसे कैसे विदा करोगी?

साँझ से भोर तक

और भोर से साँझ तक

जो निहारता है हर छवि में चितचोर

उसे कैसे विदा करोगी?

तुम बुलाओ तो,,,

सुनो,

चुका हुआ तीर नहीं हूँ

न भटकी हुई  चिट्ठी

और न दिलजले की याद

कि लौटूँ ही नहीं।

तुम बुलाओ 

तो लौट आऊँगा!

जैसे लौटते हैं वसंत में फूल

जैसे लौटती हैं सावन में

बारिश की बौछाड़ें 

और

जैसे जल्दी से लौटती है

रात के गझिन अँधेरे के बाद

पहाड़ पर सुबह !

संजय कुमार सिंह

कटिहार  -854105

9431867283

( जन्म- 21 मई 1968 ई.नयानगर मधेपुरा बिहार।

शिक्षा- एम.ए. पी-एच.डी(हिन्दी)भा.वि.भागलपुर।

रचनात्मक उपलब्धियाँ- 

हंस, कथादेश, वागर्थ, पाखी, दोआबा, साखी ,नवनीत, साहित्य सरोज, हिन्दुस्तानी जबान, मधुराक्षर ,प्राची, शब्दिता,नव किरण, मानवी, हस्ताक्षर, परिकथा, हिमतरु, अहा जिंदगी, कथाक्रम, कथाबिंब, ककसाड़, किस्सा, अक्षरा, विपाशा, गगनांचल, पश्यंती ,आजकल, वर्त्तमान साहित्य, दूसरा मत, कहन, नया,  गूंज, संवेद, संवदिया, पल,प्रतिपल, सृजन लोक,साहित्य यात्रा, पाठ, सृजन सरोकार, हिमाचल साहित्य दर्पण, मुक्तांचल, संवेद, संवदिया, संस्पर्श, वेणु, अर्य संदेश, कला,वस्तुत:,आलोक पर्व, उमा, अर्य संदेश,अभिनव इमरोज, गूँज, शीतल वाणी, अलख, एक और अंतरीप, लोकमत, स्वाधीनता, शोध-सृजन, समकालीन अभिव्यक्ति, सरोकार,समय सुरभि अनंत, एक नयी सुबह, परती पलार, दि न्यूज आसपास, छत्तीस गढ़ मित्र, अनामिका, जनतरंग,उमा, किताब, चिंतन-सृजन, दैनिक हिन्दुस्तान, नई बात, जनसत्ता, प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ,आलेख व समीक्षाएँ प्रकाशित।

प्रकाशित कृतियाँ-

1 टी.वी.में चम्पा (कहानी संग्रह) सस्ता साहित्य मंडल दिल्ली

2 रंडी बाबू ( कहानी- संग्रह)जे.बी.प्रकाशन नई दिल्ली

3 कैसे रहें अबोल( दोहा-संग्रह)यश प्रकाशन दिल्ली

4 धन्यवाद-( कविता संग्रह) नोवेल्टी प्रकाशन पटना।

5 वहाँ तक कोई रास्ता नहीं जाता-(कविता-संग्रह)अधिकरण प्रकाशन दिल्ली।

6 लिखते नहीं तो क्या करते-(कविता-संग्रह) वही।

7 रहेगी ख़ाक में मुंतज़िर-(उपन्यास) वही

8 सपने में भी नहीं खा सका खीर वह!(उपन्यास) वही

9 समकालीन कहानियों का पाठ-भेद( आलोचना की पुस्तक)यश प्रकाशन दिल्ली।

10- कास के फूल( संस्मरण)वही

सम्प्रति- प्रिंसिपल,डी.एस. कालेज कटिहार  -854105

9431867283

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परिंदे तेरी जात क्या?

कविता

परिंदे तेरी जात क्या?

ए के अर्चना

परिंदे तेरी जात क्या?
अक्सर आसमान में,
परिंदों को उड़ते देखती हूं तो,
यह खयाल आता हैं,
क्या मनुष्यों की तरह,
पशु पक्षी, जानवर भी,
जात – पात के,
भेद भाव में बंट जाता हैं।
कैसे स्वच्छंद विचरण करते हैं,
ये आकाश, नभ और थल में,
इनके पैरों में धार्मिक,
भेद भाव की जंजीरें नहीं हैं।
मनुष्य तो परिंदों से भी गया बीता हैं,
वो जात पात के नाम पर,
अपनी मनुष्य जाति को ही,
पूरी तरह से मिटाने बैठा हैं,
कुछ सीख, हे मनुष्य!
इन परिंदों से,
वरना एक दिन ऐसा आएगा,
तू जात पात के नाम पर,
एक दूसरे की जान ले लेगा और
यहीं परिंदा मज़े से,
अपने परिवार के साथ,
तुम सबको खाएगा।
परिंदों में भले ही मनुष्य की तरह,
सोचने समझने की शक्ति नहीं हैं,
पर उसमे अपने साथियों के साथ,
एक जुट होकर रहने की भक्ति सही हैं,
सीख ले मनुष्य!
इन परिंदों से कुछ,
वरना….
तेरी जात पात की लड़ाई में,
तू हार जाएगा,
मनुष्य जाति का नामों निशान,
इस धरती से मिट जाएगा,
और तेरे जाने के बाद,
ये परिंदा ही अपने,
परिवार और साथियों के साथ,
इस धरती पर रह जाएगा….
इस धरती पर रह जाएगा….

– ए के अर्चना
हिंदी विभागाध्यक्षा,
सैंट मैरिज सेंटेनरी डिग्री कॉलेज,
सिकंदराबाद, हैदराबाद।
सेल नंबर: 9966191991
मेल आईडी: archanashah434@gmail.com

आत्म परिचय: आपका नाम ए के अर्चना है। ये सैंट मैरिज सेंटेनरी डिग्री कॉलेज, सिकंदराबाद में हिंदी की सभाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।इन्होंने बी.एड (हिंदी), एम.ए (हिंदी) में शिक्षण ग्रहण किया हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इनका 17 साल का अनुभव रहा है। इनकी हिंदी और अंग्रेज़ी में कविताएं करने की रुचि रहीं है। इनकी कविताएं बहुत सारी प्रकाशन संस्थाओं के साथ जुड़ी है। अभी तक आपके कई प्रकाशन अलग – अलग संस्थाओं के साथ हो चुके है। अर्चना जी *तेलंगाना* की निवासी है और हिंदी की कुशल प्राध्यापिका है। आप विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों में हमेशा सक्रियता से भाग लेती है तथा साहित्य के प्रति पूर्णत: समर्पित है।

इनका खुद के “इंद्रचाप” एवं “पढ़ ले! मैं तेरी किताब हूं” नामक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इंडियन इंग्लिश पोएट्री एंथोलॉजी बाय यंग माइंड्स, आफरीन, दी गांधी एंड व्हर्लविंड, सृजन ऑस्ट्रेलिया, ब्रिथ इन लव : ए वैलेंटाइन कलेक्शन, स्पार्कल्स विथ इन मी: (वॉल्यूम 8,9,10,11,12,13,14,15), सांझ, एलेशियन मैगजीन, ओपन माईक कॉम्पिटिशन विन्नर, पर्सनल इंटरव्यू इन द अनहर्ड स्टोरीज बाय नोशन प्रेस पब्लिकेशंस, द मिनिएचर इंडियाना, विंटर डायरीज, मेटोनिया, इरेनिक 9.0, रहगुज़र, द स्प्लैश ऑफ कलर्स, एवेनोइर मैग्ज़ीन, ब्लू मून राइटिंग्स, अनुकर्ष वॉल्यूम नंबर 2, श्रावणधारा, कविताओं का आशियाना, ओपन डोर : किन्नर विमर्श पत्रिका : तालियां : दर्द और मुस्कान, फेलियर आर द पिल्लर ऑफ़ सक्सेस, कलरफुल, हैप्पीनेस : द आर्ट ऑफ लिविंग, फेयरी लैंड, विशेज़, प्रेम की पंखुड़ियां, ईश्वर ही प्रेम हैं, भावनाओं की गूंज, एक मुलाकात, दिवाली: द फेस्टिवल ऑफ लाइफ़, केज्ड बर्ड, ऑटाम आदि इनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं। कलकत्ता के समाचार पत्रों में भी आपकी कविताएं प्रकाशित हो चुकी है। इनकी अभी नई किताब प्रकाशित होने वाली है जिसका नाम है ” ख्वाबों के दरमियान” जिसकी प्रस्तुतिकरण “seven wonders”से हो रही है। जिसकी आप ही संस्थापक है।

इन्हें “इंडियन इंग्लिश पोएट्री एंथोलॉजी बाय यंग माइंड्स” में ” बेस्ट कवियित्री पुरस्कार” से सम्मानित किया गया और “द अनहर्ड स्टोरीज” के “ओपन माईक कॉम्पिटिशन” में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ तथा इनका इंटरव्यू एलेशियन फॉरेन मैग्जिन में छपा। इन्होंने अभी तक 50 से ज्यादा प्रकाशन गृहों में कार्य किया है। इनकी रचना सावन की फुवारों के लिए इन्हें काव्य शिरोमणि अवार्ड दिया गया। आपका प्रयास रहेगा कि ये आजीवन अपनी कविताओं को प्रकाशित करेंगी और सबके मन में अपना स्थान बनाएंगी।

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स्त्री विमर्ष : दृष्टि

कविता

स्त्री विमर्ष : दृष्टि

अजय कुमार झा.

वैचारिक संशय के युग में

नवीन प्रतिमान के गढ़ने में

‘फ्यूडल माइंड सेट’ से जूझते

गर आँखे चुराता                                             

नजर आये वर्त्तमान 

अतीत के झरोखे में 

दृश्यमान है संदर्भ

डुबकियाँ लगाते नजर आयेंगे                        

समस्याओं के समाधान .

संश्रय-समर्पण साधिका स्त्रित्व

महाकाव्य की हैं नायिकाएँ

विवश गंधारी का 

हस्तिनापुर प्रत्यार्पण

अस्मिता-अस्तित्व हरण से

महिमामंडित हुआ अपहरण

नेत्रहीन पुरूष संग 

नेत्रहीनता की शपथ

गौरवान्वित हुई

 नारी भावना प्रतीक

राष्ट्रीय अस्मिता रागरत

शकुनी बिसात पर

पंचाल-हस्तिनापुर 

चौसर के दाँव चढ़ी द्रौपदी

पराजित पुरूषत्व का 

मूल्य चुकाती स्त्रित्व

माध्यम बनी-सिढ़ी बनी                                     

बनी गंतव्य मंतव्य साध्य.

वह हाँफ रही है

वह दौर रही है 

जा रही है 

हरेक खूँटे के नजदीक

देखती रही

हरेक की उठा पूंछ

सती प्रथा निषेध

तीन तलाक बंदी

निर्भया कांड और नारी अधिकार!

“नारीवाद” विद्रोह

प्रतिकारात्मक सामंजन

 सब ढाक के तीन पात!

स्मरित हो आये कवि धूमल के शब्द

” लोहे का स्वाद, 

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो, 

जिसके मुँह में लगाम है।”

याद आता है, 

शरतचंद्र के कथाओं का 

श्रोता-बैकुन्ठ बाबू

जिसके समक्ष बेकार थीं

 सारी टिपण्णियाँ . 

उदभेदित हैं पाश की पंक्तियाँ

” तुम लोहे की बात करते हो                                     

           मैंने लोहा खाया है.”

           वेधना होगा                                             

           संश्रय – सामंजन का 

            प्रपंची पाखण्ड व्यूह

       गर बनना है

 सम्मानित अस्तित्ववान

छेड़ना होगा परिवर्त्तन की तान।

                  **

– अजय कुमार झा.

मुरादपुर, सहरसा, बिहार.

MSc (Physics), LLM, Diploma in Russian Language, Diploma in journalism.

Editor in Bihar state magzines & national magzines: छात्र स्वर, जनपथ, नव जनवाद, जनशक्ति आदि।

लेखन: आलेख, संस्मरण, समीक्षा, शोध पत्र, कविता आदि।

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ख्वाहिशें

कविता

ख्वाहिशें

अजय कुमार झा

तमन्ना थी सितारों की

खजूर पर अटकाया

पसीने की बूंदों ने

मिट्टी को दलदल बनाया 

भरपूर जिया सपनों में

जो मेरे अपने थे

साथ हैं आज भी सपने 

लेकिन जुबां हैं अपनी

अल्फ़ाज़ किसी और के हैं 

गर्दनों को तलब करती

म्यानों में थीं तलवारें

शोर है शहर में कातिलों की

खोजती तलबगारों के सर

सौंप दी सादी अर्जी मैंने

अपने रूखसत की

बिना हस्ताक्षर की

सपनों के सागर ने उछाला

अपनी गहराई से मुझे

मुर्दा नहीं होते सपने

हां लोग मरते हैं

लहरें जुदा नहीं किनारों से

सपने जुड़े हैं जिंदगी से

मुख्तलिफ मुर्दों से।

—————————————–

अजय कुमार झा

मुरादपुर,सहरसा, बिहार।

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पेड़ और नदी

कविता

पेड़ और नदी

अनिल कुमार 'निलय'

पक्की सड़क है मेरे गाँव जाती,
छोटी नहीं है;बडी बात साथी।
मुझे पग में पगडंडियों की है चाहत,
सड़क कोई कब दिल के द्वार जाती?
होकर शहर से बहरा मैं निकला,
मुझे गाँव की एक झोपड़ बुलाती।
आंटी मेरे गाँव तक जा चुकी हैं,
ढूँढू कहाँ बोलो;मैं अपनी काकी।
पक्के हुए जा रहे सारे मन्दिर,
घरों तक पहुंचने लगी पक्की माटी।
स्वागत में लग जाता था गाँव सारा,
किसी के भी घर जब बारात आती।
पेड़ और नदी पूजने की रवायत,
निलय! गाँव से जा रही है ये थाती।।

– अनिल कुमार ‘निलय’
राजकीय हाईस्कूल सराय आनादेव प्रतापगढ़,उ०प्र०
मो०- 7275387346

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वचनबद्धता

कविता

वचनबद्धता

डॉ. सुरेश अवस्थी

तुम में से

कौन  “लव”  है

और कौन ‘‘कुश’’ !

पहले ये बताओ,

फिर इसका मुहरांकित

प्रमाण प्रस्तुत करो

तुम्हें….निराश्रित…निष्काषित

माँ ने जन्म दिया है,

साथ ही यह घोषणा करते हुए कि

तुम्हें कतई पता नहीं है कि

तुम्हारा पिता कौन है

उसके

इस धरती पर होने का

प्रमाण एकत्र करो,

तब, सरयू पार करके

मेरे पास आओ

मैं तुम्हें अनाथालय में

एक-एक मीटर ज़मीन

और एक-एक टाट का टुकड़ा

दिलाने के लिए वचनबद्ध हूँ !!

डॉ. सुरेश अवस्थी

अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि

राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त शिक्षाविद्

एवं वरिष्ठ पत्रकार

निवर्तमान विभागाध्यक्ष (हिंदी):

गुरुनानक कॉलेज, कानपुर

सम्बद्ध: दैनिक जागरण, कानपुर

सम्पर्क: 117 एल, 233 नवीन नगर, कानपुर-208026

9336123032, drsureshawasthi@gmail.com

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वह श्रमिक है

कविता

वह श्रमिक है

अशोक कुमार बाजपेई

अखिल ब्रह्मांड अंड सा दिखता जिसे

स्वर्ण पृष्ठों पर इतिहास है लिखता जिसे

हिमालय शिखर पर

सूर्य जैसा जो उगा है

प्रात जिस की आवाज सुनकर

प्रकाश पुंज बनकर जगा है

कौन है वह

चल रहा जो

लिए गति क्रमिक है

अजेय योद्धा

विश्व पथ का वह श्रमिक है

कौन बंजर धरा की गोद में पौधे उगाता

कौन धरती के वक्ष पर दीवारें उठाता

लौह दानव से युद्ध दिन भर

लड़ता कौन है

सिर पर धरे आकाश सारा

हिमगिर पर चलता कौन है

कौन है वह

जो पसीने के मोतियों से

नव धनिक है

सृष्टि भर का बोझ ढोता

वह श्रमिक है

– अशोक कुमार बाजपेई

वरिष्ठ साहित्यकार

मोबाइल- 9450329618

कानपुर, उ.प्र.

9336123032, drsureshawasthi@gmail.com

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प्रेम का पंथ कराल महा

व्यंग्य

प्रेम का पंथ कराल महा

पूरन शर्मा

                बदकिस्मती से खैर शक्ल-सूरत तो हमें आलू-बुखारे सी मिली ही है, साथ ही कभी किसी हसीना ने हमारी तरफ देखने की भूल भी चाहे-अनचाहे रूप से नहीं की है। मौहल्ले की अनारकली को पता था कि हम उस पर जान छिड़कते हैं और वह ‘वन साइडेड गेम’ एक लंबे अर्से से चल रहा है, पर हाय री किस्मत उसने कभी हम पर देखने तक की इनायत नहीं बरती, उल्टे एक दिन रास्ते में हमारे गालों पर हाथ फेरकर अनारकली ने हमें बच्चों की तरह समझाया भी-‘मेरे बच्चू सलीम, तुम्हारे घर के तमाम बुजुर्ग मेरी आशिकी की कतार में वर्षों से खड़े हैं, तुम्हें उस लाइन में लगना वैधानिक रूप से ठीक नहीं है, अच्छा हो तुम अभी पढ़ो, लिखो और सुनो आगे से कभी सीटी बजाई तो तुम्हारे इस मासूम थोबड़े का भुरता बना दूँगी।’

हिम्मत करके मैंने धीरे से कहा-‘लेकिन मैं आहत हूँ वन साइडेड गेम से।’

‘वन साइडेड गेम’ का अंजाम बुरा होता है मेरे नादान सलीम। अभी तुम अनुभवहीन नए मरीज हो। थोड़ा प्रेम में गच्चा खाओगे तो अनारकली से नैन लड़ाने के खामियाजे का पता चल जाएगा। फिर सलीम प्रेम का पथ बड़ा कठिन होता है, इस पर चलना बड़ा टेढ़ा कार्य है। जाओ गैस पेपर और पास बुक्स पढ़कर बी.ए. पास करने का जुगाड़ करो। ऐसे भी अनारकली से क्या उलझे कि पांच वर्ष में भी स्नातक नहीं बन सके। अनारकली ने व्यावहारिक सलाह दी।
परन्तु हमें तो प्रेम का दंश लग चुका था। अतः निरी मासूमियत से बोले-‘अनारकली, छोड़िए भी इस बी.ए., एम.ए. के चक्कर को, आपकी जुल्फों की छांह मिले तो जीवन की तमाम डिग्री व डिप्लोमा एक साथ हासिल कर लें। वर्षों से आस लगाए बैठे हैं परन्तु आपने कभी इस कद्रदान की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखा है, भला दीवानों पर ऐसा भी क्या कोफ्त ?’

अनारकली ने सिर के बाल पकड़े और मुझे पूरा झिंकोड़ कर कहा-‘सुनो सलीम, पानी सिर के ऊपर से होकर गुजरे, उससे पहले तैरना सीख लो वरना अनारकली के प्रेम दरिया में गिरकर तबाह हो जाओगे।’
यह कहकर अनारकली तो चली गई, परन्तु हमारी दशा और भी बदतर थी। हमारा ख्याल था कि चलो अनारकली ने किसी बहाने बातचीत तो की और ईश्वर ने चाहा तो जल्दी ही परिणाम अच्छे रूप में सामने आएंगे। एक दिन अनारकली सब्जी खरीद रही थी।

हमने जाकर प्रस्ताव किया-‘सब्जी का थैला हमें दे दीजिए, आपकी नरम कलाइयां भला आलू और टमाटर अथवा गोभी का वजन बरदाश्त करने लायक नहीं हैं।’ अनारकली ने कनखी से देखा और मुस्कुराकर थैला हमें थमा दिया। हम उनके पीछे-पीछे थैला लिए घूमते रहे और वे थैले को भरने में लगी रहीं।

हालांकि हमारे हाथ जवाब देने लगे थे, परन्तु हार मानना तो प्रेम में परास्त होना था। साथ ही अनारकली स्वयं कह चुकी थी कि प्रेम का पंथ बड़ा कठिन होता है। अतः थैला हाथों में बदलते पसीने पोंछते रहे। दस किलो वजन डलवाने के बाद अनारकली ने घर की सुध ली, हमने प्रस्ताव रखा-‘रिक्श ले लेते हैं।’

वे बोलीं-‘घूमते-घामते, बातचीत करते चलते हैं सलीम।’

हम तो धन्य हो गए, थैले का दस किलो वजन कम होता लगा। तभी अनारकली को पता नहीं क्या सूझा, वह पलटी और बोली-‘सुनो आज एक पूरा कद्दू भी लेना है।’

कद्दू का नाम सुनते ही चेहरा पसीने से भीग गया। अनारकली ने ग्यारह किलो का एक कद्दू खरीदा और धर दिया मेरे सिर पर। मैंने कहा भी कि मैं उनका सलीम हूँ। मुझ पर थोड़ा सा रहम खायें। परन्तु अनारकली ने फिर यही बात कहकर चुप कर दिया कि प्रेम का पंथ बड़ा कठिन होता है। हमने सोचा हो सकता है कि दुनिया के सभी प्रेमी इसी तरह पहले कद्दू ढ़ोते रहे हों। अतः हाथ में थैला तथा सिर पर कद्दू उठाए हम चलते रहे। परन्तु आधे रास्ते तक आते-आते तो सारे हौंसले जवाब देने लगे तथा प्रेम का कपूर उड़ने लगा। हमने कहा-‘थैला तो आप ले लीजिए अनारकली जी।’

वे बोलीं-‘मेरी ये नरम कलाइयां भला गोभी और आलू का वजन उठाएं और आप देखते रहें, यह कैसे होगा ?’
‘फिर रिक्शा कर लीजिए।’ मैंने कांपते और लड़खड़ाते कदमों से चलते हुए कहा।
‘रिक्शा से घर जल्दी आ जाएगा सलीम।’

‘मैं भी तो यही चाहता हूँ मेरे मौहल्ले की अनारकली।’ हमने कहा।
अनारकली बोली-‘मुझे तुम्हारा साथ थोड़ा ज्यादा समय चाहिए। फिर अभी पहले फोटो स्टूडियो चलकर तुम्हारा यह पोज भी उतरवाना है।’

‘लेकिन मेरा कसूर क्या है ?’
‘प्रेम की सजा तो भुगतनी ही पड़ती है सलीम। मजनूं, फरहाद और हीर ने क्या-क्या नहीं किया था अपनी नायिकाओं के लिए। तुम एक कद्दू ले जाने में नाक भौं सिकोड़ रहे हो।’ अनारकली ने कहा।
हमने पूछा-‘लेकिन तुम इतने बड़े कद्दू का करोगी क्या ? इससे पहले तो तुमने इतना बड़ा कद्दू नहीं खरीदा ?’
‘तुम्हें पता नहीं है सलीम, पूछो तुम्हारे बुजुर्गवारों से, वे कितनी बार कद्दू, तरबूज और खरबूजे अपने सिर पर ढ़ोकर अपनी खोपड़ी पिलपिली करवा चुके हैं।’

‘परन्तु अब मैं ज्यादा दूर नहीं चल सकता। देखो बाजार के तमाम लोग मुझे देखकर हंस रहे हैं। मेरी थोड़ी तो इज्जत करो।’ मैंने गुजारिश की।

परन्तु अनारकली ने कहा-‘जब प्यार किया तो डरना क्या। लोगों की परवाह मत करो सलीम। उन्हें पता है आशिक का कचूमर इसी तरह निकलता है।’

पसीने से नहाया मैं अन्तर्द्वन्द्व का शिकार था। तभी मेरा स्वाभिमान जागा और मैंने कद्दू को रास्ते में फेंक दिया। अनारकली ने तैश में मुझे घूरा और कहा-‘यह क्या किया तुमने सलीम ?’
मैं आसमान से तारे ला सकता हूँ अनारकली, परन्तु बाजार से कद्दू कभी नहीं लाऊँगा।
तो फिर कान खोलकर सुन लो, ‘मुझे भी तारों की जरूरत नहीं है। मुझे कद्दू चाहिए, कद्दू। प्रेम का दंभ भरते हो और पता नहीं है इसके रास्ते में कितने कांटे हैं।’ अनारकली ने मुझ पर थूका।

हमने कहा-‘कांटे बर्दाश्त कर सकता हूँ परन्तु कद्दू नहीं।’
‘अनारकली ने एक नहीं सुनी और वह हाथ से थैला छीनकर रवाना हो गई। मुझे भी लगा कि वाकई प्रेम का पंथ बड़ा कठिन है। अनारकली को पाना उतना सहज नहीं है। जितना हमने समझा था। इससे बढ़िया तो ‘वन साइडेड गेम’ ही है। जिसमें कद्दू तो सिर पर नहीं रखना पड़ता। फिर भी मैं रास्ते में लुढ़के हुए प्रेम के प्रतीक कद्दू को काफी देर तक निहारता रहा, इच्छा हुई इसे ही घर ले चलूं।’

मौलिक एवं अप्रकाशित व्यंग्य

(पूरन सरमा)
124/61-62, अग्रवाल फार्म,
मानसरोवर, जयपुर-302 020,
मोबाइल-9828024500

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बेचारा दिल क्या करे

व्यंग्य

बेचारा दिल क्या करे

मेघा राठी

ये दिल भी न, बहुत नाशुक्री चीज है। जरा-जरा सी बात पर टूट जाता है तो कभी छोटी सी बात पर खुश हो जाता है…कभी बेवजह धड़कने लगता है तो कभी …कभी किसी पर आ जाता है।

यूं तो दिल को किसी को दे पाना बिना सर्जन के संभव ही नहीं पर फिर भी हम दिल किसी को दे बैठते हैं … हां एक बात जरूर है कि दोनों ही तरह से दिल देने के लिए इंसान को मरना तो पड़ता है।

दिल में भावनाएं नहीं होती, उसका काम तो खून को पंप करना है लेकिन फिर भी दिल उदास होने का और खुश होने का क्रेडिट भी ले लेता है।

और दिल को चीरने पर वैसे तो खून निकलता है लेकिन गानों में कहा जाता है कि दिल चीर के देख तेरा ही नाम होगा।

मैं तो सोचती हूं कि दिल कितना बेचारा है। प्राइवेट कंपनी के एम्प्लोई जैसा जिसे रखा तो किसी और काम के लिए जाता है लेकिन उसे अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए एक्स्ट्रा काम भी करने पड़ जाते हैं।

दिल को जलना भी पड़ता है, सुलगना भी पड़ता है तब जाकर उसके मालिक का प्रेमी या प्रेमिका उस पर मेहरबान होकर उसके दिल को ख़ाक होने से बचाने आते हैं।

बेचारा क्या… क्या नहीं करता पर फिर भी सुनता है… ए काश कहीं ऐसा होता कि दो दिल होते सीने में। मतलब एक अकेले के काम की कद्र भी नहीं। कभी दिल खो जाता है तो कभी भंवरा बन जाता है। कभी दिल में किसी को बसा लिया… अरे भईया दिल है कमरा नहीं लेकिन नहीं…. शायर तो लिख गए … मेरे दिल में कमरा कर लो, न हम लेंगे सिंगिल पाई। तो बस कोई पसंद आया तो उसे दिल के कमरे में जगह दे दी और कमरा तो बड़ा होता है तो और लोग भी एडजेस्ट कर दिए जाते हैं उसमें।

कुछ लोग कहते हैं कि हम तो दिलवाले हैं… बेड़ा गर्क… बाकी लोग दुनिया में बिना दिल के पैदा होकर जी रहे हैं।

फलाने का दिल बड़ा है, उसका दिल छोटा है… उसका तो दिल ही नहीं….अरे तो वो जिंदा क्या वेंटीलेटर पर है!

दिल के किस्से भी बहुत हैं, दिल के फसाने भी बहुत और यह सुनकर भी बेचारा दिल केवल धक-धक करके ब्लड पंप करता रहता है और जब ज्यादा प्रेशर में आ जाता है तो अटैक दे कर हिला देता है… नामुरादों मुझे मेरा काम करने दो, ओवर प्रेशर मत दो और हो सके तो अपने प्रेमी या प्रेमिका के दिल की तरह अपने दिल का भी ख्याल रखो, थोड़ा खाने पीने पर ध्यान दो और खुशियों को महसूस करो …. साथ ही दूसरे को भी खुश रखो, तब दिल भी सुकून पाएगा और खुश होकर जाएगा…

धड़कने लगे दिल के तारों की दुनिया, संवर जाए हम बेकरारों की दुनिया, जो तुम मुस्कुराओ,

जो तुम मुस्कुरा दो….

अब ये दिल के बीमार इस बात को समझें तब न!

– मेघा राठी

भोपाल, मध्यप्रदेश

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उपहार

लघुकथा

उपहार

डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा

चारपाँच स्कूली बच्चों के द्वारा छः डस्टबीन माँगने पर दुकनदार ने यूँ पूछ लिया, “क्या बात है बच्चों, सबके सब एक साथ डस्टबीन कैसे खरीद रहे हो ? लगता है तगड़ा डिस्काउंट चाहिए।”   

एक बच्चे ने बताया, “हाँ अंकल जी, डिस्काउंट तो चाहिए ही हमें। पर ये हम लोग अपनेअपने घरों के लिए नहीं, स्कूल के लिए खरीद रहे हैं।

दुकानदार ने आश्चर्य से पूछास्कूल के लिए ? स्कूल के लिए तो हमेशा प्रिंसिपल साहब ही आते हैं खरीददारी करने। फिर आज आप लोग कैसे ?”

दूसरे बच्चे ने बताया, “दरअसल इस स्कूल में हमारी पढ़ाई पूरी हो चुकी है। आज स्कूल में हमारी फेयरवेल पार्टी है। इस अवसर पर हम सभी बच्चों ने फैसला किया है कि अपनी तरफ से सभी कक्षाओं और लाइब्रेरी के लिए एकएक डस्टबीन उपहार स्वरुप देकर जाएँ।

दुकानदार ने उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कहा, “बहुत ही उत्तम विचार हैं आप लोगों के। बताइए कितने प्रतिशत की छूट चाहते हैं आप लोग ?”

एक बच्चे ने कहा, “कम से कम तीस प्रतिशत की छूट तो चाहिए ही, आखिरकार एक साथ छः नग खरीद रहे हैं।” 

दुकानदार ने कहा, “सिर्फ तीस प्रतिशत ? बच्चों मुझे आप लोगों को ये डस्टबीन बेचकर कुछ कमाना नहीं है, बल्कि अपना एक पुराना कर्ज भी चुकाना है। इसलिए मैं इन पर आप लोगों को पचहत्तर प्रतिशत की छूट दूँगा।

एक बच्चे कहा, “हम समझे नहीं अंकल ? आप किस कर्ज की बात कर रहे हैं ?”

दुकानदार ने कहा, “बच्चों, कभी मैं भी इस स्कूल का विद्यार्थी था। हमने अपने समय में फेयरवेल पार्टी में कोई उपहार नहीं दी थी, क्योंकि तब हम आप लोगों  की तरह सोच ही नहीं सके थे। आज जब मैंने आप लोगों की बात सुनी, तो लगा कि अभी देर नहीं हुई है। इसलिए आप लोग मुझे भी अपना एक साथी समझ लो।

बच्चों ने एकदूसरे की और देखा और जोर से बोले, हुर्रे

डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा

एच आई जी 408, ब्लॉक डी, कंचन अश्व परिसर, डंगनिया 

पोस्ट ऑफिस पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़ पिन 492010

9827914888

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‘‘अपना’’

लघुकथा

‘‘अपना’’

शोभा रानी गोयल

पड़ौस के घर में बच्चे की किलकारी गूंजी तो अनु का दिल बैठ गया। विवाह को दस वर्ष हो गए। अभी तक उसका दामन खाली था। एक से बढ़कर एक डाक्टरों से खूब इलाज लिया। मंदिर दिवाले सब धोक लगाये। प्रार्थना मंत्रोच्चार सब किये। नतीजा वही..सिफर।

पड़ौस में खेलते बच्चों को देखकर अनु के दिल में टीस उठी काश उसका आंगन भी गुलजार होता। जब भी अनु दुःखी होती वह गांव में अपनी सास को फोन लगाकर बात कर लेती थी। उसकी सास उसे ढांढस बंधाती एक दिन उसकी कोख ज़रूर हरी होगी। सास की बातों से अनु को हौसला मिलता। उसका दिल हल्का हो जाता।

शाम को देव घर देर से लौटा। अनु के पूछने पर देव ने ताना दिया तुमने गोद में खेलने वाला कोई खिलौना दिया है जिसके लिए घर जल्दी आऊं। देव की बात से अनुका मन उदिग्न हो गया।

इस बार अनु का मन कराह रहा था वह किसी भी तरह खुद को संभाल नहीं पा रही थी। सास ने परिस्थिति की नज़ाकत समझते हुए कहा- अनु परेशान मत हो, मैं कल तुम्हारे पास आती हूँ।

मां के घर आने से देव और अनु बहुत खुश हुए। घर में चहल-पहल हो गई मगर फिर भी कुछ कमी सी थी जिससे चेहरे बुझे हुए थे।

उन्होंने अनु और देव को समझाया- क्या हुआ यदि हम सृजन का सुख नहीं उठा सकते। इस बात का ग़म कब तक मनायेंगे। मंज़िलें और भी हैं। तुम दोनों किसी अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लो। इससे खुद का घर गुंजायमान होगा ही, साथ ही किसी का जीवन भी संवर जायेगा।

नहीं मां, पराया खून कभी अपना नहीं हो सकता। देव ने स्पष्ट स्वर में कहा।

देव की बात सुनकर अनन्या का दिल टूट गया।

ऐसा नहीं कहते देव, जिसे प्यार और स्नेह से पालोगे वह अपना कब बन जाता है पता ही नहीं चलता। मां ने देव को समझाया।

मैं नहीं मानता मां !

बरसों पहले यदि तुम्हारे पिताजी यही सोचते तो तुम अपने कैसे होते। तुम भी तो….

सच्चाई से वाक़िफ होते ही देव अवाक् रह गया।

शोभा रानी गोयल

265/25 सेक्टर-26

प्रताप नगर, सांगानेर, जयपुर 302033

मोबा.- 9571220372

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टूथपेस्ट हैं या ज़हर…!

स्वास्थ्य

टूथपेस्ट हैं या ज़हर…!

तेजेन्द्र शर्मा

यह ज़रूरी है कि विश्व भर की सरकारें इस मुद्दे की तरफ़ ध्यान दें। जिस फ़्लोराइड को अमरीका में विष कहा जा रहा है वही फ़्लोराइड भारत और बाक़ी विश्व में क्यों आसानी से बेचा जा रहा है। वैसे टूथपेस्ट बनाने वाली कम्पनियों का एक सवाल वाजिब है – हमारे द्वारा बनाए गये टूथपेस्ट से तो फिर भी आप केवल दांत साफ़ करते हैं। मगर जो फ़्लोराइड सरकारें पानी और अन्य माध्यमों से आपके शरीर में पहुंचा रहे हैं, आप उससे कैसे अपना बचाव करेंगे। क्या “फ़्लोरीफ़ाईड सरकारों” को टूथपेस्ट में इस्तेमाल किये जा रहे फ़्लोराइड से कोई फ़र्क पड़ेगा। 

हमारी पीढ़ी के बचपन में नीम और कीकर के दातुन लोकप्रिय थे। नानी दंदासा इस्तेमाल करती थीं जिससे मसूड़े और होंठ तक लाल हो जाते थे।  कुछ लोग दुबई, कुवैत से वापिस आते थे तो साथ में मिस्वाक का दातुन ले कर आते थे। उसमें से भीनी-भीनी सौंफ़ जैसी ख़ुशबू महसूस हुआ करती थी। 

श्रीलंका से बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सुनने के बाद हम भी अपने माता को बिनाका टूथपेस्ट ख़रीदने के लिये तंग करने लगे। उस टूथ-पेस्ट के साथ बच्चों को एक छोटा सा प्लास्टिक का खिलौना भी मिलता था। उसका हरे रंग का स्वाद बहुत मज़ेदार लगता था।

अपने बुज़ुर्गों में यह बहस आम सुनने को मिलती थी कि कॉलगेट पेस्ट बेहतर है या फि फ़ोरहन्स। कुछ रिश्तेदार या मित्र नीम टूथपेस्ट की वकालत करते थे। हमारे घर में गुरूकुल कांगड़ी का दंत मंजन भी आया करता था… उसे शायद पायोकिल कहा जाता था। वैसे तो बंदर छाप काला दंतमंजन भी आया करता था जबकि डाबर का लाल दंत-मंजन भी सिनेमा की विज्ञापन फ़िल्मों में दिखाई दे जाता था। 

मगर हाल ही में जब भारत की आई.एम.ए. और बाबा रामदेव के बीच कुछ विवाद खड़ा हो गया तो मैं भी सोच में पड़ गया कि आयुर्वेद और एलोपैथी सिस्टम साथ साथ क्यों नहीं एक राह पर चल सकते। तुरंत इलाज और सर्जरी के लिये एलोपैथी और बीमारी को जड़ से निकाल बाहर करने के लिये आयुर्वेदिक।

इसी सिलसिले में मेरी निगाह वह्टसऐप पर वायरल हुए एक वीडियो पर पड़ी जिसमें  कॉलगेट टूथपेस्ट में ज़हरीले पदार्थ होने की बात कही गयी थी। मैंन कॉलगेट टूथपेस्ट के कार्टन को खंगाला तो उस पर एक वार्निंग लिखी दिखाई दी – “6 वर्ष से छोटे बच्चों की पहुंच से दूर रखें। यदि ग़लती से इसे निगल लिया जाए तो पेशेवर सहायता ली जाए या फिर विष नियंत्रण केन्द्र से तत्काल संपर्क करें।” 

मैंने तुरन्त सैंसोडाइन, क्रेस्ट और अन्य विश्व भर के टूथपेस्ट की ट्यूब एवं कार्टन पर लिखी वार्निंग पढ़ीं। सभी वो टूथपेस्ट जिनमें कि फ़्लोराइड मौजूद था, यही वार्निंग थी कि 6 साल से छोटे बच्चों की पहुंच से दूर रखे जाएं। सेंसोडाइन तो 12 साल से छोटे बच्चों से दूर रखने की बात करता है। 

मैंने भारतीय मूल का होने के नाते बहुत गर्व से अपने टूथपेस्ट यानि कि बाबा रामदेव के पातंजलि दंत-कांति टूथपेस्ट की ट्यूब पर इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री पढ़ी तो भौंचक रह गया। मेरे टूथपेस्ट का पूरा नाम है – ‘Dant Kanti Advance Power Toothpaste’. इसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की पहली पंक्ति में लिखा पाया – कैल्शियम कार्बोनेट, पानी, सॉर्बिटॉल, ग्लिसरीन, सिलिका, सोडियम लेरिल सल्फ़ेट, प्रोपाइलीन ग्लायकॉल, टाइटैनियम डाइऑक्साइड, सुगन्ध, पी.ई.जी.400, सेल्युलोज़ गोन्द, पोटाशियम एलम, सोडियम बेंज़ोकेल, सोडियम सैकेरीन, ज़िंक सिट्रेट, ट्राइसोडियम फ़ॉस्फ़ेट। यदि ये सब इस टूथपेस्ट में मौजूद है तो इसे आयुर्वेदिक टूथपेस्ट कैसे कहा जा सकता है?

और मज़ेदार बात यह है कि इस टूथपेस्ट को आयुर्वेदिक औषधि कहा ही नहीं गया। और इसकी ट्यूब पर भी वार्निंग मौजूद है – “6 वर्ष या उससे छोटे बच्चे बड़ों की देखरेख में इस टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें और केवल मटर के दाने जितना पेस्ट लें। इसे निगलें नहीं। ब्रश करने के पश्चात झाग को थूक कर जल्दी से मुंह पानी से कुल्ला कर के साफ़ कर लें।”

मगर दंत-कांति के एक दूसरे मॉडल ‘नेचुरल’ जिसे कि Proprietary Ayurvedic Medicine कह कर बेचा जाता है उसमें भी कैलशियम कार्बोनेट और सोडियम बेंज़ोनेट के साथ साथ फ़्लोराइड मौजूद है। यानि कि फ़्लोराइड हर पेस्ट में मौजूद रहेगा ही चाहे पेस्ट अंग्रेज़ी हो या फिर आयुर्वेदिक। मगर वीको वज्रदन्ती टूथपेस्ट बनाने वालों का दावा है कि हमारे पेस्ट में फ़्लोराइड मौजूद नहीं है।   

जो बात मेरी समझ में आई, वो यह है कि जिस भी टूथपेस्ट में फ़्लोराइड मौजूद है, वह बच्चों के लिये नुक़्सानदेह है। मगर अमरीका में भारत के मुक़ाबले स्वास्थ्य को लेकर क़ानून अधिक सख़्ती से लागू किये जाते हैं इसलिये सन् 1991 में अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (Food and Drug Administration) ने टूथपेस्ट टयूब पर यह चेतावनी लिखवा दी थी- इसे निगलें नहीं और 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए केवल मटर के दाने के बराबर पेस्ट इस्तेमाल करें।’  यदि पेस्ट निगल लिया जाए तो  निकटतम ‘विष नियंत्रण केंद्र’ से संपर्क करने की सलाह दी गई थी। मटर के बराबर के पेस्ट में 1000 भाग प्रति दस लाख फ्लोराइड होता था अतएव निर्माताओं को दवाई के स्वाद की तरह लगने वाला टूथपेस्ट बनना चाहिए था। परंतु निर्माताओं ने इसके बजाए बच्चों के नाम के हिसाब से ऐसे ट्यूब बनाए जिनका स्वाद स्ट्राबेरी की तरह था।   

अंग्रेज़ी टूथपेस्ट केवल दाँत साफ़ करने के लिये नहीं बनाए जाते। उनके बहुत से अलग उपयोग भी होते हैं। जैसे त्वचा का कोई भाग जल जाए और जलन कम न हो तो जैसे हम बर्नॉल का इस्तेमाल करते हैं, ठीक उसी तरह जले हुए स्थान पर टूथपेस्ट लगाने से जलन कम हो जाती है और फफोले पड़ने का डर भी कम हो जाता है। 

अगर आपके घर में कांच की मेज़ है और उस पर कोई निशान पड़ जाए तो आप उसे तुरन्त अपने टूथपेस्ट से साफ़ कर सकते हैं। यानि कि आपका पेस्ट किसी ब्लीच से कम नहीं है। यदि किसी कपड़े पर लिपस्टिक या स्याही का निशान पड़ जाए तो घबराइये मत… आपके पास अपना टूथपेस्ट है न… बस थोड़ा सा टूथपेस्ट उस निशान पर रख दीजिये और देखिये अपने टूथपेस्ट का चमत्कार।

वैसे उन नवयुवतियों के लिये तो टूथपेस्ट एक वरदान है जिन्हें मुहासों की समस्या से जूझना पड़ता है। रात को मुहासों पर अपना पेस्ट लगाइये और देखिये मुहासे कैसे सूखने लगते हैं।

नारी-शक्ति के लिये तो जैसे टूथपेस्ट एक वरदान ही है। यदि गहने काले पड़ जाएं तो हल हाज़िर है… आपका अपना टूथपेस्ट! “लाख दु:खों की एक दवा है, क्यों न आज़माए!” कहा तो यहां तक जाता है कि टूथपेस्ट हीरे तक को चमका सकता है। गृहणियों के लिये तो इसका एक और ख़ास उपयोग है। यदि दूध के बर्तन में या बच्चे के दूध की बोतल में दूध की महक रह जाए तो अपने टूथपेस्ट और पानी का घोल मिला कर उस बर्तन या बोतल में डाल दें। बस थोड़ी देर में महक ग़ायब। 

यदि चेहरे पर झुर्रियां दिखाई देने लगें या फिर डॉर्क सर्कल तो बस नीबू में अपना पेस्ट मिलाइये और फ़ेसपैक बना कर चेहरे पर लगा लीजिये। और यदि आपके नाख़ूनों की चमक कम होती जा रही है तो नेल-पॉलिश साफ़ करके अपने नाख़ूनों की अपने टूथपेस्ट से मालिश करें। चमक वापिस लौटने लगेगी।

वैसे कौन है जो दर्पण में अपने चेहरे को निहारना पसंद नहीं करता! मगर कभी कभी ऐसा भी होता है कि आपका घर का आईना गंदा हो जाए या फिर धुंधला पड़ जाए तो परेशान न होइये। निश्चिंत हो कर अपने टूथपेस्ट से आईने को साफ़ कीजिये और पाइये अपना चमकदार दर्पण!

वैसे आपको यह जानकारी भी देते चलते हैं कि मिस्त्र में करीब 5,000 साल पहले टूथ-पेस्ट का आविष्कार किया गया था और करीब 3500-3000 साल पहले टूथ-ब्रश का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया था। चीन में टूथ-ब्रश के वर्तमान स्वरूप की शुरूआत शायद चौदहवीं शताब्दी में हुई। 1780 में विलियम एडिस ने टूथ-बर्श का इंग्लैण्ड में डिज़ाइन तैयार किया। इसका हैण्डल जानवरों की हड्डी से बना होता था और ब्रिस्ल सूअर के बालों से। ड्युपौँ (Dupont) कम्पनी ने 1938 में नायलॉन का आविष्कार किया तो 1950 तक मुलायम ब्रिसल तैयार होने लगे। अमरीकी डेंटल एसोसिएशन मुलायम बालों वाले टूथ- ब्रश की वकालत करती है। 

यह ज़रूरी है कि विश्व भर की सरकारें इस मुद्दे की तरफ़ ध्यान दें। जिस फ़्लोराइड को अमरीका में विष कहा जा रहा है वही फ़्लोराइड भारत और बाक़ी विश्व में क्यों आसानी से बेचा जा रहा है। वैसे टूथपेस्ट बनाने वाली कम्पनियों का एक सवाल वाजिब है – हमारे द्वारा बनाए गये टूथपेस्ट से तो फिर भी आप केवल दांत साफ़ करते हैं। मगर जो फ़्लोराइड सरकारें पानी और अन्य माध्यमों से आपके शरीर में पहुंचा रहे हैं, आप उससे कैसे अपना बचाव करेंगे। क्या फ़्लोरीफ़ाईड सरकारों” को टूथपेस्ट में इस्तेमाल किये जा रहे फ़्लोराइड से कोई फ़र्क पड़ेगा। 

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तपन मिली है छाँव से

गीत - नवगीत

तपन मिली है छाँव से

शिव कुमार सिंह "कुँवर"

मंदिर -मदिर मतवारे नयना
सबसे अलग तुम्हारे नयना !!
सरसिज समझ भ्रमर मंडराये,
देख   इन्हें  खंजन  शरमाये,
बिन काजर कजरारे नयना !
सबसे अलग तुम्हारे नयना !!
इनमें बासन्ती तरुणाई, 
रत्नाकर जैसी गहराई,
ये अनुपम रतनारे नयना !
सबसे अलग तुम्हारे नयना !!
ये मृगशावक से चंचल हैं,
इठलाते उड़ते बादल हैं,
लगे कि ज्यों बनजारे नयना !
सबसे अलग तुम्हारे नयना !!
स्नेह- श्रोत के ये उदगम हैं
करुणा, ममता के संगम हैं,
प्रीति पगे अरुणारे नयना !
सबसे अलग तुम्हारे नयना !!

– शिव कुमार सिंह “कुँवर”
वरिष्ठ गीतकार
117/117 बी,पुरानी बस्ती,काकादेव,
कानपुर-208025

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इक्का-घोड़ी सी

गीत - नवगीत

इक्का-घोड़ी सी

नंदन पंडित

भिनसारे से

साँझ तलक ले

दौड़े इक्का-घोड़ी सी

सुस्ताए ना थोड़ी सी

सूरज के काँधे पर चढ़के

दूब निपाते खेतों की

तीर ‘कुआनो’ भागी-भागी

डाली तोड़े बेंतों की

लिखने वाला

फिर भी लिखता

किस्मत वही निगोड़ी सी

एक जाँघ ढँपती

जो ले दे

दूजी नंगी हो जाती

बुनते-बुनते आँचल

चूनर भर

बदरंगी हो जाती

रह-रह पानी छोड़े तंगी 

कूद-कूद

मेंघौड़ी सी

आशाओं के बाल

पक गए

बूढ़े हुए कगार खड़े

आश्वासन के

बजे झुनझुने

बिकते गए सितार बड़े

बदल-बदल के रूप

छलावे

पीटा करें थपोड़ी सी

(स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित)

 नंदन पंडित

इटियाथोक, गोण्डा-उत्तर प्रदेश 

मो॰ न॰ 9415105425

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कवि का आत्मकथ्य

गीत - नवगीत

कवि का आत्मकथ्य

पीयूष अवस्थी

मैं कवि नहीं, नहीं हूँ शाइर,

गीत नहीं,

मैं तो सारी दुनिया का,

अन्तर्मन हूँ!

चिंगारी में लिपटा

अपना चन्दन है,

मेरी मौलिकता तो

मेरा क्रन्दन है,

हमसे ही स्थापित

युग आधार शिला,

यद्यपि रहा उपेक्षित

अपना वन्दन है,

घटनाओं को बाँधे,

अपनी बाँहों में,

खेल गया जो सुधियों से,

मैं वो क्षण हूँ!

मैं काँटों में फूल

खिलाने आया हूँ,

सच्चाई का पंथ

दिखाने आया हूँ,

मैं शाश्वत स्वर हूँ

इस सोनिल धरती का,

मैं दुनिया का दर्द

मिटाने आया हूँ,

मैं जीवन के आँगन की

रंगोली हूँ,

अँधियारों में चमक उठे

मैं वो कण हूँ  !

जीवन भर का स्वर्ग

हमारी आँखों में,

अमृत वाले फल हैं

अपनी शाखों में,

किस घाटी से कल

सूरज का उदगम है,

एक तीसरी आँख

हमारी पाँखों में,

गहन तिमिर में, मैं उजियारी

आशा हूँ ,

हार-जीत के सम्बन्धों

वाला रण हूँ !

मैं जन-मन का

एक अथक विश्वास रहा,

सूरज, चाँद, सितारों का

आकाश रहा,

भावुकता जैसे तो 

मेरे गलियारे,

संस्कृति वाले चरणों का

अधिवास रहा,

युग-युग तक युग गायेगा

ये गाथायें,

मैं समाज का अक्षय

सुन्दर दर्पण हूँ!!   

– पीयूष अवस्थी

मुख्य संपादक

शब्दकार प्रकाशन

एवं ‘‘शब्दकार पत्रिका’’

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अधरों में प्यास बो गया

गीत - नवगीत

अधरों में प्यास बो गया

जयराम जय

सिमट गये
इन्द्र धनुष बाँहों के
आकुल आकाश हो गया

नाच रही किरन-किरन
रंग का रचाव लिये
शब्द-शब्द प्राण हँसे
प्यार का प्रभाव लिये

हौले से
तोड़ बाँध संयम के
अधरों में प्यास बो गया

बहकती बहार हँसी
मौसम के संग -संग
नेह बेल छैल गई
तरुवर पर अंग-अंग

अधरों में
महक गया चन्दन वन
जाने क्या खास हो गया

आतुर थे दोनों तट
मिलने को आर-पार
नदिया में डूब -डूब
जाने को बार-बार

दहक रही
मधुगन्धी साँसों को
सोंधा विश्वास हो गया
सिमट गये
इन्द्र धनुष बाँहों के
आकुल आकाश हो गया

– जयराम जय
‘पर्णिका’ बी-11/1, कृष्ण विहार
आवास विकास, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र.)
मो.नं.9415429104 ;9369848238
E-mail-jairamjay2011@gmail.com

 

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फूल हरसिंगार के

गीत - नवगीत

फूल हरसिंगार के

जयराम जय

मन उपवन में खिले
फूल हर सिंगार के

मानता नहीं समीर
अस्थिर प्रतिबन्ध को
साथ दिया विम्बों ने
स्वास की सुगन्ध को

अधरों में सिमट गये
अक्षर   मनुहार   के

पायलिया कहती है
पनघट फिर आना है
गली गॉव देहरी क्या
तट-तट बहकाना है

कितने  मद  डूबे  हैं
पल ये अभिसार के

अंग-अंग झलके
निशिअंचल खामोश है
इसका ये अर्थ नहीं
मौसम    बेहोश   है

गीत गुनगुनाये तभी
तरणी  मझधार  के

मन उपवन में खिले
फूल हरसिंगार  के

 – जयराम जय
‘पर्णिका’ बी-11/1, कृष्ण विहार
आवास विकास, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र.)
मो.नं.9415429104 ;9369848238
E-mail-jairamjay2011@gmail.com

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मंसूर उस्मानी की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

मंसूर उस्मानी की दो ग़ज़लें

मंसूर उस्मानी

चलते हो मेरे साथ तो इतना भी सोच लो
राहों में मेरी ग़म का समुंदर भी आएगा
ख़ुद आप-अपनी ज़द में सितम-गर भी आएगा
तुम मुंतज़िर रहो कि ये मंज़र भी आएगा
इस रेत के नगर को न घबराओ देख कर
आगे बढ़ो कि एक समुंदर भी आएगा
मक़्तल को जा रहा हूँ ये ‘मंसूर’ सोच कर
छींटा कोई लहू का तो उन पर भी आएगा

*ख़ुशबू का क़ाफ़िला ये बहारों का सिलसिला*
*पहुँचा है शहर तक तो मिरे घर भी आएगा*

Mansoor Usmani

तिश्नगी दिल की बुझाना तो ख़बर कर देना
अश्क आँखों में छुपाना तो ख़बर कर देना
हम ने कुछ गीत लिखे हैं जो सुनाना हैं तुम्हें
तुम कभी बज़्म सजाना तो ख़बर कर देना
हादसे राह-ए-मोहब्बत का मुक़द्दर ठहरे
जब हमें दिल से भुलाना तो ख़बर कर देना
जिन किताबों में छुपाए हैं मिरे ख़त तुम ने
उन किताबों को जलाना तो ख़बर कर देना
आज बेगाना समझते हो तो समझो लेकिन
जब सताए ये ज़माना तो ख़बर कर देना
मैं ज़रूर आऊँगा ‘मंसूर’ तुम्हारी ख़ातिर
तुम जो मक़्तल को सजाना तो ख़बर कर देना

– मंसूर उस्मानी

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देवमणि पाण्डेय की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

देवमणि पाण्डेय की दो ग़ज़लें

देवमणि पांडेय

(1)

टूट गई है लय जीवन की सुर ग़ायब हैं ताल नहीं 

क्या कुछ हमसे छूट गया है इसका हमें ख़याल नहीं

अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए

ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं

दिनभर खटा धूप में लेकिन कुछ भी हाथ नहीं आया

क्या खाएंगे बच्चे आख़िर घर में आटा दाल नहीं

क्या क्या नहीं दिया बच्चों को इंटरनेट की दुनिया ने 

फिर भी उनके अफ़सानों में क्यूं बूढ़ा बेताल नहीं 

दौलत वालो! देख लो आकर क्या हैं ठाट फ़क़ीरों के

जहां भी रहते ख़ुश रहते हैं भले जेब में माल नहीं 

अच्छा दिखने की ख़्वाहिश तो हर इंसां में होती है

फिर भी जो बदनाम है उसको इसका कोई  मलाल नहीं 

ख़्वाब को मंज़िल तक पहुँचाना बेहद मुश्किल है लेकिन 

कभी कभी महसूस हुआ है इसमें कोई कमाल नहीं 

(2) 

पढ़लिखकर क्या करेंगे आख़िर राम श्याम रहमान वग़ैरह

ये भी इक दिन बन जाएंगे चपरासी दरबान वग़ैरह

रोज़ी-रोटी के चक्कर में हमने ख़ुद को गंवा दिया

कहां गया अपना वो तेवर, ख़ुद्दारी,पहचान  वग़ैरह

दूरदूर तक आदर्शों से रिश्ता नहीं सियासत का

इनमें कहां नज़र आएंगे सच्चाई, ईमान वग़ैरह

दौलत,शोहरत और प्रतिष्ठा सब कुछ हासिल है फिरभी

किसे पता क्या ढूंढ रहे हैं ये अमीर, धनवान वग़ैरह 

फ़िल्में अगर नहीं चलतीं तो सोचो इनका क्या होता !

काट रहे हैं चांदी हरदिन अक्षय और सलमान वग़ैरह 

हम हैं सीधे सादे इंसां कोई ऐब नहीं हम में  

कभी कभी बस ले लेते हैं,सिगरेट,विस्की,पान वग़ैरह

कम से कम इतवार के दिन तो अपने घर पे रहा करो

बिना बताए आ जाते हैं यार-दोस्त, मेहमान वग़ैरह

देवमणि पांडेय

सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में जन्म। कविता संग्रह: दिल की बातें, खुशबू की लकीरें, अपना तो मिले कोई प्रकाशित।

संपादन: संस्कृति संगम (मुंबई की सांस्कृतिक निर्देशिका)

सम्मान: विश्व हिन्दी सेवा सम्मान (उज्जैन), साहित्य गौरव सम्मान (मुम्बई), सृजनश्री सम्मान (ताशकंद), भाषा भारती सम्मान (ग्वालियर), शान-ए-अदब अवार्ड (त्रिवेंद्रम), त्रिसुगंधि साहित्य रत्न सम्मान (पिंडवाड़ा), फिल्म ‘‘पिंजर’’ के गीत ‘‘चरखा चलाती माँ के लिए बेस्ट लिरिक्स ऑफ दि इयर’’ से पुरस्कृत।

पता: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063

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कृष्णकुमार नाज़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

कृष्णकुमार नाज़ की ग़ज़लें

डा. कृष्णकुमार 'नाज़'

1.

ग़ज़ल

हर वक़्त हूँ किसी न किसी इम्तिहान में

शायद इसीलिए है ये तल्ख़ी ज़ुबान में

अपनी अना की क़ैद से बाहर निकल के देख

पैवंद लग चुके हैं तेरी आन-बान में

सोह्बत बुरी मिली तो ग़लत काम भी हुए

वैसे कोई कमी तो न थी ख़ानदान में

ग़म भी, ख़ुशी भी, आह भी, आँसू भी, रंज भी

सबको जगह मिली है मेरी दास्तान में

नींदों की जुस्तजू में लगे हैं तमाम ख़्वाब

सज-धज के आ गया है कोई उनके ध्यान में

दरवाज़ा खटखटाए चले जा रहे हो ‘नाज़’

लगता है कोई शख़्स नहीं है मकान में

– डा. कृष्णकुमार ‘नाज़’

2.

ग़ज़ल

फ़ैसलों के बीच में जो सोच की दीवार है 

उसको भी आख़िर किसी अंजाम की दरकार है 

ढूँढता फिरता है इंसाँ आज ख़ुद अपना वजूद 

आरज़ूओं की कुछ इतनी तेज़तर रफ़्तार है 

भूख उसके जिस्म से छलकी तो सबने ये कहा 

वो ज़रूरतमंद है, लेकिन बड़ा ख़ुद्दार है 

चंद उम्मीदें हैं अपने पास, वो भी ख़स्ताहाल 

और उस पर भी सितम ये, वक़्त साहूकार है 

हमको हिंदुस्तान की तहज़ीब पर होता है ‘नाज़’ 

शर्म की दौलत है जिसके पास वो ज़रदार है 

डा. कृष्णकुमारनाज़

9/3 लक्ष्मीविहार, हिमगिरि कॉलोनी, 

कांठ रोड, मुरादाबाद- 244001 

मोबाइल 99273 76877

Email : kknaaz1@gmail.com

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पीयूष अवस्थी की ग़ज़लें

ग़ज़ल बोलती है

पीयूष अवस्थी की ग़ज़लें

पीयूष अवस्थी

(1)

जबसे सुना है हमने कि उसका नहीं हूँ मैं

सच मानिये कि ख़ुद भी तो अपना नहीं हूँ मैं

मैं कर न पाया जिसकी भी हर बात हाँ में हाँ

उन सबके वास्ते भी तो अच्छा नहीं हूँ मैं

आँसू न पोछ पाऊँ मैं उसकी भी आँख के

यूँ अपने आप से भी तो रुसवा नहीं हूँ मैं

जीते हैं जिस तरह से यहाँ लोग ज़िन्दगी

मैं सच बताऊँ यार कि वैसा नहीं हूँ मैं

आते हैं मुझसे मिलने फरिश्ते भी रात को

तनहाइयों में रहता हूँ तन्हा नहीं हूँ मैं

तुम मुझमें डूब जाओ कि बस तैरते रहो

दरिया हूँ तेरे प्यार से गहरा नहीं हूँ मैं

रस्ता कहीं तो जा के रुकेगा ज़रूर ही

ये सोच के ही राह में ठहरा नहीं हूँ मैं

(2)

बड़ा अजीब रहा दर्द का सफ़र साहिब

क़दम-क़दम पे रहा हादसों का डर साहिब

न पूछ कैसे जिया हूँ, बिखर-बिखर के मैं

कोई जो फूल भी फेंके, तो लगता डर साहिब

मैं अपने घर को भी अपना ही घर कहूँ कैसे

मेरे ही घर में बने हैं बहुत से घर साहिब

है ज़िन्दगी तो मेरी पर हैं फैसले उनके

मेरे ही काँधों पे है कोई और सर साहिब

ज़रा सी और जगह क़ब्र में बड़ी कर दो

कहीं तो चैन मिले मुझको लेटकर साहिब’

– पीयूष अवस्थी

मुख्य संपादक

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मंगल नसीम की ग़ज़ल

ग़ज़ल बोलती है

मंगल नसीम की ग़ज़ल

मंगल नसीम

परिन्दे हौसला कायम उड़ान में रखना

हर इक निगाह तुझी पर है, ध्यान में रखना

बलन्दियाँ तिरी हिम्मत को आजमाएँगी

परों में जान, नजर आसमान में रखना

हर इम्तिहान पे मंजिल करीब आती है

हमेशा खुद को किसी इम्तिहान में रखना

तू बोलता है तो मिसरी-सी घुलती जाती है

यही मिठास हमेशा ज़्ाुबान में रखना

उड़ान भरके तिरी ओर आ रहा है ये

तू इस परिन्दे को अपनी अमान में रखना!

– मंगल नसीम

प्रख्यात वरिष्ठ शाइर                                       

शाहदरा, दिल्ली- 32

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कुंडलियां – बसंत की छटा

छन्द विन्यास

कुंडलियां - बसंत की छटा

आशा शुक्ला "कृतिका"

आया अब ऋतुराज ले,इंद्रधनुष के रंग।

 चतुर्दिशा डोले मदन , पीकर  मानों  भंग।

पीकर मानो  भंग, चले चंचल पुरवाई।

 फूल उठे वनफूल, सुरभि धरती पर छाई।

प्रिय बसंत का राग,गीत कोकिल ने गाया।

हर्ष प्रेम आह्लाद, संग बसंत ले आया।।

 

फूलों से उपवन भरा ,झूम उठा ऋतुराज ।

कली कली पर भृंग हैं ,कूके कोयल आज।

कूके  कोयल आज ,मदिर  पुरवाई  डोले।

घूँघट का पट खोल,कली तितली से बोले।

हरी घास पर ओस ,हँसें खग द्रुम -झूलों से।

है बसंत का जोर,भरा उपवन फूलों से।।

 

– आशा शुक्लाकृतिका

शाहजहांपुर, उत्तरप्रदेश

 

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‘पिता हूँ मैं’

पुस्तक समीक्षा

‘पिता हूँ मैं’

लेखक: पीयूष अवस्थी

पुस्तक: ‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
प्रकाशक: शब्दकार प्रकाशन, ग्रेटर नोएडा
रचना शैली: क़तआत-खंडकाव्य
भाषा: हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू
कीमत: 700/- पृष्ठ: 144

दुनिया के हर पिता का जज़्बा
समीक्षक – मंसूर उस्मानी

जनाब पीयूष अवस्थी हमारे दौर के एक बहुत जिम्मेदार शायर हैं, उनकी कई किताबें उनको अदबी दुनिया में मनवा चुकी हैं। शायरी के जरिये उनका मकसद सिर्फ दिल को बेहलाना और दिमाग को समझाना नहीं है, बल्कि समाज को बेहतर समाज बनाना और इंसान को असली इंसान बनाना जैसे बड़े लक्ष्य उनका निशाना हैं। इसकी झलक उनकी नई पुस्तक ‘‘पिता हूँ मैं’ में आसानी से देखी जा सकती है।
‘‘पिता हूँ मैं’’ केवल अवस्थी जी के दिल की आवाज नहीं है, दुनिया के हर पिता का दर्द है, एहसास है, जज़्बा है, तड़प है, जो ऐसे वक़्त में शायरी की किताब बन रहा है, जब बदलाव की आंधी में तहजीबे हाँप रही हैं और रिश्ते काँप रहे हैं। आज हमारी नई पीढ़ी ये भूल गई है कि माँ के कदमों में जो जन्नत है पिता ही उसका दरवाजा है, आज के बेटे जिस तरह पिता को नजर अंदाज कर रहे हैं, उससे सिर्फ दिल ही नहीं दुखता, आत्मा भी छलनी होती है। इसी दुखदायी माहौल को बदलने के लिए पीयूष जी ने कलम उठाया है, जो बड़ी हिम्मत और ईमानदारी का कदम है। मुक्तकों के रूप में अपनी बात कहकर अवस्थी जी तो कामयाब हो गए, शायरी का हुस्न बढ़ा दिया, शायर से बढ़ कर एक संत हो गए, आप उनके इस कारनामे से कितना फायदा उठाते हैं ये देखना है।
अवस्थी जी के साथ साथ हर पढ़ने वाले को भी मेरी दिली मुबारकबाद और अशेष दुआएं।
चलते चलते पीयूष जी का एक मुक्तक मेरी ओर से तोहफे के रूप में स्वीकार कीजिये।

मैं कहानी, मैं हूँ कविता, मैं कथा हूँ
मैं अलिफ हूँ, इल्म की मैं इब्तिदा हूँ
मैं वो सीढ़ी जिससे तू ऊपर चढ़ा है
मैं पिता हूँ, मैं पिता हूँ, मैं पिता हूँ

– मंसूर उस्मानी
प्रख्यात शाइर, लेखक
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश

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‘पिता हूँ मैं’

पुस्तक समीक्षा

‘पिता हूँ मैं’

लेखक: पीयूष अवस्थी

पुस्तक: ‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
प्रकाशक: शब्दकार प्रकाशन, ग्रेटर नोएडा
रचना शैली: क़तआत-खंडकाव्य
भाषा: हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू
कीमत: 700/- पृष्ठ: 144

‘पिता हूँ मैं’ : एक अद्भुत, अनूठा खण्डकाव्य
– डॉ. सुरेश अवस्थी

परमपिता शब्द आते ही परमात्मा का स्मरण आता है। परमात्मा जिसे हमने देखा तो नहीं पर जिसकी किसी न किसी रूप में उपस्थिति की अनुभूति हमें सदैव होती रहती है। वास्तव में परमपिता एक मिथ है जिसकी अनुभूति की जा सकती पर हमारे जीवन में परमपिता जीती जागती अवर्चनीय, अभिनन्दनीय व अनुकरणीय भूमिका का निर्वहन करने वाला एक जीता जागता प्रत्यक्ष मिथक रहता है जिसे हम सभी पिता कहते हैं। पिता को जन्मदाता, पालनहार जैसे विशेषणों से भी संबोधित करते हैं पर पिता एक ऐसा संबोधन है जिसे परिभाषित करना भाषा से परे होता है और भाव के निकट होता है।
दुनिया की हर भाषा के साहित्य में जन्मदात्री माँ पर केंद्रित साहित्य की रचना हुई हुई है पर पिता पर केंद्रित काव्य साहित्य बहुत ही कम उपलब्ध है। गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीराम चरित मानस को लें तो पिता के रूप में दशरथ की भूमिका मात्र पत्नी कैकेई द्वारे मांगे गए वरदान स्वरूप श्री राम को चौदह साल का वनवास देने और फिर पुत्र विछोह में जीवनलीला त्याग देने वाली भूमिका में सिमट जाती है। चारों पुत्रों को सुयोग्य, सदाचारी, परमवीर व विवेकी बनाने की पिता की भूमिका केंद्र में स्थान नहीं पा सकी। ऐसे ही अन्य महाग्रंथों में भी पिता को कम ही स्थान मिला।
विगत दिवस कविवर पीयूष अवस्थी की एक कृति श् पिता हूँ मैंश् की पांडुलिपि का अध्ययन करने का अवसर मिला तो पिता की बहुआयामी भूमिका के इंद्रधनुषी रंगों से रूबरू हुआ। कवि ने पिता को केंद्र में रख कर कुछ वैसी ही विश्व परिक्रमा की है जैसी पौराणिक सन्दर्भों में कभी श्री गणेश ने माँ-पिता की परिक्रमा करके सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने के पुण्यफल के रूप में प्रथम देवता होने का गौरव प्राप्त कर लिया था। काव्य कृति के एक बड़े भाग में पिता महात्म्य को कताअ के माध्यम से श्पिता उवाचश् के स्वरूप में उसी शैली में प्रस्तुत किया है जैसे कभी भगवान कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप प्रकट करके स्वयं केश् अहम ब्रम्हाष्मिश् का उद्घोष किया था। पूरे काव्य में श्पिताश् स्वयं के विविध रूपों स्वरूपों को प्रकट करता है। जिन्हें भी पिता होने का अवसर मिला है या जिन्होंने अपने पिता को विशद रूप से समझने का प्रयास नहीं किया वे काव्यकृति की एक -एक पंक्ति में पिता के विराट स्वरूप को वैसे ही समझ सकेंगे जैसे परम् पिता के विराटत्व को महाकवियों ने प्रकट किया है।
कृति में चार चार पंक्तियों में पिता को जिस चेतना, गरिमा और गवेषणा के साथ रूपायित किया गया वह न केवल मन, मस्तिष्क व ह्रदय को अभिसिंचित करवे वाला है बल्कि हर सन्तान को आने पिता का महत्व समझा के उसे गौरवान्वित करने वाला है। कौन पिता ऐसा होगा जो इन जैसी पंक्तियों को आत्मसात करके गर्व का अनुभव नहीं करेगा:

हर मुसीबत से तेरी पहले खड़ा हूँ
में तेरी खुशियों का ही तो काफिला हूँ
छत्र हूँ, छाया हूं तेरी, मैं वरद हूँ
मैं पिता हूं, मैं पिता हूँ, मैं पिता हूँ

और ऐसी पंक्तिया पढ़ कर कौन ऐसी सह्रदय सन्तान होगी जो अपने पिता पर गर्वानुभूति नहीं करेगी…..

मैं तेरी हिम्मत हूँ, तेरा हौसला हूँ
मैं तेरी तकदीर का हर फैसला हूँ
हार मत तू, हार मत तू, हार मत तू
मैं पिता हूँ, मैं पिता हूं, मैं पिता हूँ

किसी भी रचनाकार का विस्तृत अनुभव संसार, गहन संवेदना, विषयगत अनुभूतियों, काव्य रचना में प्रयुक्त छंद, उर्दू शाइरी के अरूज का शास्त्रीय ज्ञान-विज्ञान, विस्तृत द्रष्टि अध्ययनशीलता व भाषा पर अधिकार आदि के सामर्थ्य की ऊर्जा उसकी रचनाओं से प्रकट होता है। जब कोई रचनाकार किसी मौन साधक की तरह इन सभी सोपानों से अपनी अंतश्चेतना के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तभी कोई कालजयी, सारभौमिक रचना का जन्म होता है।कविवर पीयूष अवस्थी की रचनाधर्मिता में ये सभी तथ्य नैसर्गिकरूप से समाहित हैं तभी तो वह ऐसी तथ्यात्मक पंक्तियां रच पाते हैं:

जिंदगी कुरुक्षेत्र है, हम सब खड़े हैं
बस निहत्थों की तरह, मुर्दा पड़े हैं
अब लड़ाई अस्त्र शस्त्रों की नहीं है
हम तो बस चेहरे बदलते आँकड़े हैं

समाज में यह सहज ही प्रचलित है कि कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता और अनुभवों की संचित पूंजी से ही अपनी संतानों को जीवन संघर्ष के गुर सिखाता है। रचनाकार ने इस कृति में पिता के आत्मकथ्य के रुप मे बड़ी सहजता से प्रकट तो करता ही है और अपनी संतान की उड़ान को अपने से अधिक ऊंचा और विस्तृत आसमान देना चाहता है।इस सत्य को जिस सहजता से पीयूष अवस्थी ने एक कताः में जिस तरह से प्रकट किया है वह रचनाकार की सामर्थ्य को प्रकट करता है…

जो भी सीखा है सिखाना चाहता हूँ
आसमां तुझको दिखाना चाहता हूँ
कुछ परों को जोड़ कर बाहों में तेरी
खुद से भी आगे उड़ाना चाहता हूँ

इसी तरह का एक कता और द्रष्टव्य है जो रचनाकार के चिंतन की उड़ान के मजबूत परों की पहचान कराता है:

में तेरा बसुदेव हूँ, तेरा जनक हूँ
मैं तुम्हारी आत्मा की इक महक हूँ
जैसे चाहो दिल मे तुम अपने बसा लो
मैं तुम्हारी मुस्कराहट की चमक हूँ

एक पिता की संवेदना को कविवर पीयूष ने अलग अलग कताः में कितनी सहजता से जिया है जिन्हें दुनिया का हर पिता जीना चाहता है और जीता भी है-

तेरी मुठठी बन्द थी जब तू उगा था
मैंने सींचा, जब तुझे,तब तू खिला था
मैं हवा पानी हूँ तेरी, मैं गिजा हूँ
पुत्र बनकर यूँ नहीं मुझको मिला था

आँधियों में दीप सा जलता रहा हूँ
मैं तो तेरी रौशनी बनता रहा हूँ
बन गया जुगनू ,कभी तो चाँद, तारे
मैं अँधेरों से सदा लड़ता रहा हूँ

मैं यहाँ पर पाण्डु हूँ ,घृतराष्ट्र भी हूँ
मैं हिरण्यकश्यप के जैसा पात्र भी हूँ
हर कथा कहती है कुछ अपनी कहानी
मैं पिता के साथ इक सम्राट भी हूँ

सामान्य रूप से एक पिता अपने पुत्र में स्वयं की तस्वीर देखता है। उसी को केंद्र में रख कर सपने बुनता है। पुत्र के तदनुसार ही पाथेय चुनता है पर पीयूष अवस्थी ने कई कतआत में इस मिथ को तोड़ते हुए बेटी का पिता होने पर गर्व की अनुभूति करता है। पुरातन सोच की जंजीरों में जकड़े तमाम पिताओं के लिए उनका यह चिंतन अभिनन्दनीय व अनुकरणीय हैरू

मैं ही तेरे जन्म की भी व्यंजना हूँ
तेरे आने की खबर उद्घोषणा हूँ
तेरी जननी हर तरह से मुस्कराये
मैं भी खुश हूँ बाप बेटी का बना हूँ

कृति की हर पंक्ति सार्थक उद्देश्य से परिपूर्ण तथा जीवंत सन्देश देने वाली है।ऐसी कालजयी कृतियाँ कभी -कभी ,किसी -किसी की कलम से अपने स्वरूप में उतरती हैं। साहित्य, संवेदना और संरचना की वाग्देवी ने यह पुरष्कार प्रियवर पीयूष अवस्थी को दिया है। मेरा सुद्रढ़ विस्वास है कि यह कृति साहित्य की विपुल संपदा के मध्य किसी चमत्कारिक हीरा की तरह चमकेगी। सुधी काव्यप्रेमी व गुनी आलोचक इसका आत्मिक अभिनंदन करेंगे।

मेरी ओर से अशेष शुभकामनाएं !

– डॉ. सुरेश अवस्थी
विश्व के लगभग 26 देशों
में अनेकों बार काव्य पाठ
अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि
राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त शिक्षाविद्
एवं वरिष्ठ पत्रकार
निवर्तमान विभागाध्यक्ष (हिंदी):
गुरुनानक कॉलेज, कानपुर

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उपन्यास – उंगलियाँ

पुस्तक समीक्षा

उपन्यास - उंगलियाँ

लेखिका: मेघा राठी

उपन्यास – उंगलियाँ
प्रकाशक– फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन
लेखिका: मेघा राठी
पुस्तक मूल्य– 249 रु.
पृष्ठ संख्या – 206
पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है

सिहरन पैदा कर देने वाली कौंध

विभिन्न विधाओं के सफल सर्जन से सुसज्जित हस्ताक्षरों में सुश्री मेघा राठी एक विशिष्ट स्थान रखती हैं। आपकी रचनाएं सामयिक घटनाओं को स्पर्श करते हुए मस्तिष्क के न्यूरोन्स में स्थायी रूप से रहने का सामर्थ्य भी रखती हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘उंगलियां: रहस्य का एक सफ़र’ अज्ञात गूँजती फुसफुसाहटों की यात्रा में उन सड़कों पर आपको ले जाती है जहां डर एक साँप की तरह कुंडली मारकर हमला करने के लिए तैयार है। भय का सम्बन्ध अज्ञात से होता है। खिड़की के कांच पर खरोंच बनाती हुई उंगलियां, खिड़की के पीछे की परछाइयों के रहस्य के दृश्य और अदृश्य के बीच टंगे पर्दे को आपकी जिज्ञासा से टकरा देती है। कमल और मिहिर के दाम्पत्य जीवन से जुड़ी यह कथा आधी रात के सन्नाटे में आपको भयावहता में कदम रखने और चारों ओर के भयानक अंधेरे का सामना करने के एक ऐसे परिदृश्य से गुजारती है जहाँ डर का एक सशक्त ताना-बाना बुना हुआ है।
उभरते अंधेरे में खौफनाक ढंग से घूरती आँखें पात्रों के दिलों में पिछले पापों की हलचल मचा देती हैं और भूले हुए दुःस्वप्न सतह पर आ जाते हैं। एक ऐसा घर जहां की हवा आसन्न भय की गंध से घनीभूत है, डाकिनी की बातें ज्ञात की सीमाओं को पार कर देती है। साधक के सामने आते भयावह-घृणित दृश्य और डरवाने रूप में पैशाचिक शक्तियां भयभीत करने का प्रयास करती हैं, लेकिन मानव कल्याण के लिए ऐसे अनुभवों का सामना करने को तैयार साधक अपने कर्तव्य पूजन से विमुख नहीं होते।
अविश्वसनीय घटनाएं किसी भयानक कथा का अभिन्न अंग होती हैं, यहाँ भी जैसे ही आप इस भयावह कथा की गहराई में उतरते हैं, अपनी कल्पना के प्रेत का सामना करने के लिए तैयार रहें, क्योंकि आत्माओं का शरीर में प्रवेश, कर्ण पिशाचिनी विद्या सरीखी जो भयावहता आपका इंतज़ार कर रही है वह तर्क की समझ से परे है।
यह पुस्तक रोंगटे खड़े कर देने वाली उत्कृष्ट कृति है जो मनोवैज्ञानिक भय के दायरे में गहराई से उतरती हुई एक ऐसी कहानी बुनती है जो अशुभ का पूर्वाभास कर और वर्तमान की अप्रत्याशित स्थितियों को पढ़ते हुए रीढ़ को झकझोर कर रख देती है। लेखिका ने कुशलता से एक ऐसा वातावरण तैयार किया है, जिसमें आत्माओं और प्रेतबाधित व्यक्तियों को दृश्यमान करने हेतु ज्वलंत विवरणों का उपयोग किया गया है। आत्माओं और रहस्यों से जूझते बहुआयामी पात्र कथा में परतें जोड़ते हैं। कथानक में उतार-चढ़ाव को सटीकता के साथ निष्पादित किया गया है, जो एक अमिट छाप छोड़ते हैं। जो प्रमुख बात इस पुस्तक को विशिष्ट बनाती है, वह है अलौकिक भयावहता को मानवीय तत्व के साथ मिश्रित करने की क्षमता, और इससे यह एक रोमांचकारी और विचारोत्तेजक उपन्यास बन गया है। यह उपन्यास अंतिम पृष्ठ पलटने के बाद भी पाठकों की स्मृति में लंबे समय तक रहेगा। कथा में चरित्र-चित्रण सूक्ष्म है; संवेदी विवरणों का कुशल उपयोग किया गया है; बेचैनी और दिल दहला देने वाली उथल-पुथल दिमाग के अंधेरे कोनों में घूमती हैं। अपने अलौकिक तत्वों के बावजूद यह उपन्यास मानवीयता को बारीकी से स्पर्श भी करता है। अतिविश्वसनीयता को सरल एवं ओजस्वी भाषा शैली में प्रस्तुत कर जीवंत कर दिया गया है, जो लेखिका के अटूट परिश्रम को भी दर्शाता है।

समग्रतः, ‘उंगलियां: रहस्य का एक सफ़र’ सुश्री मेघा राठी की प्रतिभा का एक प्रमाण है, जो अपने विचारोत्तेजक गद्य, भय-उत्प्रेरित घटनाओं, भावनात्मक रूप से प्रतिध्वनित संघर्षशील पात्रों और एक ऐसी कथा को अन्तर्निहित किये हुए है जो मनोवैज्ञानिकता को अलौकिक के साथ सहजता से जोड़ता है और अंत में पाठकों की बेचैनी को सफलतापूर्वक समाप्त भी करता है। कहना न होगा कि इसमें उपस्थित सिहरन पैदा कर देने वाली कौंध यह सुनिश्चित करती है कि यह पुस्तक डरावने साहित्य के पाठकों के मध्य विपुल लोकप्रिय होगी।

समीक्षक– डॉ. चंद्रेश छ्तलानी
सहायक आचार्य (कम्प्यूटर विज्ञान)
निदेशक (कम्यूनिटी शिक्षा विभाग)

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ऊर्जस्वी

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक: ‘ऊर्जस्वी’

लेखक: नृपेन्द्र अभिषेक ‘‘नृप’’

पुस्तक: ‘ऊर्जस्वी’
लेखक: नृपेन्द्र अभिषेक ‘‘नृप’’
रचना शैली: प्रेरक आलेखों का संग्रह
प्रकाशक: स्वेतवर्णा प्रकाशन, नयी दिल्ली
भाषा: हिन्दी
कीमत: 199/- पृष्ठ: 115

जीवन को जीने की सीख देती

पुस्तक “ऊर्जस्वी”
समीक्षक: मोनिका राज

व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक रिश्तों से जूझते मन को उभारने और दुनियारूपी सागर में हिचकोले खाते नाव को पार लगाने के लिए जिस ज्ञान की ज़रूरत होती है, उस ज्ञान रूपी मोती को ऊर्जस्वी रूपी माला में पिरोने का कार्य किया है नृपेंद्र अभिषेक नृप जी ने।
‘ऊर्जस्वी’ का शाब्दिक अर्थ है- “ऊर्जा से परिपूर्ण हों” और नृपेंद्र अभिषेक नृप जी की यह पुस्तक अपने इस नाम को सार्थक करती प्रतीत होती है। हालांकि नृप जी पिछले पच्चीस वर्षों से लेखन क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं परंतु पुस्तक-लेखन के क्षेत्र में उनका पदार्पण अभी-अभी हुआ है। हिंदी पुस्तक लेखक के तौर पर यह उनकी पहली पुस्तक है।
इस पुस्तक का एक-एक आलेख सकारात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत है। इस पुस्तक का प्रत्येक आलेख आपको जीवन में होने वाले अनेक परेशानियों से निकलने का सार्थक समाधान देने का भरपूर प्रयत्न करता है। इस पुस्तक में कुल बत्तीस आलेखों का संग्रह है। इन आलेखों के माध्यम से लेखक ने बेहतरीन लेखन-शैली के साथ गागर में सागर भरने का प्रयास किया है।आलेख लेखन में प्रयुक्त एक-एक शब्द अपने अंदर गहरे भाव समेटे हुए है।
संपूर्ण पुस्तक में नृप जी का चिंतनशील व्यक्तित्व उपस्थित है। सभी रचनाओं में लेखक की विभिन्न विचारधाराओं का परिचय मिलता है। लेखक की दृष्टि में उसके आलेख केवल कल्पना विलास नहीं बल्कि जीवन को मथ कर निकाला हुआ सार है। बुद्ध का कथन है-“जीवन में हजारों लड़ाइयां जीतने से बेहतर है स्वयं पर विजय प्राप्त करना।” उनका मानना है कि बुराई को बुराई से पराजित नहीं किया जा सकता। नृप जी के अनेक आलेख बुद्ध के विचारों की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं।
लेखक द्वारा प्रत्येक आलेखों का चयन बड़ी सूझ-बूझ के साथ किया गया है, जो इस पुस्तक को विशेष बनाता है। इस पुस्तक के एक-एक शब्द जादुई प्रतीत होते हैं। प्रत्येक आलेख के भाव की चुम्बकीय शक्ति से खींचा मन इसे पढ़ते हुए आनंद के सागर में गोते खाने लगता है। बस एक बार इस पुस्तक को हाथ मे लेने भर की देर है। इसकी लेखन शैली से वशीभूत मन कब पूरी पुस्तक को समाप्त कर देता है, इसका भान ही नही होता। प्रत्येक आलेख एक बेहतरीन संदेश देने के साथ-साथ हमारे मन मे उठ रहे अनेक प्रश्नों, शंकाओं का निवारण करते हुए हमें आत्मिक तृप्ति की ओर ले जाता है। एक ही जगह तमाम मानसिक दुविधा एक साथ हल होती मालूम पड़ती है।
स्वार्थ साधन के लिए न बनें अनैतिक, सांच को आंच नहीं, भावनाओं पर काबू रखने की ज़रूरत, शक से कमज़ोर होती रिश्तों की डोर, मानवता से ही श्रेष्ठ बनता है मनुष्य, ज़रूरी है परिवार का साथ, गुणी इंसान बनें अहंकारी नहीं आदि जैसे अनेकानेक ज्ञानवर्धक आलेखों से सुसज्जित इस पुस्तक को पढ़ना अपने ज्ञानकोश में वृद्धि करने के समान है। सरल भाषा और व्याकरणिक शुद्धियाँ इस पुस्तक की मेरुदंड है।
नृप जी के अधिकारपूर्ण भाषा में यथावांछित विविधता है, जिसमें जीवन का सत्य भी है और भविष्य की योजना भी। किसी निबंध या आलेख में भाषा वह विश्वसनीय तत्व है जो किसी युग के लिए परिवर्तनीय प्रतिमान को सबसे पहले निर्देशित कर देती है। यहां भी प्रत्येक आलेख में लेखक का आत्मचिंतन प्रत्येक के लिए अनुकरणीय बनता दिखाई दे रहा है क्योंकि इसमें एक वैश्विक चिंतन है और चेतना भी।
यह पुस्तक यूपीएससी की परीक्षा के साथ-साथ निजी ज़िन्दगी में नैतिक शिक्षा की जरूरत को भी पूरा करेगी। इस बेहतरीन मुद्दे पर पुस्तक लेखन के लिए लेखक को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं। आशा है कि यह पुस्तक पढ़कर पाठकगण अवश्य लाभान्वित होंगे।

समीक्षक: मोनिका राज
पुस्तक: ऊर्जस्वी
लेखक: नृपेन्द्र अभिषेक नृप
प्रकाशन: स्वेतवर्णा प्रकाशन, नयी दिल्ली
मूल्य: 199 रुपये
पृष्ठ- 115 पेज

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अनहद

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक: ‘अनहद’ उपन्यास

लेखक: डॉ. उपमा शर्मा

पुस्तक: ‘अनहद’ उपन्यास
लेखक: डॉ. उपमा शर्मा
प्रकाशक: शुभदा प्रकाशन, ग़ाजियाबाद
भाषा: हिन्दी
कीमत: 290/- पृष्ठ: 149

प्रेम की लय पर दो दिलों पर दो दिलों की दास्तान: अनहद

समीक्षक: डॉ शबनम सुल्ताना

हद चले सो मानवा, बेहद चले जो साध।
हद बेहद दोऊ तजे, वा को मता अघाध।
जो हद में चलता है वो मानव हो और जो हदों को तोड़कर निकल जाता है वह साधु है। लेकिन जो हद और बेहद दोनों से पार निकल जाता है उसकी मति की गहराई नापना संभव ही नहीं है। कबीर दास का यह दोहा इस उपन्यास को पढ़ अनायास ही याद आ जाता है ।यह उपन्यास हद और बेहद के मिलन की प्रेमकथा है। एक सीमाओं में बँधा है, दूसरा सीमाओं से परे। फिर भी दोनों मिलते हैं जैसे बंधन और मुक्ति,प्रकाश और अंधकार। विलोम हमेशा जोड़ों में क्यों होते हैं? शायद इसीलिए कि वे एक दूसरे के विपरीत ही नहीं पूरक भी होते हैं। यह उपन्यास दुख- सुख, मिलन-विरह, प्रेम-उदासीनता जीवन के सारे रस समेटे है और अंत में आत्मा से आत्मा का मिलन है। इसमें शाश्र्वत और अलौकिक प्रेम के बारे में बताया गया है।
प्रेम स्नेह से लेकर खुशी की ओर धीरे- धीरे अग्रसर करता है। यह एक मजबूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है जो सब भूल कर उसके साथ जुड़ जाता है।
प्रेम का दूसरा नाम ही परमात्मा हैं प्रेम शाश्वत निस्वार्थ सच्चे अर्थों में बिना किसी लालच के होता है हम जिससे प्रेम करते हैं उससे बावस्ता हर चीज से मोहब्बत करते हैं । प्रेम की वह इकलौता अध्यात्म है जो जिंदगी को चैन और सुकून दे सकता है। प्रेम बंधन नहीं देता प्रेम मुक्त करता है। जैसे देवयानी का प्रेम प्यार में त्याग कर्त्तव्य कभी बाधा नहीं बनते बल्कि सच्चा प्यार हर परेशानी पर भी अडिग टिका रहता है।
दूर रहकर भी पास होता है एक के आँसू दूसरे की आँखों में होते हैं हर पल दिल सिर्फ उसी को याद करता है।
उसी से बात करता है प्यार में सबसे ज्यादा ईश्वर ही करीब होता है । विरह होकर भी विरह नहीं होता है।क्योंकि ये प्रेम अलौकिक और शाश्र्वत होता है। प्रेम हमेशा होता है रहता है तभी तो मानव में संवेदनाएं रहती है।
कथ्य के केंद्र में तीन पात्र हैं- देव, देवयानी और शर्मिष्ठा।
उपन्यास में डा उपमा शर्मा ने बड़े ही अच्छे से दो प्रेमियों से पति-पत्नी बने देव देवयानी के प्रेम फिर उनकी प्रणय जो विरह होकर भी विरह नहीं था पर कलम चलाई है ।
वे दोनों ही शून्य में जाकर अलौकिक रुप से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।
देव देवयानी प्रेमी- प्रेमिका से पति-पत्नी बनते हैं उनमें असीम प्रेम होता है फिर क्या कारण रहा जो देव के मन में शर्मिष्ठा अपनी जगह बनाने लगती है। देव अपना पद-प्रतिष्ठा, देवयानी सब भूलकर शर्मिष्ठा को समय देने लगता है। यह एक अनाथ बच्ची के प्रति खुद अनाथ रहे देव के मन की सिम्पैथी थी या हृदय से उपजा प्रेम।रीते मन के एक कोने में शर्मिष्ठा का आ जाना देवयानी के प्रेम की कोताही थी या पुरुष मन की कमजोरी। देवयानी पूरे मन से देव को समर्पित थी। एक अनाथ बच्ची के प्रति उपजी संवेदनाओं ने अनायास ही किसी कमज़ोर लम्हे में देव के मन ने शर्मिष्ठा को जगह दे दी।
जब तक देव को अपनी गलती का एहसास होता है तब तक बहुत देर हो जाती है वो देवयानी से नजर नहीं मिला पाता और शर्मिष्ठा को समझा नहीं पाता ।
शर्मिष्ठा जो की उसकी बहू से भी उम्र में छोटी थी और अनाथ थी जिससे हमदर्दी करते करते शर्मिष्ठा का देव के लिए आकर्षण बढ़ जाता है तब देव सब कुछ त्याग कर आश्रम चले जाता है और गुरु जी का सहारा लेता है।
लेकिन बेचैन मन में देवयानी ही थी। तब उसे पता चलता है उसने सिर्फ और सिर्फ देवयानी से प्रेम किया। शर्मिष्ठा सिर्फ कमजोर पलों का आकर्षण थी।
आश्रम में गुरु जी देव को साधना सिखाते हैं और बताते है कि जब प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर होता है तो अनहद नाद से शून्य में बदल जाता है तब हम जिसका आहृवान करते हैं उस तक अलौकिक रूप से पहुँच जाते हैं। देव का प्रेम अलौकिक था लेकिन कर्तव्य पथ से बहुत दूर। वो विरह में जलता है लेकिन देवयानी और शर्मिष्ठा दोनों को ही छोड़कर चला आता है। या कहीं न कहीं उसे अपने प्रेम पर अगाध विश्वास था। वो जानता था प्रेम में डूबी देवयानी अपने पति की ग़लती को भी गले लगा लेगी। वो देव से नाराज होगी, लेकिन उसकी जिम्मेदारी ज़रूर पूरी करेगी। देव का यकीन सच्चा था।
प्रेम हमें कर्त्तव्य बोध कराता है जैसे देवयानी शर्मिष्ठा को अपने गले से लगा लेती है ।प्रणय विरह झेल रही देवयानी अपने कर्त्तव्य से पल भर भी विमुख नहीं होती न ही उसे शर्मिष्ठा से कोई शिकायत होती है बल्कि उसे शर्मिष्ठा से भी प्यार हो जाता है ।उसे शर्मिष्ठा में भी देव ही दिखता है। वो शर्मिष्ठा की पढ़ाई करा उसका विवाह करा अपने पति अपने प्रेमी को कर्त्तव्य मुक्त कर अपराध मुक्त कराती है।
देव और देवयानी ईश्वरीय शक्ति से जीवन मुक्त हो हमेशा के लिए एक दूसरे के हो जाते हैं।
प्रेम विश्वास और संवेदनाओं के उत्तम शिखर पर पहुँच जाता है कठिनाइयाँ न ही उसे बिखेरती है न ही टूटने देती है।
ऐसा नहीं है की देवयानी आहत नहीं होती लेकिन जब प्रेम सच्चा हो तो नाराजगी क्षणिक होती है।
लेकिन देव से देवयानी की क्षणिक नाराजगी भी सहन नहीं होती लेकिन देवयानी के लिए अनायास आई शर्मिष्ठा भी प्रेम ही थी वो उसे भी देव की सम्पत्ति समझ कर प्रेम करती है।
दुलारती है।
जहाँ पुरुष कमजोर पड़ता है वहाँ स्त्री का प्रेम शाश्वत अडिग खड़ा रहता है वो कभी अपने कर्त्तव्य अपने अपनों से मुंह नहीं मोड़ती वो कभी कही नहीं भागती इसीलिए तो उसे सृष्टा कहा जाता है।
प्रेम संगीत है कला है और इसका अच्छे से उदाहरण दिया है डॉ उपमा शर्मा ने बल्कि जो शाश्वत और अलौकिक प्रेम के बारे में उन्होंने बताया है वो कमाल है। अनहद नाद से शून्य से होकर आह्वान कर अलौकिक मिलन ये मनुष्य का ईश्वर तक पहुँचने का बहुत ही अनोखा साधन है जिसमें अपनी शक्ति अपनी ऊर्जा को एक ही वस्तु पर केंद्रित कर हम बिना बिखरे वो पा सकते हैं जो हमें चाहिए।
योग की सीढ़ियाँ आयाम ,नियम,धारणा, प्रत्याहार इत्यादि।
भटकता मन जब स्थर हो जाता है तो शून्य से होकर अनहद और अहद हो जाता है। फिर आहृवान होता है वो कोई भी हो परमात्मा हमें उससे अलौकिक रुप से मिला देता है ।
अलौकिक प्रेम राधा कृष्ण,शिव पार्वती जैसा होता है।
इतने गहरे प्रेम के बाबजूद भी जब शर्मिष्ठा बीच में आई तो देव और देवयानी उसे समझा नहीं पाये। क्योंकि समझदार और एक दूसरे के प्रेम में होते हुए भी इंसान बेबस हो जाता है वो उसे नहीं समझा पाता उसे समझ ही नहीं आता की क्या समझाएं। किसी अनाथ का दिल भी तो दुखाना गलत है न क्योंकि मानवीय संवेदनाएं ही ऐसी है।
पुस्तक का शीर्षक सटीक है। शीर्षक किसी भी कथानक का सार होता है।
अनहद – योग का ऐसा साधन जिसमें कानों को हाथों से बंद कर उस ध्वनि को सुना जा सकता है।वो है हमारे हृदय की आवाज इससे हमारी ऊर्जा स्तर में अचानक बढ़ोतरी होती है ये हमें परमात्मा से मिलाने का साधन है। इसके प्रकट होने पर आत्मा परमात्मा से मिल जाती है ।
जब बाहर की दुनिया का शोर पूरी तरह बंद होता है तब हमें ये नाद सुनाई देता है।
ये हमें बाहरी दुनिया से काटता नहीं है बल्कि जब हम नाद करते करते शून्य में डूब जाते हैं। और फिर जिसका आहृवान करते हैं ,तब हम उसे अलौकिक रुप से पा लेते हैं उससे बात कर लेते हैं देख लेते हैं। देव को हर क्षण देवयानी ही नज़र आती है। देवयानी उसका अनहद नाद। देव का प्रेम विरह के बाद तपस्या में तप कर पूर्ण हो जाता है।
शिल्प की दृष्टि से उपन्यास सुगठित और रोचक है। पूरा घटनाक्रम आँखों के आगे दृश्य या गुजर जाता है। लेखिका का संवेदनाओं का संसार जितना समृद्ध है, शब्द-भंडार भी उतना ही विस्तृत है। लेखिका के बिंब दार्शनिकता से भरे हुए हैं। उपन्यास में ऐसे कई सूत्र वाक्य हैं जो पाठक को चिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। दर्शन और आध्यात्म के धीमे मगर गंभीर स्वर हैं। उपन्यास में कुछ चीजें खटकती भी हैं जैसे प्रेयसी सी पत्नी के होते हुए शर्मिष्ठा के आकर्षण में काम छोड़ उसे लेकर यहाँ-वहाँ घूमना। लेकिन प्रेम कहाँ कुछ ऊँच-नीच सोचता है। वो तो मन- आकाश में स्वच्छंद विचरता है। और देवयानी वो क्यों पति की प्रेयसी को गले लगाती है। तो प्रेम तो प्रेम है। देवयानी देव को कहती भी है “ तुम जिसे प्रेम करोगे मैं भी उसे प्रेम करूँगी। तुम से कहीं ज्यादा।” प्रेमी के प्रेम में प्रेम देखना देवयानी को प्रेम के सर्वोच्च पर बैठा देता है। प्रेम और दर्शन का यह अनूठा तालमेल पाठकों के दिल में अवश्य ही अपनी जगह बनायेगा।

पुस्तक : ‘अनहद’ उपन्यास
लेखिका : डॉक्टर उपमा शर्मा
पेज संख्या: 149
मूल्य: 290

प्रकाशक: शुभदा प्रकाशन , बी-140/एस-2, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद
संपर्क: 8851578398

समीक्षक: डॉ शबनम सुल्ताना

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परिचय

शब्दकार प्रकाशन

पीयूष अवस्थी

मुख्य सम्पादक "शब्दकार" पत्रिका®, शब्दकार प्रकाशन®

प्रिय दोस्तों ! मेरे अजीजों !
                  क्या कहूँ ! ज़माना बदल गया है, हमारी जीवन शैली ,दिनचर्या ,व्यापार,सम्पर्क,बोलचाल आदि के माध्यम, बच्चों से लेकर बड़ों तक की पढ़ाई ,मनोरंजन,ज्ञान, गुप्तज्ञान, जी.के. को जानने ,पढ़ने के लिए ही नहीं देखने को भी उपलब्ध हैं , अब किसी को किताबें या बस्ता लादने की ज़रूरत ख़त्म हो गई है,अब तो आपकी पॉकेट और एक मोबाइल ही पूरी दुनिया को समेटने के लिए पर्याप्त है !
                  पहले तमाम हिन्दी भाषी क्षेत्रों की देशज भाषाओं में अक्सर यह वाक्य सुनने को मिलते थे,अब भी हैं – “ई का हुय गौ”, “ई का है” आदि-आदि ,लेकिन अब छोटी ‘इ’ और बड़ी ‘ई’ दोनों ‘ई’ में समा गये हैं, ई-मेल, डॉट-इन, ई-पत्रिका, ई-समाचार, चुट-पुट बटन दबाया और सब कुछ सामने ! अब आपको कोई मुद्रित साहित्यिक पत्रिका खरीदनी हो तो दूर-दूर तक आपको दुकान तलाशनी होगी, या स्टेशन जाना पड़ेगा, तब भी यह ज़रूरी नहीं कि आपको मनचाही किताब या पत्रिका मिल ही जाये ,लेकिन आपके मोबाइल में सब मौजूद है,जो चाहिए सर्च करिये, आपको Amazon, Flipcart या अन्य जगहों पर आपकी मनपसन्द चीजें मिल ही जायेंगी !
                  वैसे मुझे लगता है जबसे ईश्वर ने अच्छे लोगों को बनाना बन्द कर दिया है,तबसे ये साहित्यिक पत्रिकायें भी धरती की तमाम विलुप्तप्रायः प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं ,अब इनकी प्रजनन क्षमता समाप्त सी होती जा रही है ! अब न तो खरीदने वाले हैं, न पढ़ने वाले न छापने वाले !
                  सो भय्यो ! हमऊ ने “ई” को पकड़ लौ !
                  अब आपके सामने फिलहाल “ई-पत्रिका” के रूप में ” शब्दकार” पत्रिका जो साहित्यिक, सामाजिक विचारधारा की प्रगतिशील मासिक पत्रिका प्रस्तुत कर रहा हूँ , ‘ई’ का मतलब ‘ई’ नहीं कि “ऊ” न आई , “ऊ ” भी आई ! “शब्दकार” की “ई-पत्रिका” के बाद इसी वर्ष आपको इसकी मुद्रित प्रतियाँ भी प्राप्त होंगी ! क्योंकि हमारे पहले की, हमारे साथ की और हमारे बाद की पीढ़ियों के तमाम लोगों का अभी भी मुद्रित संस्करणों से मोह भंग नहीं हुआ है और फिर अपना ” शब्दकार प्रकाशन” भी तो अपने साथ है न !!
                  आशा है मेरे इस प्रयास को आपका स्नेह,प्यार व आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता रहेगा !

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प्रकाशित पुस्तकें -1

पुस्तक: ‘रुख़्सार’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: ग़ज़ल संग्रह
भाषा: हिन्दी-उर्दू
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘बेल्हा के कवि’
लेखक: डॉ. दयाराम मौर्य ‘रत्न’
रचना शैली: कवियों का सांझा संग्रह
भाषा: हिन्दी
कीमत: 230/-

पुस्तक: ‘मन पतंग सा’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: गीत संग्रह
भाषा:हिन्दी-रोमन (लिपियांतर)
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘ख़लिश’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: ग़ज़ल संग्रह
भाषा: हिंदी-अंग्रेजी
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘सांस्कृतिक भारत’
लेखक: राम कुमार निगम
रचना शैली: लेख
भाषा: हिन्दी
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘पिता हूँ मैं’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: कत्आत-खंडकाव्य
भाषा: हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘पियूषा दोहावली’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: दोहा संग्रह
भाषा: हिन्दी, रोमन, रूसी, अंग्रेजी
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘आंधी बरगद और लोग’
लेखक: सुरेश अवस्थी
रचना शैली: कविता संग्रह
भाषा: हिन्दी
कीमत: 350/-

शब्दकार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकें पाठक अपना नाम, पता एवं फोन नम्बर उपलब्ध करवा शब्दकार प्रकाशन कार्यालय से मंगवा सकते हैं।

सभी पुस्तकों पर 20 से लेकर 50 प्रतिशत तक की छूट उपलब्ध है।

पुस्तकें पर भी उपलब्ध हैं।

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प्रकाशित पुस्तकें -2

पुस्तक: ‘रुख़्सार’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: ग़ज़ल संग्रह
भाषा: हिन्दी-उर्दू
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘बेल्हा के कवि’
लेखक: डॉ. दयाराम मौर्य ‘रत्न’
रचना शैली: कवियों का सांझा संग्रह
भाषा: हिन्दी
कीमत: 230/-

पुस्तक: ‘मन पतंग सा’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: गीत संग्रह
भाषा:हिन्दी-रोमन (लिपियांतर)
कीमत: 700/-

पुस्तक: ‘ख़लिश’
लेखक: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: ग़ज़ल संग्रह
भाषा: हिंदी-अंग्रेजी
कीमत: 700/-

शब्दकार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकें पाठक अपना नाम, पता एवं फोन नम्बर उपलब्ध करवा शब्दकार प्रकाशन कार्यालय से मंगवा सकते हैं।

सभी पुस्तकों पर 20 से लेकर 50 प्रतिशत तक की छूट उपलब्ध है।

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पुस्तक समीक्षा सूचना

जो लेखक अपनी पुस्तकों की समीक्षाएं प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप अपनी एक पुस्तक एवं उसकी समीक्षा टाइप करवाकर (कृतिदेव जैसे फोंट में) फोंट साइज 12 में करके उसकी पीडीएफ, सीडीआर, वर्ड आदि फाइल में हमें प्रेषित करें। यदि आपकी समीक्षा अभी तक नहीं लिखी गई है तो आप किताब प्रेषित कर समीक्षा करवाने हेतु अनुरोध कर सकते हैं। आपकी पुस्तक की समीक्षा साहित्य मनीषियों, समालोचकों द्वारा प्राप्त होते ही पत्रिका में प्रकाशित की जाएगी।
कृपया आप अपनी किताब एवं समीक्षा ‘‘शब्दकार’’ पत्रिका के कार्यालय पर डाक द्वारा भिजवा दें।
                                                     -शब्दकार परिवार

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प्रकाशित पुस्तकें -3

‘‘पीयूषा दोहावली’’

पुस्तक: ‘पियूषा दोहावली’
रचयिता: पीयूष अवस्थी
रचना शैली: दोहा संग्रह
भाषा: हिन्दी, रोमन (लिपियांतर) व रूसी, अंग्रेजी भाषा में
भावार्थ अनुवाद के साथ।
प्रकाशक: शब्दकार प्रकाशन कीमत: 700/-

शब्दकार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकें पाठक अपना नाम, पता एवं फोन नम्बर उपलब्ध करवा शब्दकार प्रकाशन कार्यालय से मंगवा सकते हैं।

सभी पुस्तकों पर 20 से लेकर 50 प्रतिशत तक की छूट उपलब्ध है।

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प्रकाशन विवरण

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लेखकों / पाठकों से निवेदन

शब्दकार प्रकाशन

पीयूष अवस्थी

मुख्य सम्पादक "शब्दकार" पत्रिका®, शब्दकार प्रकाशन®

प्रिय दोस्तों ! मेरे अज़ीज़ों !
साहित्यिक -सामाजिक चेतना की प्रगतिशील ई -पत्रिका ” शब्दकार” का शुभारम्भ हुआ है , तमाम साथियों ने अपनी रचनायें प्रेषित की हैं ,जिनमें फिलहाल चयनित की गई रचनाओं को इस अंक में स्थान दिया गया है , कुछ रचनायें विचारार्थ हैं,जिन्हें सम्भवतः अगले अंक में प्रकाशित किया जायेगा !
आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी रचनायें भेज सकते हैं ! गीत,ग़ज़ल, दोहे, पद, हास्य-व्यंग्य ,लघुकथा, किस्सा-,कहानी, व्यंग्य लेख, समय की आवाज़, यात्रा- वृतांत, ज्ञान की बातें, किताबों की समीक्षा आदि -आदि !

आपकी रचनायें मौलिक होनी चाहिए व अप्रकाशित भी !
रचनायें word फ़ाइल में कृतिदेव के किसी भी फॉन्ट में ,उसका pdf व cdr या docx भी भेजें ,साथ ही अपना नाम ,चित्र, संक्षिप्त परिचय, पता, मोबाइल नम्बर ,ई-मेल जो भी उपलब्ध हो ,साथ ही प्रेषित करें !
आपकी टाइप की हुई रचनायें 12-14 साइज में होनी चाहिए ,आपने जिस फॉन्ट का उपयोग किया है ,उसे भी अवश्य अंकित कर दीजिए !

स्वीकृत और विचारार्थ रचनाओं के सम्बंध में ही आपको सूचना प्रदान की जाएगी ! हम किसी ऐसी रचनाओं को स्वीकार नहीं करते जो समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाती हों ,किसी वर्ग या किसी विशेष समुदाय, किसी राजनैतिक पार्टी के समर्थन या आलोचना से ग्रसित हों !

आपको इसकी वेबसाइट द्वारा आपको इसका लिंक प्रेषित किया जाएगा ,जिससे आप अपने कम्प्यूटर या मोबाइल पर आसानी से सरल रूप से पाठन कर सकें ! अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकें, जो अगले अंक में प्रकाशित की जाएंगी ,आपकी प्रसंशा ,सुझाव, आलोचना, समालोचना , मार्गदर्शन हमारी पत्रिका के लिए पारितोषक के समान होगा !

आप हमारे “शब्दकार प्रकाशन” के माध्यम से अपनी किताबें प्रकाशित करा सकते हैं ! इस विषय पर अलग से सूचना इस अंक में समाहित की गई है !

यह प्रवेशांक आपको उपहार स्वरूप प्रदान किया जाएगा ,इसका कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, आगामी अंक में यह शुल्क मात्र ₹ 30/- प्रतिमाह होगा,इसमें अर्द्धवार्षिक व वार्षिक शुल्क का भी विकल्प रखा जाएगा, जिसमें आपको छूट प्रदान की जाएगी !

हमारा मुख्य उद्देश्य साहित्य को समाज मे ज़्यादा से ज़्यादा प्रसारित करना है , जिससे साहित्यिक चेतना के साथ सामाजिक प्रगति की चेतना भी समाज में गौरव के साथ अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सके !

आप सभी बुद्धिजीवी हैं , साहित्य का अर्थ समझते हैं , आप स्वयं रचयिता भी है ,तो क्यूँ न हम सब का साहित्य पूरे विश्व में दीप्तिमान हो, आपका सहयोग मिलता रहा तो निश्चित ही यह ” शब्दकार” पत्रिका तमाम अचर्चित शब्दकारों को उनकी पहचान स्थापित करने में उनका सहभागी बनेगा ,और इसमें साहित्य में पदार्पण करने वाले युवा साथियों के लिए एक स्थायी कॉलम ” आते हुये लोग” भी जोड़ा जाएगा,जिसमें नये चेहरों को उचित स्थान प्रदान किया जायेगा ! ताकि वे भी शब्दकार परिवार का हिस्सा बन सकें !

आप सभी को “शब्दकार परिवार” की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं !

शब्दकार परिवार

 

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